पीएम मोदी को नकली OBC बताने के पीछे छिपा तेजस्वी का यह 'अजेय' अभियान !

दरअसल 1990 के दशक में लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने बिहार पर 15 वर्षों तक लगातार शासन किया. माना जाता है कि उनका यह शासन काल और आगे बढ़ सकता था, अगर वे 'MY' के साथ दूसरी जातियों को भी इस समीकरण में शामिल करते.

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: April 24, 2019, 3:27 PM IST
पीएम मोदी को नकली OBC बताने के पीछे छिपा तेजस्वी का यह 'अजेय' अभियान !
तेजस्वी यादव (फाइल फोटो)
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: April 24, 2019, 3:27 PM IST
देश बदल रहा है तो देश की राजनीति भी बदल रही है. यह परिवर्तन खास तौर पर बिहार में भी नजर आ रहा है. कभी  'MY' यानि 'मुस्लिम-यादव' का गणित गढ़ने वाली आरजेडी अब ओबीसी (other backward cast)  की रट लगा रही है. आरजेडी नेता और बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव इस मुद्दे पर खास तौर पर पीएम मोदी को अपने टारगेट में ले रहे हैं. वे पीएम को 'फर्जी' ओबीसी बताते हुए पिछड़ों के हक के लिए किए गए काम का हिसाब मांग रहे हैं. वहीं भाजपा भगाओ-आरक्षण बचाओ का भी नारा दे रहे हैं.

अब से थोड़ी देर पहले नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर एक बार फिर भाजपा भगाओ आरक्षण बचाओ के नारे के साथ एक ट्वीट शेयर किया है.


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सवाल उठता है कि क्या  'MY' समीकरण की सियासत करने वाली आरजेडी अब पिछड़ा वर्ग को साधने-समेटने की कोशिश में लगी है?

दरअसल 1990 के दशक में लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने बिहार पर 15 वर्षों तक लगातार शासन किया. माना जाता है कि उनका यह शासन काल और आगे बढ़ सकता था, अगर वे 'MY' के साथ दूसरी जातियों को भी इस समीकरण में शामिल करते.

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राजनीतिक हलकों में ऐसा माना जा रहा है कि तेजस्वी यादव ने बदले दौर की राजनीति को पहचान तो लिया है, लेकिन वह पूरी तरह पार्टी का आधार बदलना नहीं चाहते. इसके पीछे वजह ये है कि बीते तीन दशकों में जिस तरह समाज को अगड़े-पिछड़े में बांटकर बिहार की राजनीति परवान चढ़ी, वह अब भी अस्तित्वहीन नहीं हुई है.

वर्ष 2015 के चुनाव में मोहन भागवत के आरक्षण समीक्षा वाले बयान को जिस तरह से लालू यादव ने महागठबंधन के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया, उसका निशाना अचूक रहा. समाज में एक बार फिर बंटवारा दिखा और आरजेडी-जेडीयू मिलकर सत्ता पर काबिज हो गई.

नतीजों से साफ था कि बीजेपी की ओर मुड़ चले ओबीसी समुदाय ने विधानसभा चुनाव में बीजेपी से मुंह मोड़ लिया था. नतीजा बीजेपी के कोर वोटर तो उसके साथ रहे लेकिन बोनस वोट (ओबीसी) वह गंवा बैठी. इसे पीएम मोदी ने बहुत जल्दी भांप लिया और ओबीसी कमिशन को संवैधानिक दर्जा देकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की.

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इसका परिणाम भी बीजेपी के पक्ष में गया और बदले दौर की राजनीति में ओबीसी वोटर मोटे तौर पर बीजेपी के पक्ष में खड़ा दिख रहा है. यह बिहार ही नहीं बल्कि लगभग सभी उत्तर भारतीय राज्यों में धरातल पर दिखता भी है. बिहार में भी कमोबेश यही स्थिति दिख रही है.

हालांकि बदले दौर में आरजेडी की कमान अब युवा तेजस्वी यादव के हाथों में है और वह सियासी गणित के तहत बिहार में जातीय राजनीति की नई गोलबंदी तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं. इस गोलबंदी में एक महत्वपूर्ण फैक्टर ओबीसी वोट बैंक का भी है. शायद यही वजह है कि तेजस्वी पीएम मोदी को बार-बार नकली ओबीसी बता रहे हैं.



वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं,  बीते 2015 के विधानसभा चुनाव में जिस तरह से लालू यादव ने जिस तरह से मोहन भागवात के बयान को अपने मतदाता समूह में खुलकर प्रचारित किया. वे आरजेडी समर्थक पिछड़ा वर्ग समुदाय में एक भय पैदा करने में कामयाब रहे और पिछड़ा समुदाय एक बार फिर आरजेडी के पक्ष में गोलबंद हो गया. इसका असर चुनाव परिणाम में भी दिखा और आरजेडी दोबारा सत्ता में वापसी कर पाई.

हालांकि मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि लालू यादव ने अब तक यही प्रचारित किया है कि उन्होंने  वंचित-पिछड़ा समुदाय को ताकत दी. तेजस्वी यादव भी इसी कोशिश में हैं कि इस बात को इन तबकों को याद दिलाते रहा जाए.

हालांकि मणिकांत ठाकुर मानते हैं कि बदले दौर में बीजेपी भी बदल गई है और वह आरजेडी के आक्षेप का खुलकर प्रतिकार करती है. पीएम मोदी अक्सर कहते रहते हैं कि बाबा साहब अम्बेडकर के संविधान के कारण वे पीएम पद तक पहुंच सके.

इसी तरह केंद्र की मोदी सरकार को अपर कास्ट को थोड़ा नाराज करते हुए भी एससी एसटी एक्ट के कानून में संशोधन कर यह संदेश भी दे दिया कि वह हर हाल में पिछड़े-दलित समुदाय के हित का खयाल रखेगी.

हालांकि लालू यादव और तेजस्वी यादव की लगातार कोशिश जारी है.  राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के उपेन्द्र कुशवाहा और विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी को एक साथ लाकर उन्होंने इसी वोट बैंक को साधने की कोशिश की है.

उपेन्द्र कुशवाहा कोयरी जाति से आते हैं. इनकी आबादी बिहार में करीब 6.4 प्रतिशत है. जाहिर है तेजस्वी ने कोयरी समुदाय के 6 प्रतिशत वोटों को साधने की नीति के तहत ही उपेन्द्र कुशवाहा को अपने खेमे में कर लिया.

इसके साथ ही निषाद समुदाय के मुकेश सहनी को अपने पाले  में ले आए बल्कि वर्तमान सियासी हैसियत से अधिक तीन सीटें भी दीं. वहीं जीतनराम मांझी के चेहरे के आसरे 18 प्रतिशत महादलित को भी अपने पाले में लाने की कवायद में लगे हैं. यही वजह है कि मांझी की पार्टी हम को 3 सीटें भी दी हैं.

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हालांकि इस समीकरण को सेट करने में सबसे बड़ी बाधा है तो वो पीएम मोदी ही हैं. देश के सामने जब से वह ओबीसी के बेटे के तौर पर जाने गए हैं इस पूरे समुदाय का सेंटिमेंट इससे जुड़ गया है.

मणिकांत ठाकुर भी कहते हैं, पीएम मोदी लोधी या तेली जाति से आते हैं, यह हकीकत है. हो सकता है कि हर राज्य में इसके स्टेटस में कुछ चेंज हो, लेकिन सामाजिक न्याय के परिप्रेक्ष्य में यह सत्य है कि वे इसी वंचित वर्ग से आते हैं. ऐसे में तेजस्वी यादव की बातों का उतना असर जमीन पर होता नहीं दिख रहा है.

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एक बड़ा तथ्य है कि पीएम मोदी अपने ऊपर किए गए किसी भी राजनीतिक हमले को खुद के लिए हथियार बना लेते हैं. हाल में जब कांग्रेस ने पीएम मोदी के विरुद्ध 'चौकीदार चोर है' का नारा दिया तो उन्होंने इसे पूरे ओबीसी समुदाय से जोड़ दिया और पिछड़े वर्ग का अपमान बताया.

यही वजह है कि पीएम मोदी के विरोधी नेता उन्हें अब फर्जी ओबीसी करार देने में लगे हैं. इसके पीछे तर्क यह है कि पीएम मोदी जिस लोध जाति से आते हैं उसे गुजरात में दो दशक पहले ओबीसी का दर्जा मिला है. हालांकि बीजेपी का कहना है कि 1994 में ही कांग्रेस के शासन में लोध को पिछड़े वर्ग में शामिल किया था.

बहरहाल पीएम मोदी को फर्जी ओबीसी कहने के पीछे तेजस्वी यादव वह सियासी गोलबंदी ही मुख्य मानी जा रही है, जिसमें ओबीसी को 'MY' समीकरण के साथ मिला लेने के बाद महादलितों का थोड़ा हिस्सा भी उनके साथ जुड़ता है तो वह बिहार की राजनीति में 'अजेय' हो जाएंगे.

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First published: April 24, 2019, 3:27 PM IST
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