Opinion: बिहार में प्रेशर पॉलिटिक्स का 'खेल' या किसी बड़े 'भूचाल' की आहट

बिहार में मंत्रिमंडल विस्तार में देरी से सियासत गर्माई हुई है.

बिहार में मंत्रिमंडल विस्तार में देरी से सियासत गर्माई हुई है.

Bihar Politics: बिहार BJP संगठन में भूपेंद्र यादव और नित्यानंद राय की बढ़ती पकड़ से JDU चिंतित है. नीतीश के सबसे भरोसेमंद साथी सुशील मोदी को दिल्ली भेजने के बाद से ही ये तय हो गया था कि मौजूदा सरकार का स्वरूप पहले जैसा नहीं रहने वाला है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 11, 2021, 7:37 PM IST
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राजीव कमल

बिहार की मौजूदा नीतीश सरकार अपने 5 साल का कार्यकाल पूरा कर पाएगी? इस सवाल का जवाब राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर भी देने से बच रहे हैं. जेडीयू की पतली हालत और बीजेपी की महत्वाकांक्षा को देखते हुए हर कोई यही सवाल पूछ रहा है कि क्या बीजेपी कोई बड़ा खेल करने की तैयारी में है? अरुणाचल प्रदेश की घटना के बाद इन कयासों को और भी बल मिला है.

बिहार में मंत्रिमंडल विस्तार में हो रही देरी को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है. जेडीयू की पूरी कोशिश है कि मंत्रिमंडल विस्तार से पहले कांग्रेस में सेंध लगा दे, ताकि नंबर गेम में वो बीजेपी के संख्या बल के करीब पहुंच जाए और पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया जा सके. मौजूदा बिहार विधानसभा में बीजेपी के 74 और जेडीयू के 43 विधायक हैं. एनडीए के बाकी दो नए सहयोगी वीआईपी और हम के पास 4-4 सीटें हैं. नीतीश कुमार की दिक्कत ये भी है कि एनडीए की मौजूदा सरकार के पास सिर्फ 125 विधायक हैं जो बहुमत से सिर्फ 3 ज्यादा हैं. अगर मांझी का मन डोला या सहनी की पार्टी के विधायक टूट गए तो सरकार चलाना मुश्किल हो जाएगा. जेडीयू हर हाल में अपनी ताकत बढ़ाने की जुगत में है. पार्टी पहले ही इस चुनाव में जीते एकमात्र निर्दलीय विधायक सुमित सिंह को अपने पाले में कर चुकी है.

चुनाव बाद के घटनाक्रम ने बढ़ाई नीतीश की चिंता
भूपेंद्र यादव और नित्यानंद राय की बिहार बीजेपी पर बढ़ती पकड़ से जेडीयू चिंतित है. नीतीश के सबसे भरोसेमंद साथी सुशील मोदी को दिल्ली भेजने के बाद से ही ये तय हो गया था कि मौजूदा सरकार का स्वरूप पहले जैसा नहीं रहने वाला है. नीतीश को बीजेपी से ज्यादा सुशील मोदी पर भरोसा रहा है और दोनों के बीच गजब की कमेस्ट्री रही है. नीतीश की पिछली सरकार में शामिल नंदकिशोर यादव और प्रेम कुमार जैसे कद्दावर नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करना, किसी बड़ी रणनीति की ओर इशारा करता है. बीजेपी इन नेताओं की अधिक उम्र का हवाला देकर इन्हें मार्गदर्शक मंडल में भेज चुकी है. राजनीति के जानकार भी यही मानते हैं कि बीजेपी ने दो नये चेहरे तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकार तुरुप का पत्ता कहीं छुपा लिया है, जिसे सही समय पर निकाला जाएगा. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के मन में क्या है ये किसी को नहीं मालूम. यहां तक कि बिहार में बीजेपी के कार्यकर्ता भी कन्फ्यूजन की स्थिति में हैं. हर कोई जानता है कि साथ रहना दोनों की मजबूरी है, लेकिन सवाल वहीं आकर अटक जाता है कि आखिर माजरा क्या है?

साथ चलने के अलावा कोई विकल्प नहीं

बिहार में बीजेपी इस स्थिति में नहीं है कि अकेले सरकार बना ले. तोड़फोड़ कर भी बीजेपी सरकार बनाने की हालत में नहीं है. किसान आंदोलन के साथ ही पश्चिम बंगाल का चुनाव भी सिर पर है और बीजेपी फिलहाल अपनी पूरी ताकत वहां झोंकना चाह रही है. शिवसेना और अकाली दल जैसे पुराने साथियों के साथ छोड़ने के बाद फिलहाल बीजेपी ऐसा कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं दिखती कि वो जेडीयू से भी किनारा कर ले. बीते दिनों भूपेंद्र यादव का जेडीयू दफ्तर जाकर आरसीपी सिंह से मिलना ये संकेत देता है कि फिलहाल बीजेपी डैमेज कंट्रोल के मूड में है. जेडीयू नेता भी पहले की तरह आरजेडी से हाथ मिला लेने की धमकी नहीं दे रहे हैं. जेडीयू के बड़बोले नेताओं को चुप रहने की नसीहत दी गई है. पार्टी की कोशिश है कि इस बार केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में उसे उसका वाजिब हिस्सा मिल जाए. ऐसा हुआ तो ललन सिंह का मंत्री बनना तय है. आरसीपी सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाल चुके हैं और अभी उनकी प्राथमिकता पार्टी को मजबूत करने की है. हालांकि जेडीयू केंद्र में एक से ज्यादा मंत्री पद की मांग पर अभी भी अड़ी है.



बदले-बदले से नजर आते हैं 'सरकार'

पिछले कुछ दिनों से नीतीश कुमार एक्शन में हैं. ताबड़तोड़ समीक्षा बैठक और कई महत्वपूर्ण योजनाओं का उद्घाटन कर नीतीश ने जता दिया है कि वो 'विकास कुमार' की अपनी पुरानी छवि को पाने के लिए छटपटा रहे हैं. कानून-व्यवस्था की बिगड़ती हालत पर उन्होंने अधिकारियों की जमकर क्लास ली है वहीं सड़क परियोजनाओं की कार्य प्रगति की वो खुद मॉनिटरिंग कर रहे हैं. बिहार में सभी को 6 महीने के अंदर कोरोना वैक्सीन लगाने की व्यापक योजना बनी है और नीतीश कुमार खुद इसमें रुचि ले रहे हैं. पर्यटन के क्षेत्र में बिहार को देश के मैप पर लाने के लिए भी वो काफी जतन करते नजर आते हैं. हाल ही में उन्होंने राजगीर में बन रहे देश के पहले ग्लास ब्रिज का दौरा किया, जिसका काम करीब-करीब पूरा कर लिया गया है. नीतीश कुमार ये साबित करने पर तुले हैं कि भले ही वो मजबूरी में सीएम बने हों, लेकिन वो थके नहीं हैं. नीतीश कुमार पर ये आरोप लगता रहा है कि वो अपना लिखा खुद 'मिटाते' रहते हैं लेकिन इस बार नीतीश कुमार की पूरी कोशिश है कि एक नई कहानी लिखी जाए.

नीतीश कुमार के पास ज्यादा विकल्प नहीं

जेडीयू को ये डर चुनाव से पहले ही था कि बीजेपी उससे ज्यादा सीटें जीतकर आ सकती है. पार्टी ने सीट बंटवारे में ज्यादा सीटों पर दावेदारी कर अंतर को पाटने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी उसके हाथ नहीं लगी. कुर्सी पर बैठने से पहले नीतीश कुमार को यहां तक कहना पड़ा कि वो मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते हैं, लेकिन बीजेपी के दबाव के आगे उनकी नहीं चली और मजबूरी में उन्हें सीएम बनना पड़ रहा है. 2014 लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद सीएम का पद छोड़ देने वाले नीतीश कुमार ने इस बार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ दिया है. अपने सबसे भरोसेमंद आरसीपी सिंह को कमान सौंपकर नीतीश कुमार अब पूरा ध्यान सरकार पर लगाना चाहते हैं. अब नीतीश ने अपनी पूरी ताकत सरकार का 'चेहरा' चमकाने में लगा दी है. वहीं आरसीपी सिंह को पार्टी को मजबूत करने का जिम्मा सौंप दिया गया है. जेडीयू की कोशिश है कि किसी भी तरह कांग्रेस टूट जाए. मौजूदा विधानसभा में कांग्रेस के 19 विधायक हैं और टूट के लिए कम से कम 13 विधायकों की जरूरत है. शक्ति सिंह गोहिल के प्रभारी पद से मुक्त किये जाने के बाद जेडीयू ने अपनी कोशिशें तेज कर दी है. बिहार कांग्रेस कई धड़ों में बंटी है और जेडीयू को उम्मीद है कि मंत्रिमंडल विस्तार से पहले ये 'काम' हो जाएगा.

मजबूत विपक्ष और नये सहयोगी भी बड़े सरदर्द

बिहार की राजनीति की ये हालत है कि हर कोई एक दूसरे को शक की निगाह से देख रहा है. सत्ता पक्ष ये दावे कर रहा है कि विपक्ष के विधायक टूटकर आने को तैयार है. उधर, मजबूत विपक्ष भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है. सत्ता की दहलीज तक पहुंचकर फिसले लालू प्रसाद अपने बेटे को सीएम की गद्दी तक पहुंचाने के लिए जेल से कभी भी बड़ा 'खेल' कर सकते हैं. 75 सीट जीतने वाला आरजेडी बिहार का सबसे बड़ा दल है और लगातार जेडीयू के विधायकों को अपने पाले में लाने की कोशिशों में जुटा है. भागलपुर के गोपालपुर से जेडीयू के विधायक गोपाल मंडल के बगावती तेवर यही इशारा कर रहे हैं कि आरजेडी ने 'सेंध' लगा दी है. पहले से कमजोर नीतीश को सिर्फ बीजेपी और लालू से डर नहीं है.

एनडीए के दो नए सहयोगी मांझी और साहनी की मौकापरस्ती भी किसी से छुपी नहीं है. जीतन राम मांझी ने हम पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में विधान परिषद में एक और सीट तथा पार्टी से एक और मंत्री पद बनाने की मांग रखकर नीतीश की परेशानियां बढ़ा दी है. बहरहाल, सामान्य बहुमत वाली बिहार की एनडीए सरकार की नाव में कई 'छेद' हैं. हालांकि इन तमाम गुणा-गणित के बाद यही लगता है कि नीतीश पहले से कमजोर जरूर हैं लेकिन लाचार नहीं हैं. राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर भी उनके चेहरे के भाव को पढ़ नहीं पाते. ये सिर्फ नीतीश जानते हैं कि उनके दिल में क्या चल रहा है और बिहार की राजनीति को आगे कैसे चलाना है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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