AES: बच्चों की मौत की जिम्मेदारी लेगा बिना तैयारियों वाला बिहार का स्वास्थ्य विभाग?

बिहार के जिस स्वास्थ्य विभाग के जिम्मे लोगों के स्वास्थ्य को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी है, क्या उसी स्वास्थ्य विभाग के एजेंडे में ही नहीं है लोगों की सेहत?

Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: June 17, 2019, 8:35 PM IST
AES: बच्चों की मौत की जिम्मेदारी लेगा बिना तैयारियों वाला बिहार का स्वास्थ्य विभाग?
बिहार में चमकी बुखार से कम से कम सवासौ बच्चों की मौत हो चुकी है. (फोटो- पीटीआई)
Deepak Priyadarshi
Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: June 17, 2019, 8:35 PM IST
बिहार में इन दिनों हाहाकार मचा है. एक तरफ AES यानी एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिड्रोम से अभी तक सवा सौ से अधिक बच्चों की मौत हो गई है तो वहीं दूसरी तरफ आसमान से आग बरसाती गर्मी और लू से भी सौ से अधिक लोगों की जान जा चुकी है. हैरानी की बात तो यह है कि जिस राज्य में हर तरफ मौत बरस रही है, उस राज्य में स्वास्थ्य महकमे के पास इस हालात से निपटने के लिए कोई तैयारी नहीं दिख रही है. हर तरफ अस्पताल में अफरातफरी मची हुई है.

ऐसे में सवाल उठना जायज है कि जो मौतें अब तक हुईं, क्या वह वाकई बीमारी से मरे या फिर कुव्यवस्थाओं ने उन्हें मार दिया? और इसी कारण वे अभी भी मर रहे हैं? ऐसा तो है नहीं कि दिमागी बुखार, चमकी बुखार और लू जैसे नामों वाली यह आपदा पहली बार और अचानक से बिहार में आई? तो फिर सरकार और स्वास्थ्य विभाग इन सबके लिए तैयार क्यों नहीं था? या फिर लोगों की सेहत खुद स्वास्थ्य विभाग के एजेंडे में ही नहीं है?

मुजफ्फरपुर सबसे अधिक प्रभावित
बिहार में इस समय लोगों का हर वक्त यह सोचकर दिल दहल रहा है कि आखिर और कितने मासूम बच्चों की मौत को देखना होगा? क्योंकि जिस तरह एक-एक करके यह संख्या बढती जा रही है, वह कहां जाकर रुकेगी. अकेले मुजफ्फरपुर के SKMCH में काल के गाल में समा जाने वाले मासूम बच्चों की संख्या सौ से अधिक पार कर गई है.

AES से मरने वाले बच्चों के आंकड़े
पिछले कुछ वर्षों में AES और उससे मरने वाले बच्चों के आंकड़ों को देखें तो 2012 में 89 बच्चे, 2013 में 35 बच्चे, 2014 में 117 बच्चे, 2015 में 15 बच्चे, 2016 में 6 बच्चे, 2017 में 18 बच्चे और 2018 में 12 बच्चों की मौत हुई.

चमकी बुखार से पीड़ित बच्चों का इलाज कराते हुए परिजन (फोटो- पीटीआई)

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केंद्रीय मंत्री ने की कई घोषणाएं, पांच साल पहले भी ऐसा ही हुआ था
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन आए तो उन्होंने एक के बाद एक घोषणाएं कर दीं. लेकिन अस्पताल आधारभूत संरचनाओं को लेकर जो घोषणाएं की गईं, वह तो पहले भी की गई हैं. लेकिन हालात तो जस के तस ही बने रहे. 2014 में 117 बच्चों की मौत हुई थी, तब भी कई घोषणाएं की गईं. आज पांच साल के बाद फिर वैसी ही घोषणा हुई.

मतलब साफ है कि पांच वर्षों तक अस्पतालों की स्थिति सुधारने के लिए कुछ नहीं किया गया. न अस्पताल में बेड बढ़े, न ही बच्चों के आईसीयू में बेडों की संख्या बढ़ी. सरकार हर वर्ष स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने का दावा करती है. भारी भरकम बजट तय होते हैं. लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं दिखता.

औरंगाबाद में लू से एक दिन में 30 से अधिक लोग मरे
औरंगाबाद में लू से एक ही दिन में 30 से अधिक लोग मर गए. वह इसलिए कि अस्पताल में समुचित इलाज की व्यवस्था नहीं थी. सरकार ने घोषणा की थी कि हर जिला स्तर के अस्पताल में आईसीयू बनेगा. लेकिन आज अधिकतर जिलों के सदर अस्पताल में या तो आईसीयू नहीं है और जहां है वहां डाक्टर नहीं हैं. पूरे राज्य में डाक्टरों की भारी कमी है. हर बार डाक्टरों की कमी को पूरा करने का दावा सरकार करती है लेकिन यह दावा हकीकत में तब्दील नहीं होता.

बिहार में चमकी बुखास से सबसे अधिक प्रभावित मुजफ्फरपुर का इलाका है. (फोटो- पीटीआई)


जब मुजफ्फरपुर में AES से ग्रसित मरीजों की संख्या बढ़ी तो डॉक्टरों की तलाश शुरू हुई. यहां-वहां से डाक्टर बुलाए जाने लगे. क्या स्वास्थ्य विभाग को नहीं पता था कि ऐसे हालात आएंगे? मुजफ्फरपुर में ही जिला स्तर का अस्पताल है लेकिन वहां कोई नहीं जाता, क्योंकि वहां कोई व्यवस्था ही नहीं है.

चमकी बुखार को लेकर राज्य में जागरूकता अभियान नहीं चला
सरकार ने पोलियो और चेचक जैसी बीमारियों के जड़ से उन्मूलन करने के लिए कई वर्ष तक पूरे साल भर का सघन अभियान चलाया और उसमें सफलता भी मिली. लेकिन इस बीमारी को लेकर कोई जागरूकता अभियान नहीं चला. इसपर से केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने कह दिया कि अधिकारी चुनाव में व्यस्त थे, इसलिए जागरूकता नहीं चल पाया. क्या चुनाव के समय बच्चों के जान की किसी को कोई परवाह नहीं थी? अब एक-एक करके बच्चों की मौत हो रही है, तो गंभीरता दिखाई जा रही है. यानी जिस स्वास्थ्य विभाग के जिम्मे लोगों के स्वास्थ्य को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी है, उसी स्वास्थ्य विभाग के एजेंडे में ही नहीं है लोगों की सेहत?

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First published: June 17, 2019, 5:07 PM IST
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