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बिहार: बिखरा-बिखरा विपक्ष क्या मजबूत एनडीए से मुकाबला कर पाएगा?

News18 Bihar
Updated: November 30, 2019, 7:55 AM IST
बिहार: बिखरा-बिखरा विपक्ष क्या मजबूत एनडीए से मुकाबला कर पाएगा?
बिहार में महागठबंधन की एकता तार-तार होती दिख रही है.

बिहार में विपक्ष लगातार कमजोर होता जा रहा है वहीं एनडीए मजबूती के साथ एकजुटता दिखा रहा है. सवाल यही है कि क्या आगामी विधान सभा चुनाव में बिखरा-बिखरा विपक्ष क्या मजबूत NDA के सामने चुनौती पेश कर पाएगा?

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पटना. क्या बिहार में विपक्ष (Opposition) अब बिखराव की ओर बढ़ रहा है? ये सवाल इसलिए उठ रहा है कि हाल में कई ऐसी बातें हुई हैं जो विपक्षी एकता की जमीन दरकने के सबूत के तौर पर सामने हैं. लोकसभा चुनाव (Lok sabha Election) से पहले मजबूती से इकट्ठे हुए पांच बड़े विरोधी दलों ने मिलकर जो महागठबंधन (Grand alliance) बनाया था वह चुनाव परिणाम के बाद से ही अपने बिखराव की ओर बढ़ने लगा.

जानकार बताते हैं कि सभी दलों की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं जो इसे नुकसान पहुंचा रहा है. आने वाले विधानसभा चुनाव में सभी दल सीटों के बंटवारे को लेकर फिर आमने-सामने होंगे और यह विपक्षी एकता के सूत्र को कमजोर ही करने वाला है. आइये हम कुछ ऐसी बातों पर नजर डालते हैं जो विपक्ष के बिखराव की ओर इंगित करता है.

कुशवाहा के अनशन से दूर रहे तेजस्वी
राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा बीते मंगलवार से आमरण अनशन पर हैं. इस बीच उनकी तबीयत भी कई बार बिगड़ी. उनसे मिलने वालों में बीजेपी के एमएलसी संजय पासवान तक जा पहुंचे, लेकिन विपक्षी एकता की अगुवाई का दावा करने वाले नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव पटना में रहने के बावजूद उनका हाल तक लेने नहीं पहुंचे. हालांकि जब उन्हें पीएमसीएच में भर्ती करवाया गया तब वेज जरूर पहुंचे लेकिन, ये महज रस्म अदायगी ही मानी गई.

विंटर सेशन में भी अलग-अलग दिखा विपक्ष
शीतकालीन सत्र के दौरान उम्मीद थी कि विपक्ष जोरदार तरीके से सत्ता पक्ष को घेरेगा, लेकिन हुआ ठीक इसके उलट. यहां सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी ने अपनी कोई खास उपस्थिति दर्ज नहीं करवाई. तेजस्वी यादव भी पांच दिनों तक चली कार्यवाही में चार दिन शामिल ही नहीं हुए. वहं कांग्रेस की ओर से सरकार पर आक्रामकता दिखाई गई तो राजद ने उससे भी दूरी बनाए रखी.

महागठबंधन के बारे में यही कहा जाने लगा है कि एकता की बातें तो खूब होती हैं पर आपसी भरोसा खत्म हो गया है (फाइल फोटो)

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एकला चलो की राह पर चली कांग्रेस
बीते 24 नवंबर को बेरोजगारी और महंगाई जैसे कई मुद्दों को लेकर कांग्रेस ने 'जनवेदना मार्च' निकाला. पटना में आयोजित इस मार्च के दौरान कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े गए. जाहिर है यह कांग्रेस की कवायद खुद के अस्तित्व को उभारने की हो रही है. वहीं, इस मार्च से आरजेडी और अन्य सहयोगियों की दूरी भी सवालों के घेरे में रही.

उपचुनाव में दरकी विपक्षी एकता की दीवार
बीते अक्टूबर में हुए एक लोकसभा और पांच विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भी विपक्षी एकता की दीवार दरकती हुई दिखी. हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा और आरजेडी जहां नाथनगर सीट पर आमने-सामने लड़ी, वहीं सिमरी बख्तियारपुर में  विकासशील इंसान पार्टी ने भी आरजेडी से मोर्चा लिया. वहीं कांग्रेस ने समस्तीपुर और किशनगंज सीट पर आरजेडी की मदद नहीं करने का भी आरोप लगाया.

विपक्ष में नेतृत्व की लड़ाई जारी 
लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही तेजस्वी यादव की क्षमता का आंकलन होने लगा और महागठबंधन खेमे से ही आवाज उठने लगी. सबसे पहले जीतन राम मांझी ने तेजस्वी की अनुभवहीनता को लेकर आवाज उठाई. इसके बाद मुकेश सहनी भी आगे आए. वहीं, कांग्रेस और कुशवाहा की 'मजबूत' होती दोस्ती भी विपक्षी कुनबे की दरकती एकता का बड़ा सबूत है.

अब सवाल है कि बिहार में विपक्ष लगातार कमजोर होता जा रहा है वहीं एनडीए मजबूती के साथ एकजुटता दिखा रहा है. सवाल यही है कि क्या आगामी विधान सभा चुनाव में बिखरा-बिखरा विपक्ष क्या मजबूत NDA के सामने  चुनौती पेश कर पाएगा?

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First published: November 29, 2019, 4:20 PM IST
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