अमौर विधानसभा: बिहार की वो सीट, जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं

अमौर में इस बार का विधानसभा चुनाव दिलचस्‍प होने की उम्‍मीद है. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)
अमौर में इस बार का विधानसभा चुनाव दिलचस्‍प होने की उम्‍मीद है. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

बिहार विधानसभा (Bihar Assembly) की वैसे तो कई सीटें ऐसी हैं, जहां देश में अल्पसंख्यक मुस्लिम (Muslim) वोटर्स जीत हार में अहम जिम्मेदारी निभाते हैं, लेकिन पूर्णिया जिले की अमौर सीट (Amour Seat) इन सबसे अलग है.

  • News18 Bihar
  • Last Updated: September 22, 2020, 9:04 AM IST
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पूर्णिया. बिहार विधानसभा (Bihar Assembly) की वैसे तो कई सीटें ऐसी हैं, जहां देश में अल्पसंख्यक मुस्लिम (Muslim) वोटर्स जीत हार में अहम जिम्मेदारी निभाते हैं, लेकिन पूर्णिया जिले की अमौर सीट (Amour Seat) इन सबसे अलग है. बिहार अमौर विधानसभा क्षेत्र मुस्लिम बाहुल्य है और यहां हिंदू अल्पसंख्यक की भूमिका में हैं. अमौर विधानसभा क्षेत्र में बिहार चुनाव 2020 (Bihar Election 2020) की सांकेतिक तैयारी शुरू कर दी गई है. अमौर विधानसभा क्षेत्र पूर्णिया और किशनगंज के सीमावर्ती क्षेत्र का इलाका है. अमौर विधानसभा जब से अस्तित्व में आई है, चुनावी दांव-पेंच उस इलाके में जारी रहा.

बाढ़ व कटाव मुख्य तौर पर चुनावी मुद्दे रहते हैं. अमौर किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में है, लेकिन विधानसभा पूर्णिया में ही पड़ता है‌. कोसी की उपधारा महानंदा, कनकई, बकरा, परवान अमौर को चारों तरफ से घेर रखा है. बीच में टापू के माफिक अपनी विकास की बाट जोहता है‌. चुनाव आते-जाते रहते हैं, लेकिन मुद्दे यथास्थिति में बने रहते हैं. पलायन और विस्थापन इस इलाके के लिए सालों भर लगा रहता है. बाढ़ से फसल का कटाव होता है तो काम ना मिलने के वजह से मजदूरों का बड़ा खेफ दूसरे राज्यों के लिए पलायन कर जाते हैं. यह दर्द मजदूर, किसान से लेकर आम जनता की है.

नहीं खींचा गया ​विकास का रोडमैप
विकास का कोई रोड मैप अमौर के लिए नहीं खींचा गया है, जिससे उस पूरे इलाके का सूरत बदल जाए. ताकि, जीवन समान्य हो सके. राजनीतिक दल के चुनावी घोषणापत्र में ही अमौर का विकास दम तोड़ जाता है‌. अमौर की किस्मत वहां के विधायक तय करते हैं. नये पिच पर पुराने चेहरे चुनाव में जनता को लुभाने की जद्दोजहद करता है. सियासत की आड़ में अमौर का विकास छूट जाता है. जबकि चुनावी मौसम में जनता को रंगीनी दुनिया में पहुंचा दिया जाता है.
हिंदू अल्पसंख्यक सीट


इस सीट पर कांग्रेस के अब्दुल जलील मस्तान 1980 के बाद से ज्यादातर काबिज रहे हैं. उनके स्थाई प्रतिद्वंद्वी हैं सबा जफर. कुल वोटर्स में 80 फीसदी मुस्लिम वोटर्स यहां हैं. इसमें सुरजापुरी, कुल्हैया शेरशाहवादी तीन किस्म के मुसलमान है. इस सीट पर चन्द्रशेखर झा आजाद 1977 में चुनाव जीते. मुजफ्फर हुसैन 1995 में एक बार चुनाव जीते बाद में उनकी मृत्यु हो गई. फिर तत्काल विधानसभा के उपचुनाव हुए, जिसमें उनके पुत्र सबा जफर चुनाव जीत गए. हालिया विधानसभा चुनाव में सबा जफर ने दबदबा बनाकर रखा है. भारी मतों से चुनाव जीतकर खुद की व्यक्तित्व को स्थापित करने में सफल रहे. हालांकि 2015 के चुनाव में अब्दुल जलील मस्तान को फिर से जीत मिली और वे वर्तमान में विधायक हैं.
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