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समाज सुधार के लिए दुर्गा पूजा मनाती है बिहार की ये पूजा समिति, 100 वर्षों से जारी है परंपरा

News18 Bihar
Updated: October 5, 2019, 3:17 PM IST
समाज सुधार के लिए दुर्गा पूजा मनाती है बिहार की ये पूजा समिति, 100 वर्षों से जारी है परंपरा
पूर्णिया के दुर्गाबाड़ी में समाज सुधार को समर्पित दुर्गा पूजा की परंपरा 100 वर्षों से जारी है.

साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी सतीनाथ भादुड़ी ने समाज सुधार के अभियान को लेकर साहित्य तो रचे ही, उन्होंने सामाजिक और धार्मिक परंपराओं में नवाचार और सुधारवादी कार्यक्रम भी चलाया.

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पूर्णिया. दुर्गाबाड़ी में मां दुर्गा पूजा (Durga Puja) पिछले 103 सालों से सामाज सुधार (Social reforms) की भावना से प्रेरित होकर की जा रही है. यहां की पूजा पर बांग्ला साहित्यकार और विचारक सतीनाथ भादुडी (Writer and thinker Satinath Bhaduri) के समाज सुधार के विचार जुडे हैं. विशेष बात ये कि यहां बांग्ला रीति से पूजा आयोजित होने के बावजूद बलि प्रथा (Sacrificial system) वर्जित है. साथ ही यहां पूजा पाठ के दौरान लाउड स्पीकर का उपयोग भी नहीं होता.

दुर्गापूजा का आयोजन एक पखवाड़ा पहले से शुरू हो जाता है, जिसमें बच्चों और युवाओं के लिए खेल, भाषण, नाटक, संगीत और लेखन से जुडी प्रतियोगिताएं करायी जाती हैं. इस तरह यह आयोजन समाज सुधार के साथ पिछले 100 साल से दुर्गापूजा के रूप में लगातार सफलतापूर्वक किया जा रहा है. आयोजकों ने अपनी परंपरा को विशेष बताते हुए आगे भी जारी रखने की बातें कही हैं.

बच्चों, युवाओं की प्रेरणा के लिए यहां कई तरह की प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है.


दुर्गाबाड़ी पूजा समिति के सचिव बुलाई भट्टाचार्य की मानें तो बांग्ला साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी सतीनाथ भादुड़ी ने समाज सुधार के अभियान को लेकर साहित्य तो रचे ही, उन्होंने सामाजिक और धार्मिक परंपराओं में नवाचार और सुधारवादी कार्यक्रम भी चलाया था.

वे दुर्गापूजा में निरीह पशुओं की बलि के घोर विरोधी थे साथ ही धार्मिक कार्यक्रमों को मानव के जीवन में सुधार के आयोजन मानते थे न कि दिखावे के. इसी के तहत उन्होंने बलि प्रथा पर रोक लगायी. साथ ही लोगों को नयी पीढी को परंपरागत रुप से मजबूत करने के लिए उनके लिए पूजा करने के साथ साथ लेखन और कला कौशल जैसे विषयों की प्रतियोगिताएं कराने का निर्णय लिया.

बांग्ला रीति-रिवाज से पूजा होने के बावजूद यहां बलि प्रथा का प्रचलन नहीं है.


उन्होने ध्वनि प्रदूषण के खतरों को समझते हुए और महज दूसरों को कान में धार्मिक उपदेश पहुंचाने के दिखावे को रोकने के उद्देश्य से पूजा में लाउडस्पीकर का प्रयोग वर्जित करवाया. इस तरह पूर्णिया की दुर्गाबाडी में दुर्गापूजा समाज सुधार के उद्देश्यों के साथ एक शतक से सफलतापूर्वक की जा रही है.
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सतीनाथ भादुड़ी बांग्ला साहित्य में आंचलिकता और समाज सुधार की दृष्टि रखने वाले लोगों में गिने जाते हैं और हिन्दी उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रेणु इन्हीं के विचारों से प्रभावित रहे हैं.

रिपोर्ट- राजेंद्र पाठक

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First published: October 5, 2019, 3:04 PM IST
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