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बचपन में ही निभाया था साथ देने का वादा, अब 27 साल से संजोए रखी है पत्नी की अस्थियां

News18 Bihar
Updated: September 2, 2019, 3:44 PM IST
बचपन में ही निभाया था साथ देने का वादा, अब 27 साल से संजोए रखी है पत्नी की अस्थियां
पेड़ की टहनी से टंगी ये पोटली पूर्णिया के भोलानाथ जी की स्वर्गीय पत्नी की है जिन्हें वे किस तरह से प्रेम करते थे उसका प्रमाण है

भोलानाथ आलोक कहते हैं कि उनकी बचपन मे ही शादी हो गई थी और उनकी पत्नी काफी सीधी स्वभाव व सरल ह्रदय की थीं. हम दोनों ने तब कसम ये खाई थी कि साथ जियेंगे साथ मरेंगे

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आज तीज है और यह त्यौहार होता है पत्नियों द्वारा पति के प्रेम को लेकर धार्मिक परम्परा निभाने का. तीज के इस मौैके पर हम आज बता रहे हैं पति के पत्नी प्रेम की ऐसी कहानी जिसे सुनकर आप भी हैरान हो जाएंगे. इस कहानी के नायक पति हैं जिनकी पत्नी के गुजरे सालों हो गए हैं लेकिन वो अपनी पत्नी से इस कदर प्यार करते हैं कि उनकी अस्थियों को अभी तक संजोए हुए है. इस बुजुर्ग का कहना है कि जब वो दुनिया से विदा होंगे तभी ये स्मृति भी विदा होगी.

पेड़ की टहनी पर टंगी हैं अस्थियां

पच्चासी साल से ज्यादा उम्र के भोलानाथ आलोक की पत्नी के स्वर्गवास हुए सालों बीत गए हैं लेकिन पूर्णिया के बुजुर्ग भोलानाथ आलोक अपनी पत्नी की अस्थियों को अपने घर के बगीचे में 27 सालों सुरक्षित रखे हुए हैं. पेड़ की टहनी से टंगी ये पोटली भोलानाथ जी की स्वर्गीय पत्नी की है जिन्हें वे किस तरह से प्रेम करते थे उसका प्रमाण है और साथ ही यह प्रमाण समाज के अन्य पत्नियों के प्रेम को भी एक आईना और एक राह दिखाने के लिए नजीर है.

बपचन में ही हुई थी शादी

भोलानाथ आलोक कहते हैं कि उनकी बचपन में ही शादी हो गई थी और उनकी पत्नी काफी सीधी स्वभाव व सरल ह्रदय की थीं. हम दोनों ने तब कसम ये खाई थी कि साथ जियेंगे साथ मरेंगे लेकिन ये नहीं हो सका इसलिए मरते वक्त उनकी हड्डियों से मेरी हड्डी जरुर मिल जाए इसलिए हमने अपनी अंतिम यात्रा में पत्नी की अस्थियों को उसी वादे को पूरा करने के लिए रखा है.

अंतिम यात्रा में साथ होंगी अस्थियां

भोलानाथ आलोक यह भी कहते हैं कि उन्होंने अपने बच्चों को कह रखा है कि मेरी अंतिम यात्रा में पत्नी की अस्थियों की पोटली मेरी छाती से लगाकर ही मेंरा दाह संस्कार हो. भोलानाथ जी अपनी पत्नी के प्रेम समर्पण और उनकी स्वाभाविक सरलता को याद कर सुबकने लग जाते हैं. महिला सामाजिक कार्यकर्ता मनीषा मिश्र उनकी इस तरह से स्मृति को सहेजने की बात को काफी सम्मान देती हैं और कहती हैं कि दाम्पत्य जीवन के लिए यह एक बड़ा संदेश है.
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मिसाल हैं भोलानाथ

तीज के दिन पतियों को लेकर पत्नियों का व्रत, उपवास और त्याग तो दांपत्य जीवन के प्रेम के प्रमाण की पुरानी परंपरा है ही है लेकिन इस दिन पत्नी प्रेम की याद भी कराया जाना उतना ही आवश्यक है जितना कि भोलानाथ आलोक ने सालों से पत्नी प्रेम की जो स्मृति संजोकर रखी है. इस कर्तव्य से दांपत्य जीवन का जितना गहरा संदेश निकल रहा है वह बेहद की अनूठा है.

रिपोर्ट- राजेंद्र पाठक

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First published: September 2, 2019, 3:37 PM IST
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