आज से शुरू हुआ मलमास, जानें इसका महत्व और जरूरी बातें

मलमास का मूलरुप से प्रत्यक्ष प्रभाव भारतीय परंपरा की जीवनशैली और लोकव्यवहार में मांगलिक कार्यों प्रतिबंध से जुड़ा है. इतना हीं नही मिथिला की संस्कृति में तो इस दौरान मृतक का श्राद्ध कर्म भी घर पर नहीं करके गया में करने का प्रावधान है और यह परंपरा आजतक निभाई जा रही है.

Rajendra Pathak | News18 Bihar
Updated: May 16, 2018, 8:19 PM IST
आज से शुरू हुआ मलमास, जानें इसका महत्व और जरूरी बातें
राजगीर में मलमास मेला
Rajendra Pathak | News18 Bihar
Updated: May 16, 2018, 8:19 PM IST
भारतीय पंचांग में अधिकमास  यानि मलमास की अवधारणा ज्योतिषीय कालगणना के प्रसंग में शुरु से ही है. सामान्य स्तर पर इसे सूर्य की गति में अंतर होने से होने वाले अंतर को गणितीयरुप से वर्ष पंचांग में सही करने की परंपरा माना जा सकता है. अधिकमास या मलमास को पुरुषोत्तममास भी कहा जाता है.

अधिकमास की धारणा को समझने के लिए भारतीय ज्योतिष परंपरा को मानने और सूर्य द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा करने की बात को मूल में रखा जाता है. कहा जाता है कि जिस मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती है उस मास को अधिकमास माना जाता है. अधिकमास की अवधि 32 महीने 16 दिन तथा चार घड़ी के अंतर से आता है. इस हिसाब से हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चन्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है. इसी को अधिकमास या मलमास कहते हैं. यह कालगणना आधुनिक कैलेंडर कल्चर में नहीं होती है.

पुरुषोत्तम मास में भारतीय परंपरा के वैष्णवमत की एक तरह से प्रधानता होती है. पुरुषोत्तम विष्णु का पर्याय और हजार नामों में से एक नाम है. पुरुषोत्तम मास में पार्थिव शिव पूजन की परंपरा है. इस महीने में जहां एक ओर शुभ कार्य गृहप्रवेश, मुंडन, विवाह आदि नहीं करने का प्रावधान है पर पूजापाठ करने के कई विधान बनाये हुए हैं.

मलमास में विष्णु के 33 नाम और रुपों को विशेषरुप से पूजा के लिए कर्मकांडियों ने निर्देशित कर रखा है. भारतीय परंपरा, ज्योतिष, पंचांग और सनातन धर्म में आस्था विश्वास के बगैर अधिकमास का बोध असंभव माना गया है.

देशज शब्द में इसे समग्र समाज के लोग मलमास के नाम से जानते हैं कारण यह कि अधिक और अतिरिक्त दो पखवारों को काल के अधिक खंड के रुप में यह मल रुप में एक मास सामने होता है जिसे सार्वजनिक रुप से मलमास कहा गया.

मलमास, भारतवर्ष की धार्मिक आस्था जुड़े होने के कारण संस्कृति के रुप में नदियों, धर्मस्थलों में तो दिखता हीं है. परंपरा के साथ जीवनशैली से जुड़े लोगों की दिनचर्या में भी मलमास से जुड़ी क्रियाएं शामिल हो जाती है. सुबह जगने से रात तक सोने और धार्मिक जीवनशैली में मलमास से जुड़ी कई विशेष क्रियाएं पंडित और कर्मकांडी करते रहते हैं.

बिहार के विभिन्न अंचलों में मलमास को सार्वजनिक संस्कृति के रुप में लोग मलमास मेले के रुप में देखते रहे हैं. मगध क्षेत्र का राजगीर का मेला, मलमास मेले के रुप में जमाने से जाना जाता रहा है. परंपरा के लोगों के मुताबिक राजगीर का मेला द्वापर युग से हीं चला आ रहा है. लोग मलमास के महीने में चलने वाले राजगीर के मेले में बतौर मलमास की संस्कृति के रुप में शामिल होने आते हैं.
Loading...

अरवल जिले के मेंहदिया थान क्षेत्र के मधसरवां (मधुश्रवा ) गांव में मलमास मेले का आयोजन पुराने जमाने से राजगीर की तर्ज पर हीं होता आया है.  इसी तरह बिहार के विभिन्न अंचलों के तीर्थस्थलों, नदी घाटों और प्रसिद्ध जलाशयों के किनारे भी मलमास में छोटे मेले और व्यक्तिगत आयोजन होते रहते हैं.

मलमास का मूलरुप से प्रत्यक्ष प्रभाव भारतीय परंपरा की जीवनशैली और लोकव्यवहार में मांगलिक कार्यों प्रतिबंध से जुड़ा है. इतना हीं नही मिथिला की संस्कृति में तो इस दौरान मृतक का श्राद्ध कर्म भी घर पर नहीं करके गया में करने का प्रावधान है और यह परंपरा आजतक निभाई जा रही है.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए पूर्णिया से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: May 16, 2018, 5:40 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...