जानिए- कहां और क्यों रची थी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कालजयी 'रश्मिरथी'

एक दिन दिनकर जी और द्विज जी पूर्णिया की सौरा नदी की बहती धारा को सुबह में बैठकर देख रहे थे कि अचानक एक नवजात जो किसी युवती का अवैध संतान था, पानी में बहता हुआ जा रहा था.

Rajendra Pathak | News18 Bihar
Updated: September 24, 2018, 8:46 PM IST
जानिए- कहां और क्यों रची थी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कालजयी 'रश्मिरथी'
एक दिन दिनकर जी और द्विज जी पूर्णिया की सौरा नदी की बहती धारा को सुबह में बैठकर देख रहे थे कि अचानक एक नवजात जो किसी युवती का अवैध संतान था, पानी में बहता हुआ जा रहा था.
Rajendra Pathak | News18 Bihar
Updated: September 24, 2018, 8:46 PM IST
जिसके पिता सूर्य थे, माता कुन्ती सती कुमारी,
उसका पलना हुआ धार पर बहती हुई पिटारी.
सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर,
निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्‌भुत वीर.

तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी,
जाति-गोत्र का नहीं, शील का, पौरुष का अभिमानी.
ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास,
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अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास.

रश्मिरथी की ऐसी सभी पंक्तियां राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने 1950 में पूर्णिया कॉलेज, पूर्णिया के पुस्तकालय कक्ष में साहित्य साधना कर लिखीं थीं. तब पूर्णिया कॉलेज के प्रथम प्राचार्य और हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार जनार्दन प्रसाद झा द्विज दिनकर के मित्र और मार्गदर्शी होते थे.

उस समय पूर्णिया कॉलेज का पुस्तकालय कक्ष अंदर से एकांत और अंधेरा से घिरा रहता था लेकिन इसमें ऊपर बने रोशनदान से गिरती रौशनी हालात को शांत और सर्जक कक्ष बनाती थी. जिसका लाभ रामधारी सिंह दिनकर ने लिया. अब इस पुस्तकालय कक्ष को कॉलेज ने अपनी धरोहर घोषित कर उसका संरक्षण किया है.

दिनकर जी को पूर्णिया के शांत वातावरण और कवि द्विज जी से बड़ा लगाव था. इसी वजह से उन्होंने यहां रश्मिरथी की रचना की. पूर्णिया कॉलेज का यह पुस्तकालय दिनकर जी और उनकी रचना 'रश्मिरथी' की याद यहां के लोगों को हर दिन दिलाता है.

पूर्णिया के साहित्यकार केके चौधरी बताते हैं कि दिनकर जी भागलपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक थे और वे अक्सर पूर्णिया के साहित्यिक मित्र द्विज जी से मिलने आते थे. एक दिन दिनकर जी और द्विज जी पूर्णिया की सौरा नदी की बहती धारा को सुबह में बैठकर देख रहे थे कि अचानक एक नवजात जो किसी युवती का अवैध संतान था, पानी में बहता हुआ जा रहा था.

दिनकर ने इस हालात पर कर्ण के इतिहास को याद किया और अपने कवि मित्र से कर्ण के जीवन के आरंभ से अंत करुण पक्ष पर काव्य रचना करने की बात कही. जिसके बाद द्विज जी ने पूर्णिया कॉलेज के पुस्तकालय में उनका प्रवास कराया और रचना की शुरुआत हुई.

33 दिनों में यह खंडकाव्य सूर्यपुत्र के नाम से रचा गया. बाद में जनार्दन प्रसाद झा द्विज ने इस खंडकाव्य का नाम एक बेहतर विशेषण और प्रतिमान के रूप में रश्मिरथी के नाम से देने का सुझाव दिनकर जी को दिया. जिसके बाद दिनकर जी ने अपने खंडकाव्य का नाम 'रश्मिरथी' कर दिया.

इस तरह पूर्णिया कॉलेज के पुस्तकालय और आजादी के बाद के दो हिन्दी साहित्यकारों के पारस्परिक प्रेम और सहयोग से हिन्दी साहित्य का कालजयी खंडकाव्य 'रश्मिरथी' सृजित हुआ.

पूर्णिया के साहित्यकार और पूर्णिया कॉलेज के हिन्दी विभाग के सदस्य अपने इस ऐतिहासिक सृजनस्थल पर आज भी गौरवान्वित रहते हैं.
First published: September 24, 2018, 7:42 PM IST
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