कुशोत्पाटिनी अमावस्या: साल भर की पूजा के लिए आज जुटाते हैं कुश

कुश को शुद्धता के प्रतीक वनस्पति के रूप में माना जाता है. कुश से कर्मकांडों में आवाहित को आसन देने, आचमन करने, पितृ तर्पण करने की क्रियाओं और हस्तमुद्राओं में प्रयोग किया जाता है.

Rajendra Pathak | News18 Bihar
Updated: September 9, 2018, 12:53 PM IST
कुशोत्पाटिनी अमावस्या: साल भर की पूजा के लिए आज जुटाते हैं कुश
कुश को सुरक्षित उखाड़े जाने के लिए हुनर और अभ्यास की जरूरत होती है
Rajendra Pathak | News18 Bihar
Updated: September 9, 2018, 12:53 PM IST
कुशोत्पाटिनी अमावस्या भादो माह के कृष्णपक्ष का अंतिम दिन है. इस दिन कुश को उखाड़कर पूजा करने के उद्देश्य से वर्ष भर घर में रखने की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है. कुश कास प्रजाति की वनस्पति है. कुश का उपयोग हिंदुओं के सनातन और वैदिक कर्मकांड और रिवाजों में होता है.

कुश को शुद्धता के प्रतीक वनस्पति के रूप में माना जाता है. कुश से कर्मकांडों में आवाहित को आसन देने, आचमन करने, पितृ तर्पण करने की क्रियाओं और हस्तमुद्राओं में प्रयोग किया जाता है. कुश की आसनी, चटाई के साथ ही उंगलियों में पहनी जाने वाली पैंती को महत्वपूर्ण माना गया है. पितृ तर्पण और श्राद्ध की परम्परा और कर्मकांडों में कुश की प्रधानता होती है.

कुश की उपलब्धता नदियों के कछार पर बंजर और बलुई मिट्टी के इलाकों में होती है. पूजा और कर्मकांड के लिए उपयोग होनेवाले कुश की पहचान कर्मकांड से जुड़े पंडितों को पारंपरिक रूप से होती है. प्रकृति और पूजा के प्रसंग में वनस्पतियों के फूल, पत्तों और छालों के अलावा जड़ों के उपयोग की परंपरा चली आ रही है. कुश के पत्तों और जड़ों के साथ उपयोग का रिवाज है.

कुश उखाड़ने का काम वैसे कर्मकांडी करते हैं, जिनके पिता जीवित न हों. कुश उखाड़ने से पूर्व उसे अभिमंत्रित करने का भी विधान है. कुश के चयन और उसके उत्पाटन के लिए कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार साल भर प्रतीक्षा करता है. भादो अमावस्या के बाद फिर साल के किसी अन्य दिन कुश को पूजा हेतु नहीं उखाड़ने की मान्यता है.

कुश को जड़ से उखाड़ना आसान नहीं होता. चाणक्य को कुशोत्पाटिनी विद्या का प्रवर्तक माना गया है. मगध के इलाके में सोन, गंगा, पुनपुन नदियों के तटों से और मिथिला में कोसी, कमला और अन्य नदियों के तटो और आसपास के इलाकों से कुश उखाड़ा जाता है.

परम्पराओं का वाहक भारतीय पंचांग के अनुसार भादो कृष्ण पक्ष का अंतिम दिन कुशोत्पाटिनी अमावस्या के रुप में स्थापित है. इस वर्ष यह तिथि रविवार यानी नौ सितंबर को है. प्रकृति के साथ भारतीय सनातन धर्म और परम्परा के लिए आज ही पर्याप्त मात्रा में कुश उखाड़कर घरों में रख लेने का रिवाज चला आ रहा है.

कुश के संबंध में पौराणिक मान्यता है कि भगवान श्रीहरि ने वराह अवतार ग्रहण कर हिरण्याक्ष नाम के असुर का वध किया था. इसके बाद जब वे जल से बाहर निकले तो पशु लीला करते हुए उन्होंने अपने शरीर के बालों को जोर-जोर से हिलाया कि जल निकल जाये. इस प्रकार वराह भगवान के रोम जहां गिरे वहां कुश या कुशा नामक तृण का जन्म हुआ. इसलिए कुश की काफी महत्ता है.

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First published: September 9, 2018, 12:31 PM IST
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