बाढ़ में बह गई फसल तो भी न लें टेंशन! सीडबॉल कंसेप्ट से बेहतरीन धान उगा सकते हैं किसान
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बाढ़ में बह गई फसल तो भी न लें टेंशन! सीडबॉल कंसेप्ट से बेहतरीन धान उगा सकते हैं किसान
सीड बॉल कंसेप्ट के आधार पर खेती करते बिहार के किसान.

गीली मिटटी के गोले में महज धान (Paddy) के चार दाने डालने की पूंजी पर यह पूरा सीड बॉल कंसेप्ट (Seedball concept) है. साथ ही यह शून्य जुताई के सिद्धांत पर भी आधारित है.

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पूर्णिया. बिहार के 14 जिलों की करीब 70 लाख से अधिक आबादी बाढ़ (Flood) से प्रभावित है. हजारों हेक्टेयर में लगी धान (paddy) व अन्य फसलें बह गई हैं. कई इलाके ऐसे भी हैं जहां किसानों को धान की रोपनी का भी मौका नहीं मिला. हालांकि कई ऐसे इलाके भी हैं जहां से पानी उतरने भी लगा है और अब कुछ किसान खाली जगह देख वहां धान लगा रहे हैं. लेकिन, विशेषज्ञों की मानें तो यह तरीका कारगर नहीं है. इस समस्या को देख पूर्णिया के जैविक किसान हिमकर मिश्र ने उन इलाकों में जहां बाढ़ से जमीन अब खाली हुई है, वहां सीड बॉल कंसेप्ट (Seedball concept) से धान की खेती करने की सलाह दी है.

किसान हिमकर मिश्र के इस सीड-बॉल कंसेप्ट के मुताबिक गीली मिटटी के गोले बनाकर उसमे अंकुरित धान का बीज ड़ाल देना है और उसे जगह जगह फेंक या हल्का गाड़ देना भर होता है. इनके मुताबिक सीड -बाल कंसेप्ट खेती को देश के विभिन्न भागों में सफलतापूर्वक अपनाया जा चुका है. हिमकर मिश्र कहते हैं कि सीड बाल कंसेप्ट देश के कई जगहों पर सफल है और आपदा के गुजर जाने के बाद यह पूर्णिया और कोसी के इलाके के लिए कारगर है क्यूंकि गीली मिटटी के गोले में महज चार धान के दाने डालने की पूंजी पर यह पूरा कंसेप्ट आधारित है और जीरो टिलेज यानि शून्य जुताई के सिद्धांत पर भी आधारित है.

हिमकर मिश्र ने रामनगर के अपने समर शैल नेचुरल फार्म, में भी सीड बाल का उपयोग किया है.          धान की रोपनी के लिए बहुत झमेले होते थे।खेत तैय्यार कर उसमें बीज डालना और फिर उसे एक महीने बाद दूसरे खेत में रोपनी डोभनी कराने के लिए भाग दौड़ करना एक चुनौती का काम होता है.
बिहार जहां की खेती पूर्णतः मौनसून पर निर्भर है और जहां बाढ़ एक सच्चाई है.
हिमकर मिश्र ने बतााय कि इस मेथड में धान के बीज को गाय मूत्र और पानी में रात भर रखकर गीले जूट के बोरे में छोड़ दिया जाता है. रात भर में जब बीज अंकुरित हो जाता है तो इसे देशी तरीके से तैयार ऋषि खाद जिसमें चिकनी मिट्टी, वर्मी कम्पोस्ट, राख, गो मूत्र को मिलाकर लिट्टी जैसे गोल-गोल शेप बनाते हैं.  उसके बीच में दो चार अंकुरित धान बीज रखकर उसे खेत में रख कर मिट्टी से ढक दिया जाता है. कुछ अंकुरित बीजों को ऐसे ही खेत में फेंक देंगे इससे बाढ़ से होने वाले नुकसान का भी कोई खतरा नहीं है.  साथ ही उपज भी परंपरागत रोपण से दोगुना है.



रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग न होने से पर्यावरणीय समस्याएं भी नही हैं. इससे उपजे चावल को खाने का आनंद भी अलग है. हिमकर मिश्र के इस अनोखे प्रयोग को बड़े स्तर पर देखे जाने को उत्सुक भी हैं. जाहिर है अगर किसान धान की खेती की यह नवीन पद्धति अपनाएं तो आपदा में भी अच्छी फसल ले सकते हैं और साथ ही पर्यावरण रक्षा भी कर सकते हैं.
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