Purnia : चलिए आपको लिए चलते हैं कालापानी से लेकर मिनी दार्जिलिंग तक की उपाधि वाले जिले में
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Purnia : चलिए आपको लिए चलते हैं कालापानी से लेकर मिनी दार्जिलिंग तक की उपाधि वाले जिले में
पूर्णिया को बिहार का मिनी दार्जिलिंग भी कहते हैं.

लोक रचनाकार के रूप में ख्यात और हिंदी फिल्म को हीरामन जैसा चरित्र देने वाले फणीश्वर नाथ ' रेणु ' का जन्म बिहार के अररिया जिले में हुआ था. अब का यह अररिया जिला रेणु के जन्म के समय पूर्णिया का हिस्सा था.

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  • Last Updated: September 12, 2020, 4:03 PM IST
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पूर्णिया. पूर्णिया (Purnia) शहर बिहार (Bihar) में है और राज्य की राजधानी पटना (Patna) से महज 300 किलोमीटर दूर है. शहरी और ग्रामीण आबादी के मामले में पूर्णिया शहर बिहार का चौथा सबसे बड़ा शहर है. कृषि इस जिले के निवासियों की मुख्य आजीविका है. यह अलग बात है कि हाल के वर्षों में यहां की महिलाओं ने रेशम का उत्पादन शुरू कर इस इलाके को एक नई पहचान दिलाने की कोशिश की है.

रेणु से लेकर सुशांत तक

पिछले दिनों सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) की मौत के बाद एकबार फिर से बिहार का पूर्णिया जिला सुर्खियों में रहा है. दरअसल, सुशांत सिंह राजपूत का जन्म इसी पूर्णिया में हुआ था. लेकिन क्या पूर्णिया की पहचान महज यही है या इससे इतर पूर्णिया का अपना कोई गौरवशाली इतिहास भी रहा है? इतिहास के आईने में पूर्णिया बहुत विशाल जिला हुआ करता था. यह भारत के सबसे पुराने जिलों में से एक है. पूर्णिया के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ रामेश्वर प्रसाद ने कई बरस की अनथक मेहनत के बाद यह मान्यता दी कि पूर्णिया जिले की स्थापना 14 फरवरी 1770 को हुई थी. आपको ध्यान होगा कि इस वक्त मुगल शासन अपने अवसान पर था. इसी समय ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1757 में पलासी और 1764 में बक्सर की लड़ाई लड़ी. इस जंग में बंगाल के नवाब मुगल बादशाह और अवध के नवाब को मुंह की खानी पड़ी और ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल सम्राट से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अपने नाम करा ली थी. पूर्णिया जिले की विशालता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि तब के पूर्णिया जिले में आज के पूर्णिया, अररिया (Araria), कटिहार (Katihar) और किशनगंज (Kishanganj) जिले शामिल थे, इसके अलावा बंगाल में दार्जिलिंग तक का इलाका भी इस जिले का हिस्सा था. हमसब जानते हैं कि लोक रचनाकार के रूप में ख्यात और हिंदी फिल्म को हीरामन जैसा चरित्र देने वाले फणीश्वर नाथ ' रेणु ' (Phanishwar Nath 'Renu) का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के अररिया जिले में फॉरबिसगंज के पास औराही हिंगना गांव में हुआ था. खास बात यह है कि अब का यह अररिया जिला रेणु के जन्म के समय पूर्णिया जिले का हिस्सा था.



यह है पूरण देवी मंदिर. कहते हैं कि इस जिले को इसी मंदिर की वजह से पूर्णिया नाम मिला.
यह है पूरण देवी मंदिर. कहते हैं कि इस जिले को इसी मंदिर की वजह से पूर्णिया नाम मिला.

बापू की पूर्णिया यात्रा

इतिहास बताता है कि हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने अपने जीवन में तीन बार पूर्णिया की यात्रा की. 1925, 1927 और 1934 में वे पूर्णिया आए थे. यहां 13 अक्टूबर 1925 में बापू की पूर्णिया यात्रा का जिक्र विशेष रूप से करना जरूरी है. इस यात्रा में बापू पूर्णिया शहर से 25 मील दूर एक गांव विष्णुपुर गए थे. उन्होंने इस दिन यहां एक पुस्तकालय का उद्घाटन किया था. एक जनसभा भी की थी. बापू को सुनने के लिए हजारों लोग जुटे थे. दिन में हुई जनसभा के बाद शाम में वे मातृ मंदिर नाम के पुस्तकाल में गए. उसका उद्घाटन किया. चौधरी लालचंद जी ने अपनी पत्नी की स्मृति में इस पुस्तकालय की स्थापना की थी.

रानीपतरा में सर्वोदय आश्रम

पूर्णिया जिला मुख्यालय से 8 किलोमीटर दूर रानीपतरा में ऐतिहासिक सर्वोदय आश्रम है. कहते हैं कि आजादी से पूर्व महात्मा गांधी भी इस जगह पर आए थे. इसके बाद विनोबा भावे ने सर्वोदय आश्रम में कई महीने तक रहकर भूदान आंदोलन का संचालन किया था.

जलालगढ़ का यह किला पूर्णिया में पर्यटन स्थल के रूप में ख्यात है.
जलालगढ़ का यह किला पूर्णिया में पर्यटन स्थल के रूप में ख्यात है.


जेपी ने कराया था पत्नी का इलाज

यहां के प्राकृतिक चिकित्सालय में जय प्रकाश नारायण ने तीन महीने तक रहकर अपनी पत्नी का इलाज करवाया था. बाद के दिनों में बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह का भी यहां आगमन हुआ था. 1957 में यहां उन्होंने पुस्तकालय की स्थापना करवाई थी. यह अलग बात है कि आज यह पुस्तकालय दो गुटों के वर्चस्व की लड़ाई की भेंट चढ़ रहा है. इस जगह पर रेशम, खादी वस्त्र, तेल पेराई, चरखा से लेकर कई तरह के लघु और कुटीर उद्योग चलते थे, लोभ की स्थानीय राजनीति ने इस ऐतिहासिक धरोहर को बहुत नुकसान पहुंचाया है.

सामरिक महत्व के लिहाज से महत्त्वपूर्ण

पूर्णिया का एक हिस्सा बंगाल की सीमा से जुड़ता है तो दूसरी ओर नेपाल की दूरी भी यहां से बेहद कम है. ऐसी स्थिति में सामरिक लिहाज से भारतीय मानचित्र में पूर्णिया बेहद महत्त्वपूर्ण जिला है. यही वजह है कि यहां बहुत पहले से ही भारतीय वायुसेना, एसएसबी, भारतीय सेना और सीमा सुरक्षा बल के कार्यालय हैं।

कालापानी और मिनी दार्जिलिंग

पूर्णिया के बारे में यह जानना बहुत रोचक है कि एक तरफ तो इसे बिहार का मिनी दार्जिलिंग कहा जाता है, दूसरी तरफ कभी यह कालापानी के रूप में कुख्यात था. दरअसल पूर्णिया का भूगोल बहुत अनोखा रहा है. यह तीन नदियों के त्रिकोण से घिरा हुआ है. सिर पर हिमालय पर्वत है. नदियों और हिमालय की वजह से यहां का मौसम हमेशा खुशनुमा बना रहता है. यहां पर मई-जून में ज्यादा गर्मी नहीं होती है. अगर एक-दो दिन तेज गर्मी रही भी तो फिर बारिश हो जाती है. यहां गर्मी के महीने में भी हवा तेज चलती है और उसमें काफी नमी भी होती है. कह सकते हैं यहां का मौसम दार्जिलिंग से मिलता-जुलता और यही वजह है कि पूर्णिया को बिहार का मिनी दार्जिलिंग कहा जाता है.

पहले भी कम थी यहां की आबादी

इतने सुहाने मौसम वाले इस मिनी दार्जिलिंग की आबादी अभी भी कम है. पहले और भी कम थी. लेकिन इतनी कम आबादी होने की आखिर क्या वजह है? इस सवाल का जवाब भी यहां की जलवायु और कुछ प्राकृतिक परिवर्तनों में छुपा है.

इस प्रकृति की चर्चा के क्रम में हमें यह भी जानना चाहिए कि पूर्णिया का नाम पूर्णिया क्यों पड़ा. इस नाम के पीछे कई कहानियां हैं. कुछ लोग कहते हैं कि यहां के पूरण देवी मंदिर के कारण इस इलाके को पूर्णिया नाम मिला. एक दूसरा तर्क यह भी है कि यह इलाका जंगल जैसा था, पूर्णतः जंगल. इसी पूर्ण जंगल से इस इलाके को पूर्णिया नाम मिला. बहरहाल, यह तो सच है कि पूर्णिया में घने जंगल थे. आज से करीब 100 साल पहले तक पूर्णिया का पानी पीने लायक नहीं था. इस पानी के इस्तेमाल से तरह-तरह की बीमारियां हो जाती थीं. पूरा इलाका जंगली और दलदली था. ऐसे में आबादी कैसे बसती? लेकिन 1899 और 1934 के बड़े भूकंप ने कुछ ऐसी भूगर्भीय हलचलें कीं कि यहां के पानी में बदलाव आया और इलाका थोड़ा रहने लायक हो गया. उस समय तक आसपास के इलाकों में आबादी का दबाव बढ़ने लगा था. लोग नए इलाके की खोज में पूर्णिया आने लगे. यहीं वो समय था जब बड़े पैमाने पर केंद्रीय मिथिला, बंगाल और मगध के इलाके के लोगों ने यहां प्रवेश किया. इसलिए कहा जाता है कि पूर्णिया की बसावट अपेक्षाकृत नई है. पूर्णिया में आज अपेक्षाकृत कम आबादी, खुला-खुला इलाका और हरियाली जो दिखती है, उसका कारण यही है. मिथिला और बिहार के अन्य इलाकों में पूर्णिया को कालापानी की उपाधि दी जाती थी. इस संदर्भ में एक लोकोक्ति है - ‘जहर खो, ना माहुर खो, मरै के हौ त पुरैनिया जो’. यानी अगर मरना है तो जहर-माहुर नहीं खाओ, पूर्णिया चले जाओ. बंगाल से बड़ी संख्या में लोग आकर यहां बसे हैं, इसका एक प्रमाण तो यह है कि 2011 की जनगणना के अनुसार पूर्णिया में 38.46 फीसदी आबादी मुसलिमों की है. यहां की भाषाई संस्कृति में बांगला भाषी बड़ी संख्या में मिलेंगे. यह अलग बात है कि यहां मैथिल भाषा का दबदबा है. यहां स्थित रामकृष्ण मिशन में होनेवाली दुर्गापूजा बहुत चर्चित है. बंगालियों वाले अंदाज में पूरी श्रद्धा के साथ यह पूजा इलाके में धूमधाम से संपन्न होती है. पूर्णिया में घूमने वाली जगहों में पूरणदेवी मंदिर, पीर बाबा मंदिर, जलालगढ़ का किला, काजा कोठी, माता अस्थाना आदी हैं. पूर्णिया से महज 10 किलोमीटर दूर गुलाबबाग में उत्तरी बिहार का सबसे बड़ा अन्न बाजार है.
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