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बिहार के सीमांचल इलाके में फेवरिट है यह नॉन-वेज डिश, बड़े चाव से खाते हैं इसे लोग

Rajendra Pathak | News18 Bihar
Updated: November 8, 2019, 8:18 PM IST
बिहार के सीमांचल इलाके में फेवरिट है यह नॉन-वेज डिश, बड़े चाव से खाते हैं इसे लोग
बिहार के सीमांचल और मिथिलांचल इलाके में चाव से खाया जाता है घोंघा या डोका.

बिहार के सीमांचल (Seemanchal of Bihar) इलाके में मांसाहार करने (Non-Vegetarian) वालों का पसंदीदा व्यंजन है घोंघा (Snail) या डोका. ग्रामीण परिवेश के लोग जल में रहने वाले अन्य खाद्य जीवों की तरह इसे भी बड़े चाव (Rural Indian Dish) के साथ खाते हैं.

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पूर्णिया. बिहार में स्थानीय खाद्य सामग्रियों की खूब विविधता है. इन्हीं में से एक है घोंघा (Snail) या डोका, जिसे सीमांचल (Seemanchal of Bihar) इलाके के मांसाहार पसंद करने वाले लोग बड़े चाव के साथ खाते हैं. वैसे बिहार के उत्तरी भाग में स्थित मिथिलांचल (Mithila) में भी इसे प्रमुख मांसाहारी व्यंजनों (Non-Vegetarian Food) में शुमार किया जाता है. ग्रामीण इलाकों में बहुतायत में पाया जाने वाला इस जलीय जीव (Aquatic organisms) को लोग गुणकारी और औषधीय तत्वों से भरपूर मानते हैं. इसलिए घरों में घोंघे को सब्जी या कई स्थानों पर भरता या स्थानीय भाषा में 'चोखा' के रूप में भी खाया जाता है.

मछली की तरह ही है पॉपुलर
सीमांचल और उत्तर बिहार के इलाकों में जहां जलाशयों की अधिकता है, वहां सिर्फ लोग मछलियां ही नहीं, बल्कि बल्कि घोंघा भी खाते हैं. यह वही घोंघा है जो घुमावदार कवच वाले आकार का होता है. इसे स्थानीय बोली में 'डोका' भी कहा जाता है. पूर्णिया प्रमंडल के ग्रामीण इलाकों में डोका का लोकल डिश बड़े चाव से खाया जाता है. हालांकि घोंघा खाने वाला तबका बड़ा नहीं है, लेकिन स्थानीय खाद्य सामग्री और मांसाहारी व्यंजन के रूप में यह खूब प्रचलित है. घोंघा बेचनेवाले कृष्णा सहनी कहते हैं कि हमलोग इसे तालाबों से निकालकर बेचते हैं. कृष्णा के मुताबिक पूर्णिया में 150 रुपए किलो के भाव से लेकर 100 रुपए किलो के हिसाब से यह बाजार में मिलता है.

पूर्णिया और आसपास के ग्रामीण इलाकों में इसे बड़े चाव से खाया जाता है.


मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाता है घोंघा
गांवों में घोंघा सिर्फ खाद्य सामग्री के रूप में ही नहीं जाना जाता, बल्कि कृषि कार्यों में भी इसकी उपयोगिता है. जैविक खेती विशेषज्ञ संजय बनर्जी और यहां की सामाजिक समझ रखने वाले चन्द्रशेखर मिश्र कहते हैं कि घोंघा मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाता है. इसमें कई औषधीय महत्व के रसायन होते हैं. घोंघा स्वास्थ्यवर्धक और यौवनवर्धक होने के साथ-साथ आयुवर्धक भी माना जाता है. अपने देश में जहां स्थानीय व्यंजनों की भरमार है, बिहार के पूर्वी और उत्तरी इलाके में पाया जाने वाला यह जलीय जीव यहां के आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए सबसे प्रचलित नॉन-वेज डिश है.

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First published: November 8, 2019, 8:18 PM IST
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