लाइव टीवी

Opinion: क्‍या जाति आधारित जनगणना से कोई बात बनेगी?

Neel kamal | News18 Bihar
Updated: January 16, 2020, 6:41 PM IST
Opinion: क्‍या जाति आधारित जनगणना से कोई बात बनेगी?
जाति आधारित जनगणना के बाद आरक्षण का मुद्दा बड़ा होगा.

देश में पहली बार 1931 में जातिगत आधार पर जनगणना (Census) की गई थी. इसके बाद 2011 में भी ऐसा हुआ, लेकिन इस रिपोर्ट में खामियां बताकर जारी नहीं किया गया. हालांकि लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) ने जातिगत आधार पर जनगणना की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की गुजारिश की थी.

  • Share this:
पटना. देश में पहली बार 1931 में जातिगत आधार पर जनगणना (Census) की गई थी. इसके बाद 2011 में भी ऐसा हुआ, लेकिन इस रिपोर्ट में खामियां बताकर जारी नहीं किया गया. बताया गया कि जो रिपोर्ट तैयार की गयी थी, उसमें करीब 34 करोड़ लोगों की जानकारी गलत थी. हालांकि तभी से लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) ने जातिगत आधार पर गनगणना कराने की मांग के साथ तैयार रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की गुजारिश की. जबकि अब जातिगत आधार पर जनगणना की मांग के पक्ष में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Chief Minister Nitish Kumar) भी दिखने लगे हैं. आरजेडी के अनुसार जातिगत जनगणना से यह पता चलेगी कि कौन सी जाति अभी भी पिछड़ी हुई है, ताकि उनकी संख्या के हिसाब से उन्हें आरक्षण का लाभ दिया जा सके.

आरजेडी नेता ने कही ये बात
आरजेडी नेता विजय प्रकाश ने कहा कि लालू प्रसाद जब रेल मंत्री थे तभी से जाति आधार पर जनगणना की मांग कर रहे हैं. इसमें कुछ गलत भी नहीं है, क्योंकि इससे किसी भी जाति की आर्थिक सामाजिक और शिक्षा की वास्तविक जानकारी मिल जाएगी. इसके अलावा किस जाति में कितने लोग आज भी बद्तर जिन्दगी जीने को मजबूर हैं, इसका भी आसानी से पता चल जाएगा. उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष तेजस्‍वी यादव ने 13 जनवरी को बिहार विधानमंडल के विशेष सत्र में यह मांग की थी. उन्होंने कहा कि जातिगत आधार पर जनगणना से सभी जातियों को लाभ होगा.

जाति आधारित जनगणना पर भाजपा की सोच

भाजपा का इस मुद्दे पर कहना है कि दुनिया के सभी देशो में कंप्रेहेंसिव जनगणना की जाती है. भाजपा प्रवक्ता निखिल आनंद ने कहा कि अमेरिका में काकेशियन, एशियन और एफ्रो एशियन सभी लोगों की गिनती की जाती है. भारत में भी कई तरह की गणना होती है, जिसमें पशु गणना भी शामिल है. जाति आधारित जनगणना पर संसद में कांग्रेस की सरकार के वक्त जो डिबेट हुई थी और उस वक्त सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और गोपीनाथ मुंडे ने अपनी राय रखी थी. उन्होंने कहा था कि बिहार सरकार ने कास्ट सेंसस के समर्थन में एक संकल्प पारित कर केंद्र को भेजा है. जनगणना का डेटा पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति, जनजाति, महिलाओं के लिए जो जेंडर बजट होता है उसमें काफी मदद मिलेगी. साथ ही निखिल आनंद ने कहा कि कांग्रेस के समय में जाति आधारित जो जनगणना कराई गई थी, उसे मूल जनगणना से अलग कर फ्रॉड किया गया. कांग्रेस ने सैंपल सर्वे कराया था जिसमें करोडों रुपये खर्च किये गये. कई राज्यों में जाति के आधार पर गणना भी ठीक से नहीं हुई थी और उसमें गलतियां भी थीं.

भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को 2021 में होने वाली जातिगत जनगणना का समर्थन करना चाहिए. इसके लिए सभी पार्टियों की राय बनाई जानी चाहिए, क्योंकि इससे योजना बनाने में सहुलियत होगी और जरूरत मंद लोगों तक योजना का लाभ पहुंचेगा. साथ ही भाजपा का मानना है कि जात आधारित राजनीति करने वाले अगर इसका राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करेगें तो फेल हो जाएंगे.

 जनगणना पर काम करने वाले पाण्डेय का डर
जनगणना पर वर्षों से काम काम कर रहे पूर्व बिहार विधान पार्षद हरेन्द्र प्रताप पाण्डेय का कहना है कि जातिगत आधारित जनगणना से देश को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है. क्योंकि जातिगत आधार पर जब किसी को यह पता चलेगा कि उनकी संख्या घट रही है, वो जाति परिवार नियोजन को अपनाना छोड़ सकती है, जिससे देश की जनसंख्या में और भी अधिक तेजी से बृद्वि हो सकती है. हालांकि उन्होंने कहा कि अगर राजनीतिक दल जातिगत जनगणना का राजनीतिकरण नहीं करें तो इसके आधार पर लोगों की वास्तविक स्थिति का आकलन हो सकता है, लेकिन इसकी संभावना काफी कम है.

कितनी थी 2011 में हिन्दू ,मुस्लिम, सिख और ईसाई जनसंख्या
हरेन्द्र प्रताप पाण्डेय ने बताया कि साल 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 16.76 फीसद रही. जबकि 2001 की जनगणना में यह दर 19.92 फीसद थी यानी देश की कुल आबादी में जुड़ने वाले हिंदुओं की तादाद में 3.16 प्रतिशत की कमी आई है. 2011 जनगणना में भारत में मुसलमानों की आबादी 24.6 फीसदी की दर से बढ़ी है. हालांकि 2001 की तुलना में करीब एक फीसदी की गिरावट थी. ये कहा जा सकता है कि भारत में मुसलमानों की दर अब भी हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक है. जबकि ईसाइयों की जनसंख्या वृद्धि दर 15.5 फीसदी, सिखों की 8.4 फीसदी, बौद्धों की 6.1 फीसदी और जैनियों की 5.4 फीसदी है. 2011 जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश में हिंदुओं की आबादी 96.63 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 79.8 है. वहीं मुसलमानों की आबादी 17.22 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 14.23 फीसदी होता है. ईसाइयों की आबादी 2.78 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 2.3, सिखों की आबादी 2.08 करोड़ यानी 2.16 फीसदी और बौद्धों की आबादी 0.84 करोड़ यानी 0.7 फीसदी है. जबकि 2011 में 29 लाख लोगों ने जनगणना में अपने धर्म का जिक्र नहीं किया. कुल मिलाकर 2001 से 2011 के दौरान देश की जनसंख्या 17.7 फीसदी की दर से बढ़ी थी.

बहरहाल,देश में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर बनाने का काम शुरू हो चुका है. केन्द्र सरकार द्वारा यह स्पष्ट किये जाने के बाद भी कि इसमें लोगों को किसी प्रकार का प्रमाण नहीं देना है, बावजूद इसके देश में बवाल हो रहा है. केन्द्र सरकार के विरोधी दल और तथाकथित बुद्दिजीवियों की ओर से लगातार यह भी कहा जा रहा है कि अगर सर्वे करने वाले आये तो उन्हे झूठी जानकारी दे दें.ऐसे में अगर जाति आधारित जनगणना बनाने की कोशिश भी की गयी तो क्या गारंटी है कि आंकड़े सही आएंगे.

 

ये भी पढ़ें-

दही-चूड़ा भोज के बाद कांग्रेस के बदले सुर, तेजस्‍वी नहीं इसे बताया CM चेहरा

 

RJD विधायक बोले- वोट की खातिर प्रतिरोध यात्रा कर रहे हैं तेजस्वी यादव

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए पटना से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: January 16, 2020, 6:38 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर