बिहार के सासाराम में 'नामदार बनाम कामदार' की लड़ाई, मीरा कुमार को पिता की विरासत का सहारा

बिहार की आरक्षित सीट सासाराम पर छेदी पासवान का सीधा मुकाबला पूर्व लोकसभा स्पीकर और कांग्रेस प्रत्याशी मीरा कुमार से है.

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Updated: May 16, 2019, 3:30 PM IST
बिहार के सासाराम में 'नामदार बनाम कामदार' की लड़ाई, मीरा कुमार को पिता की विरासत का सहारा
बिहार के सासाराम में 'नामदार बनाम कामदार' की लड़ाई (image credit: News18/Reuters/File)
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Updated: May 16, 2019, 3:30 PM IST
बीजेपी प्रत्याशी और बिहार के सासाराम से मौजूदा सांसद छेदी पासवान का कहना है कि उनकी सीट पर नामदार और कामदार के बीच सीधी लड़ाई है. इस आरक्षित सीट पर छेदी पासवान का मुकाबला पूर्व लोकसभा स्पीकर और कांग्रेस प्रत्याशी मीरा कुमार से है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ नामदार बनाम कामदार के नारे को छेदी पासवान ने अपना चुनावी तकिया कलाम बना लिया है.

मीरा कुमार पर टिप्पणी करते हुए पासवान ने कहा कि वो एक आम आदमी हैं और कांग्रेस प्रत्याशी की तरह चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा नहीं हुए हैं. पासवान ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी वंशवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं जबकि वो खुद स्थानीय स्तर पर ऐसा कर रहे हैं. छेदी पासवान का कहना है कि संसद सत्र छोड़कर बाकी समय वो सासाराम में ही रहते हैं जबकि उनकी प्रतिद्वंदी मीरा कुमार ने पूर्व में अपनी जीत के बाद बमुश्किल ही इस संसदीय क्षेत्र का दौरा किया है.



विकास कार्यों को याद करा रही हैं मीरा

वहीं कांग्रेस प्रत्याशी मीरा कुमार अपने पिता और महान नेता बाबू जगजीवन राम की ओर से इस पिछड़े संसदीय क्षेत्र में कराए गए विकास कार्यों को याद करा रही हैं. वो केवल परिवार के नाम पर ही वोट नहीं मांग रही हैं बल्कि बतौर सांसद अपने दो कार्यकालों ( 2004 और 2009) के दौरान कराए गए कामों की भी गिनती करा रही हैं.

19 मई को सातवें और अंतिम चरण के चुनाव में यहां वोटिंग होनी है. पूर्व उप-प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम का इस संसदीय क्षेत्र से पुराना नाता रहा है. यहां से उन्होंने रिकॉर्ड आठ बार, 1952 से 1984 के बीच लगातार जीत दर्ज़ की थी.

जगजीवन राम ने लड़ी थी लंबी लड़ाई 

बाबू जगजीवन राम ने छुआछूत जैसी कुरीतियों को समाप्त करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और बिहार के इस पिछड़े क्षेत्र को औद्योगिक केंद्र बनाने की दिशा में काम किया. उन्हीं के अथक प्रयासों से कई बड़े उद्योग यहां स्थापित हुए. ब्रिटिश काल में बनाई गई सोन नहर प्रणाली को पुनर्निर्मित करने की दिशा में काम किया जिससे वहां के किसानों को सिंचाई की सुविधा मिले.छेदी पासवान को मोदी के करिश्मे का सहारा

लेकिन चुनाव का आखिरी चरण के आते-आते ये मुद्दे अब पीछे चले गए हैं और अभियान मूल रूप से जातिवाद और प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच वर्चस्व की लड़ाई तक सीमित रह गया है. बीजेपी प्रत्याशी मोदी के करिश्मे को भुनाने में लगे हैं. छेदी पासवान इस सीट से दो बार-1989 और 1991 में जीत दर्ज़ कर बाबू जगजीवन राम की विरासत में सेंध मार चुके हैं.

बीएसपी के मनोज कुमार भी हैं मुकाबले में

राष्ट्रीय जनता दल के समर्थन के साथ कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि वो मुस्लिमों और यादवों का वोट हासिल करने में कामयाब होगी. उम्मीद लगाई जा रही है कि उन्हें कुशवाहा समाज का भी वोट हासिल होगा, क्योंकि वो खुद इसी समाज से आने वाले एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार की बहू हैं. इस बार उनका सामना बीएसपी के मनोज कुमार से भी है. इस इलाके में बड़ी संख्या में दलित वोट होने के कारण इस बार बीएसपी प्रमुख मायावती ने इस क्षेत्र के रास्ते बिहार में कदम रखने का निर्णय लिया.

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