खंडहर में तब्दील हुआ समस्तीपुर का मशहूर ठाकुर पेपर मिल

कई सरकारें आई और गई लेकिन किसी ने ठाकुर पेपर मिल के तरफ मुड़ कर नहीं देखा और मिल का अस्तित्व आज के तारीख में पूरी तरह से खत्म हो गया है.

News18 Bihar
Updated: August 22, 2019, 8:06 PM IST
खंडहर में तब्दील हुआ समस्तीपुर का मशहूर ठाकुर पेपर मिल
ठाकुर पेपर मिल के बचे कुछ भग्नावशेष
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Updated: August 22, 2019, 8:06 PM IST
बिहार (Bihar) में समस्तीपुर (Samastipur) जिला 14 नवंबर 1972 को अस्तित्व में आया लेकिन उससे पूर्व 7 जुलाई 1954 में उस वक्त दरभंगा जिला अंतर्गत समस्तीपुर के जितवारपुर में ठाकुर पेपर मिल (Thakur Paper Mill) अस्तित्व में आया. इस पेपर मिल की स्थापना शहर के प्रतिष्ठित कारोबारी राम विनोद शर्मा के द्वारा किया गया जिसमें राज्य सरकार के 49 प्रतिशत शेयर हुआ करता था. मिल में राज सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर जिला अधिकारी हुआ करते थे. लेकिन आज के तारीख में पेपर मिल के महज कुछ भग्नावशेष ही बचे हैं.

ठाकुर पेपर मिल में बनने वाले कागज की मांग बाजार में बहुत थी. कोलकाता, मुंबई, दिल्ली सहित कई राज्यों में यहां की कागज अपनी धूम मचाया करते थे. इस मिल के सहारे हजारों परिवार चलती थी. 345 कामगारों को अस्थाई रूप से इस मिल में नौकरी मिली हुई थी. वहीं सैकड़ों की संख्या में दैनिक मजदूर भी यहां पर काम करते थे.

समस्तीपुर स्थित ठाकुर पेपर मिल के भग्नावशेष


1972 में पहली बार वामपंथी मजदूर यूनियन के दवाब में हुई थी तालाबंदी 

उस वक्त के ठाकुर पेपर मिल श्रमिक संघ के सचिव भाग्य नारायण राय बताते हैं कि ठाकुर पेपर मिल पर 1972 में पहली बार वामपंथी मजदूर यूनियन के दवाब में तालाबंदी हुई थी. उस वक्त वामपंथी मजदूर यूनियन का नेतृत्व चतुरानन मिश्र कर रहे थे. देश के मशहूर उद्योगपति डालमिया के हाथों 1974 में मिल को बेच दिया गया. लेकिन वामपंथी मजदूर यूनियनों का दबाव यहां भी बरकरार रहा जिसके कारण डालमिया भी मिल को बंद कर वर्ष 1977 में देश के मशहूर उद्योगपति बीके झुनझुनवाला के हाथों बेच दिया. लेकिन मिल में यूनियनबाजी कम नहीं हुई.

कामगारों को नहीं मिली ग्रेच्युटी और प्रोविडेंट फंड की राशि 
मिल कैसे चले इसको लेकर के स्थानीय स्तर पर मिल के अंदर सक्रिय यूनियन के खिलाफ आवाज उठने लगी जिसके परिणाम स्वरूप स्थानीय लोगों के नेतृत्व में ठाकुर पेपर मिल श्रमिक संघ का गठन हुआ. उसके बाद वामपंथी मजदूर यूनियन का दवाब मिल पर से कम हुआ लेकिन तमाम प्रयास के बावजूद महज 2 साल तक ही मिल चल सके. जिसके बाद कई सरकारें आई और गई लेकिन किसी ने ठाकुर पेपर मिल के तरफ मुड़ कर नहीं देखा और मिल का अस्तित्व आज के तारीख में पूरी तरह से खत्म हो गया है. इस मिल में काम करने वाले कामगार की मौत भी हो चुकी है लेकिन इनके ग्रेच्युटी और प्रोविडेंट फंड की राशि अब तक इन्हें नहीं मिली.
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वक्त बदले परिस्थिति बदली और खत्म हो गया उस मशहूर ठाकुर पेपर मिल का अस्तित्व जिसकी चर्चा आज भी किताबों में मिलती है. समस्तीपुर के उद्योग की चर्चा होती है तो उसमें एक नाम ठाकुर पेपर मिल का भी आता है. जितवारपुर के स्थानीय लोग भी मिल के बारे में बताते हुए भावुक हो जाते हैं. उनका आरोप है कि इस मिल को लेकर कोई भी जनप्रतिनिधि ने ध्यान नहीं दिया जिसके कारण हजारों हाथों को रोजगार देने वाला यह मिल सदा के लिए खत्म हो गया.

(रिपोर्ट- मुकेश कुमार) 

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First published: August 22, 2019, 8:04 PM IST
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