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शर्मनाक: आजादी के 75 वर्षों बाद भी सीतामढ़ी के इस इलाके में खटिया है स्ट्रेचर और नाव बना एंबुलेंस

शर्मनाक: आजादी के 75 वर्षों बाद भी सीतामढ़ी के इस इलाके में खटिया है स्ट्रेचर और नाव बना एंबुलेंस

बिहार के सीतामढ़ी में खटिया के सहारे मरीज को नाव तक ले जाया जाता है.

बिहार के सीतामढ़ी में खटिया के सहारे मरीज को नाव तक ले जाया जाता है.

Bihar: न्यूज 18 हिन्दी आपको बिहार के सीतामढ़ी जिले के एक कुछ ऐसे गावों की तस्वीर दिखाने जा रहा है, जहां आजादी के 75 साल बाद भी लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था मिलना एक तरह से सपने जैसा है. तभी तो 6 महीने से भी अधिक समय तक इस गांव के लोग एक स्ट्रेचर और एंबुलेंस तक के लिए तरस जाते हैं.

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सीतामढ़ी. बिहार में बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था (Poor Health System Of Bihar) की तस्वीरें तो आप अक्सर देखते हैं. लेकिन, आज न्यूज 18 हिन्दी आपको बिहार के सीतामढ़ी जिले के एक कुछ ऐसे गावों की तस्वीर दिखाने जा रहा है, जहां आजादी के 75 साल बाद भी लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था मिलना एक तरह से सपने जैसा है. तभी तो साल के 6 महीने से भी अधिक समय तक इस गांव के लोग एक स्ट्रेचर और एंबुलेंस तक के लिए तरस जाते हैं. दरअसल सीतामढ़ी (Sitamadhi) जिले के रुन्नीसैदपुर  प्रखंड के बागमती नदी के गोद में बसे रक्सिया, बघौनी, शिवनगर, भादाडीह समेत आधा दर्जन गांव के लोग 6 से 8 महीने तक खटिया को स्ट्रेचर और नाव को एंबुलेंस बनाकर मरीजों को अस्पताल तक ले जाते हैं. बता दें, ये सारे गांव दो तरफ से बागमती नदी से घिरे हुये हैं. यहां आज भी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है. नाव ही एक मात्र सहारा है, जिसके सहारे लोग आवागमन करते हैं.

बताया जाता है कि बाढ़ (Bihar Flood) के दौरान तो यहां जिंदगी पूरी तरह से पटरी से उतर जाती है. स्थानीय लोगों के अनुसार एक तो बाढ़ का कहर और दूसरा प्रशासनिक उदासिनता दो प्रमुख वजह से हैं जिसकी वजह से लोग काफी संघर्ष का सामना करना पड़ता है. ग्रामीण हबीबुल्ला का कहना है कि पिछले लंबे अरसे से पूरा गांव इस समस्या का सामना कर रहा है. आज तक किसी अधिकारी या सरकार की तरफ से उनकी समस्याओं को जानने की कोशिश नहीं की गई. हमेशा नाव के जरिए ही गंभीर रूप से बीमार लोगों को अस्पताल ले जाने का काम किया जाता है.

लोगों की मांग पर किसी ने नहीं दिया ध्यान
यह क्षेत्र सर्वाधिक बाढ़ से प्रभावित रहता है. इसलिये सरकार के द्वारा चापाकाल का निर्माण भी ऊंचे स्थलों पर ही कराया जाता है. पूरे इलाके में हेल्थ सिस्टम के नाम पर कुछ नहीं है, गांव में ना तो कोई सरकारी अस्पताल है और ना ही कोई उप स्वास्थ्य केंद्र. अगर अचानक किसी की तबीयत खराब हो जाये तो स्ट्रेचर के रुप मे लोगों को खटिया का इस्तेमाल करना पड़ता है और एंबुलेंस के रूप में नाव का. सामान्य दिनों में भी नाव के सहारे लोगों को अस्पताल तक ले जाने में बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है. वहीं बाढ़ के दौरान जान जोखिम में डालना पड़ता है. स्थानीय निवासी अमित ने बताया कि गांव के लोग पिछले लंबे अरसे से अपने इलाके में स्वास्थ्य व्यवस्था के लिये अस्पताल खोले जाने की मांग कर रहे हैं. लेकिन, अब तक उनकी मांग पूरी नहीं हो पायी है. वहीं गांव के लोगों ने नदी में पुल बनाने की मांग भी कर चुके हैं लेकिन आजादी के 75 वर्षों बाद भी यहां अब तक पुल नहीं बन पाया है.

क्या कहते हैं अधिकारी

इस संबंध में सीतामढ़ी के डीपीआरओ परिमल कुमार से पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि जल्द से जल्द इस मामले में जिला प्रशासन कार्य करेगा. जिलाधिकारी को इस मामले से अवगत कराया जाएगा और उनके उनके संज्ञान में बात को लेकर स्वास्थ्य विभाग से कोडिनेट कर इलाके में जल्द से जल्द हेल्थ सेंटर खोले जाने का कार्य किया जाएगा.

Tags: 75th Independence Day, Bihar News, Bihar News in hindi, Health Minister, Rural Health Service

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