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बिहार: लोगों के जेहन में आज भी जिंदा है 'सीवान के साहेब' के खौफ का वह दौर

मोहम्मद शहाबुद्दीन (फाइल फोटो)

मोहम्मद शहाबुद्दीन (फाइल फोटो)

मैंने गोपी से शहाबुद्दीन के बारे में चर्चा शुरू करना चाहा और पूछा कि शहाबुद्दीन के बारे में बताइये. रिक्शेवाले गोपी ने अपने रिक्शे को तुरंत सड़क के किनारे लगा दिया और मुझसे हाथ जोड़कर बोला उतर जाइए...

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बिहार का सीवान जिले की पहचान दो वजहों से है. एक ये कि इसी जिले में सबसे अधिक विदेशी पैसों की आवक होती है. यहां की अर्थव्यवस्था को मनीऑर्डर इकोनॉमी कहा जाता है. दूसरा यहां होने वाला अपराध. जेल की सलाखों में कैद मोहम्मद शहाबुद्दीन की कभी यहां तूती बोलती थी. तब लालू-राबड़ी का शासन हुआ करता था. लेकिन 2005 के बाद नीतीश कुमार के शासनकाल में फिजा तो जरूर बदली है, लेकिन 'सीवान के साहेब' का दौर लोगों के जेहन में आज भी जिन्दा है.

एक वाकया जो मेरे साथ घटित हुआ था इसकी चर्चा कर रहा हूं. वर्ष 2002 में जब मैं एक रिपोर्ट के सिलसिले में सीवान पहुंचा तो रिक्शे पर बैठा. रिक्शेवाले का नाम गोपी यादव था. उस दौर में सीवान में शहाबुद्दीन की चलती थी इसे मैं भी जानता था, लेकिन बहुत गहराई से नहीं.

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मैंने गोपी से शहाबुद्दीन के बारे में चर्चा शुरू करना चाहा और पूछा कि शहाबुद्दीन के बारे में बताइये. रिक्शेवाले गोपी ने अपने रिक्शे को तुरंत सड़क के किनारे लगा दिया और मुझसे हाथ जोड़कर बोला उतर जाइए... अब मैं आपको आगे नहीं ले जा पाऊंगा.
मैं हैरत में पड़ गया कि इसे अचानक क्या हुआ? मैंने उससे पूछा कि क्या वजह है भाई... ऐसा क्यों कर रहे हो? गोपी ने कहा- आपने 'साहेब' को नाम लेकर बुला लिया इसलिए अब मैं आपको आगे नहीं ले जा पाऊंगा.

वर्ष 2016 में जेल से रिहा होने के बाद लालू यादव को मिठाई खिलाते हुए मोहम्मद शहाबुद्दीन


मैंने उसकी बात समझी और रिक्शे से उतर गया. उसका वाजिब किराया दिया और बगल एक चाय दुकान पर खड़ा हो गया. चाय वाले से मैंने इस बात की चर्चा कर दी. चायवाले ने दबी जुबान में मुझे बताया कि यहां 'साहेब' का कोई नाम नहीं लेता है.

चायवाले ने बताया कि 'साहेब' के लोगों को पता लग जाएगा तो मेरी भी खैर नहीं. इसलिए आप चाय पीजिए और चले जाइये. यहां स्पष्ट कर दूं कि सीवान में 'साहब' भी नहीं कह सकते थे, उन्हें 'साहेब' कहना पड़ता था... ये था 'सीवान के साहेब' का खौफ!

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मोहम्मद शहाबुद्दीन का जन्म 10 मई 1967 को सीवान जिले के प्रतापपुर में हुआ था. राजनीति में एमए और पीएचडी करने वाले शहाबुद्दीन ने हिना शहाब से शादी की थी. उनका एक बेटा और दो बेटी हैं. शहाबुद्दीन ने कॉलेज से ही अपराध और राजनीति की दुनिया में कदम रखा था.

किसी फिल्मी किरदार से दिखने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन की कहानी भी फिल्मी सी लगती है. उन्होंने कुछ ही वर्षों में अपराध और राजनीति में काफी नाम कमाया. 1986 में उनके खिलाफ पहला आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ था. इसके बाद उनके नाम एक के बाद एक कई आपराधिक मुकदमे लिखे गए.

शहाबुद्दीन के बढ़ते हौंसले को देखकर पुलिस ने सीवान के हुसैनगंज थाने में शहाबुद्दीन की हिस्ट्रीशीट खोल दी. ए श्रेणी का हिस्ट्रीशीटर घोषित कर दिया गया. छोटी उम्र में ही अपराध की दुनिया में शहाबुद्दीन जाना माना नाम बन गया. उनकी ताकत बढ़ती जा रही थी.

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राजनीतिक गलियारों में शहाबुद्दीन का नाम उस वक्त चर्चाओं में आया जब शहाबुद्दीन ने लालू प्रसाद यादव की छत्रछाया में जनता दल की युवा इकाई में कदम रखा. पार्टी में आते ही शहाबुद्दीन को अपनी ताकत और दबंगई का फायदा मिला. पार्टी ने 1990 में विधान सभा का टिकट दिया. शहाबुद्दीन जीत गए.

इसके बाद फिर से 1995 में चुनाव जीता. इस दौरान कद और बढ़ गया. ताकत को देखते हुए पार्टी ने 1996 में उन्हें लोकसभा का टिकट दिया और शहाबुद्दीन की जीत हुई. 1997 में राष्ट्रीय जनता दल के गठन और लालू प्रसाद यादव की सरकार बन जाने से शहाबुद्दीन की ताकत बहुत बढ़ गई थी.

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2001 में राज्यों में सिविल लिबर्टीज के लिए पीपुल्स यूनियन की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि राजद सरकार कानूनी कार्रवाई के दौरान शहाबुद्दीन को संरक्षण दे रही थी. सरकार के संरक्षण में वह खुद ही कानून बन गए थे.

पुलिस शहाबुद्दीन की आपराधिक गतिविधियों की तरफ से आंखे बंद किए रहती थी. शहाबुद्दीन का आतंक इस कदर था कि किसी ने भी उस दौर में उनके खिलाफ किसी भी मामले में गवाही देने की हिम्मत नहीं की. सीवान में उनकी इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था.

मोहम्मद शहाबुद्दीन का बेटा ओसामा


ताकत के नशे में चूर मोहम्मद शहाबुद्दीन पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को कुछ नहीं समझते थे. आए दिन अधिकारियों से मारपीट करना उनका शगल बन गया था. यहां तक कि वह पुलिस वालों पर गोली चला देते थे.

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मार्च 2001 में जब पुलिस राजद के स्थानीय अध्यक्ष मनोज कुमार पप्पू के खिलाफ एक वारंट तामील करने पहुंची थी तो शहाबुद्दीन ने गिरफ्तारी करने आए अधिकारी संजीव कुमार को थप्पड़ मार दिया था. उनके आदमियों ने पुलिस वालों की पिटाई की थी.

इसके बाद पुलिस ने मनोज और शहाबुद्दीन की गिरफ्तारी करने के मकसद से शहाबुद्दीन के घर छापेमारी की थी. इसके लिए बिहार पुलिस की टुकड़ियों के अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस की मदद भी ली गई थी. छापे की उस कार्रवाई के दौरान दो पुलिसकर्मियों समेत 10 लोग मारे गए थे.

पुलिस के वाहनों में आग लगा दी गई थी. मौके से पुलिस को 3 एके-47 भी बरामद हुई थी. शहाबुद्दीन और उसके साथी मौके से भाग निकले थे. इस घटना के बाद शहाबुद्दीन पर कई मुकदमे दर्ज किए गए थे.

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2000 के दशक तक सीवान जिले में शहाबुद्दीन एक समानांतर सरकार चला रहे थे. उनकी एक अपनी अदालत थी. जहां लोगों के फैसले हुआ करते थे. वह खुद सीवान की जनता के पारिवारिक विवादों और भूमि विवादों का निपटारा करते थे. यहां तक के जिले के डॉक्टरों की फीस भी वही तय किया करते थे.

कई घरों के वैवाहिक विवाद भी वह अपने तरीके से निपटाते थे. वर्ष 2004 में लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने कई जगह खास ऑपरेशन किए थे. जो मीडिया की सुर्खियां बन गए थे.

1999 में एक सीपीआई (एमएल) कार्यकर्ता के अपहरण और संदिग्ध हत्या के मामले में शहाबुद्दीन को लोकसभा 2004 के चुनाव से आठ माह पहले गिरफ्तार कर लिया गया था. लेकिन चुनाव आते ही शहाबुद्दीन ने मेडीकल के आधार पर अस्पताल में शिफ्ट होने का इंतजाम कर लिया.

साल 2004 के चुनाव के बाद शहाबुद्दीन के खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए. नवंबर 2005 में बिहार पुलिस की एक विशेष टीम ने दिल्ली में शहाबुद्दीन को उस वक्त दोबारा गिरफ्तार कर लिया था जब वह संसद सत्र में भागीदारी करने के लिए पहुंचे थे.

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दरअसल सीवान के प्रतापपुर में एक पुलिस छापे के दौरान उनके पैतृक घर से कई अवैध आधुनिक हथियार, सेना के नाइट विजन डिवाइस और पाकिस्तानी शस्त्र फैक्ट्रियों में बने हथियार बरामद हुए थे. हत्या, अपहरण, बमबारी, अवैध हथियार रखने और जबरन वसूली करने के दर्जनों मामले शहाबुद्दीन पर हैं.

अदालत ने 2009 में शहाबुद्दीन के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी. उस वक्त लोकसभा चुनाव में शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब ने पर्चा भरा था. लेकिन वह चुनाव हार गई. शहाबुद्दीन पर एक साथ कई मामले चल रहे हैं और कई मामलों में उन्हें सजा सुनाई जा चुकी है और दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद हैं.

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