2020 के विधानसभा चुनाव से पहले कई इलेक्शन तय करेंगे महागठबंधन का भविष्य!

महागठबंधन फिलहाल कहने को ही दिख रहा है. सभी अपनी-अपनी नाव पर सवार हैं. अगर विधानसभा उपचुनाव, राज्यसभा और विधान परिषद के चुनावों में एकजुटता दिखी तो ठीक नहीं तो अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में सभी दल अलग-अलग होकर या फिर अलग बैनर के साथ मैदान में दिखे, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.

Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: August 28, 2019, 3:51 PM IST
2020 के विधानसभा चुनाव से पहले कई इलेक्शन तय करेंगे महागठबंधन का भविष्य!
तेजस्वी यादव के सामने सिर्फ महागठबंधन के नेता ही साथ बनाए रखना ही चुनौती नहीं हैं, बल्कि उन्हें अब अपने आपको पार्टी के भीतर ही साबित करना है कि वे नेता बनने के लायक हैं या नहीं.
Deepak Priyadarshi
Deepak Priyadarshi | News18 Bihar
Updated: August 28, 2019, 3:51 PM IST
एनडीए (NDA) और खासकर बीजेपी (BJP) को काबू में करने के लिए बिहार में बना महागठबंधन एकजुट होकर और पूरी ताकत के साथ 2019 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) में उतरा, लेकिन चुनाव परिणाम ने इस एकजुटता की ऐसी हवा निकाली कि पूरा महागठबंधन तार-तार हो गया. 40 में से 39 लोकसभा सीटों पर करारी हार मिली. हालत यह हो गई है कि महागठबंधन के सबसे बड़े चेहरा तेजस्वी यादव चुनाव परिणामों के बाद अगले चार महीने के लिए राजनीति से गायब हो गए.

अब तेजस्वी यादव फिर लौट आए हैं और महागठबंधन को फिर से समेटकर खड़ा करने की कवायद शुरू हुई है. विपक्षी नेता एकजुटता का दावा तो कर रहे हैं लेकिन सबके मन के भीतर अब एक गांठ है. टारगेट अब 2020 में होने वाला बिहार विधानसभा चुनाव है, लेकिन महागठबंधन कितना एकजुट रहेगा, यह सबकुछ इस वर्ष नवंबर से विधानसभा उपचुनाव, और अगले साल अप्रैल मई में राज्यसभा और विधानपरिषद के चुनावों में तय हो जाएगा.


तेजस्वी यादव अज्ञातवास से लौट आए हैं जिसके बाद उन्होंने महागठबंधन को फिर समेटकर खड़ा करने की कवायद शुरू की है (File Photo)



सबकी निगाहें 2020 के विधानसभा चुनाव पर
बिहार की राजनीति में इस समय एक अजीब सी शून्यता है. कहां क्या होगा, सटीक तौर पर कोई कुछ भी नहीं कह सकता. लोकसभा चुनाव तो हो गया, और अब सबकी निगाहें 2020 के विधानसभा चुनाव पर हैं. बिहार का महागठबंधन जो लोकसभा चुनाव के बाद पूरी तरह बिखर गया, अब फिर से एकजुट होने की कोशिश में लग गया है. लेकिन महागठबंधन की लिटमस टेस्ट होना बाकी है. विधानसभा चुनाव से पहले अभी कई चुनाव होने हैं.
Loading...

ये भी पढ़ें- 'अनंत सिंह को देशद्रोही घोषित करने की हो रही तैयारी'

लोकसभा चुनाव में विधानसभा की पांच सीटें खाली
लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा की पांच सीटें दरौंदा, सिमरी बख्तियारपुर, नाथनगर, किशनगंज और बेलहर खाली हुईं हैं, जिनपर उपचुनाव होंगे. इसके अलावा एलजेपी सांसद रामचंद्र पासवान के निधन के बाद समस्तीपुर लोकसभा सीट भी खाली हो गई है. संभावित तौर पर लोकसभा की एक और विधानसभा की पांच सीटों पर उपचुनाव नवंबर में करवाए जाएंगे. साथ ही जेडीयू के ललन सिंह और एलजेपी के पशुपति पारस के सांसद बनने के बाद विधान परिषद की भी दो सीटें खाली हुई हैं.

तेजस्वी यादव लोकसभा चुनाव में पार्टी को मिली करारी हार के सदमे से उबर नहीं पाए और वो अगले कुछ महीनों तक बिहार की राजनीति से दूर हो गए (फाइल फोटो)


हालांकि अभी इनकी तारीखें घोषित नहीं हुई हैं, लेकिन संभावित तौर पर इन दोनों सीटों पर चुनाव नवंबर के आसपास ही होंगे. अगले साल यानी 2020 में दो और बड़े चुनाव हैं. अप्रैल में राज्यसभा की पांच सीटें खाली हो रही हैं. जिनपर चुनाव होंगे साथ ही मई में सदस्यों का कार्यकाल पूरा होने के कारण विधानपरिषद की 29 सीटें खाली होंगी. ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले बिहार में चार चुनाव अभी होने बाकी हैं.

महागठबंधन की समस्या
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या जिस तरह से महागठबंधन का हश्र लोकसभा चुनाव में हुआ, आने वाले दिनों में भी वैसा ही हाल होगा. महागठबंधन में सबसे बड़ी समस्या इस बात को लेकर है कि तेजस्वी यादव के चेहरे को आगे कर आरजेडी, कांग्रेस, हम, RLSP और वीआईपी जैसा पार्टियां चुनाव में उतरी थीं. लेकिन चुनाव परिणाम के बाद आरजेडी को छोड़कर सभी पार्टियों ने तेजस्वी को फिलहाल महागठबंधन का नेता मानने से इनकार कर दिया है.

लोकसभा चुनाव नतीजों में महागठबंधन का जो हश्र हुआ, उससे कयास लगने लगे हैं कि विपक्षी दलों का ये गठजोड़ क्या आगे चल पाएगा 


बीते 27 अगस्त को जब लंबे अंतराल के बाद महागठबंधन के नेताओं ने पटना में बैठक की, लेकिन जब तेजस्वी यादव को महागठबंधन का नेता मानने की बारी हुई तो सभी दलों ने यह कहते हुए साफ इनकार कर दिया कि अभी यह तय नहीं है. कांग्रेस और जीतनराम मांझी की पार्टी हम ने तो लोकसभा चुनाव के बाद से ही तेजस्वी यादव को अपना नेता मानने से इनकार कर दिया था. अब सवाल यह है कि जब दलों और नेताओं के मन में इतनी गांठ है तो क्या आने वाले उपचुनावों और बाद में होने वाले विधानसभा चुनाव में एकजुटता रहेगी?

तेजस्वी यादव के सामने चुनौती
तेजस्वी यादव के सामने सिर्फ महागठबंधन के नेताओं को ही साथ बनाए रखना चुनौती नहीं हैं, बल्कि उन्हें अब अपने आप को पार्टी के भीतर भी साबित करना है कि वो नेता बनने के लायक हैं या नहीं. क्योंकि पहले चुनाव परिणाम और फिर अचानक से गायब हो जाना, बिहार के कई ऐसे मुद्दे जिनपर विपक्ष सरकार पर हमलावर होता, वहां उनका न होना. उनकी पार्टी के नेताओं के भीतर खटास पैदा कर गया है कि संकट के समय उनका नेता मैदान छोड़ गया. जिन चुनावों का जिक्र ऊपर हुआ है, उसके अलावा आरजेडी में संगठनात्मक चुनाव भी होने हैं.

लालू की जगह तेजस्वी बनना चाहते हैं अध्यक्ष?
तेजस्वी यादव के गायब रहने के पीछे कयास यह भी लगे कि वो लालू प्रसाद यादव की जगह खुद राष्ट्रीय जनता दल का अध्यक्ष बनना चाहते हैं. इस कयास ने पार्टी के भीतर कई पुराने लालू वफादार नेताओं को नाराज कर दिया है. तेजस्वी के सामने एक बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर की नाराजगी को दूर करने की भी है. शायद यही कारण है कि 27 अगस्त की महागठबंधन की बैठक में तेजस्वी ने जगदानंद सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को साथ रखा.

तेजस्वी यादव के गायब रहने के पीछे कयास यह भी लगे कि वो लालू प्रसाद यादव की जगह खुद आरजेडी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना चाहते हैं (फाइल फोटो)


बहरहाल, महागठबंधन फिलहाल कहने को ही दिख रहा है. सभी अपनी-अपनी नाव पर सवार हैं. अगर विधानसभा उपचुनाव, राज्यसभा और विधान परिषद के चुनावों में एकजुटता दिखी तो ठीक नहीं तो अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में सभी दल अलग-अलग होकर या फिर अलग बैनर के साथ मैदान में दिखे, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.

ये भी पढ़ें- PM मोदी के मुरीद हुए शत्रुघ्न सिन्हा, लिखा- तेरा जादू चल गया

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए पटना से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: August 28, 2019, 3:45 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...