बाढ़ की तबाही झेल रहे कोसी में सरकार अभी तक ढूंढ रही है नाव, पढ़ें पूरी रिपोर्ट

बिहार के सुपौल में नाव बनाता कारीगर

Bihar Flood: बिहार के उत्तरी इलाके में कोसी हर साल भारी तबाही मचाती है. बिहार के इस इलाके में 15 जून से ही बाढ़ की अवधि शुरू हो चुकी है लेकिन अभी तक नावों के निबंधन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है.

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सुपौल. कोसी अपनी अद्भुत, अविश्वसनीय और अकल्पनीय कथा के लिए विख्यात है. यह कब किधर का रुख अख्तियार कर ले इसे समझ पाना टेढ़ी खीर है. कब किस इलाके में कहां काटना शुरू कर दे और कब कहां बालू का टीला खड़ा दे यह कोसी (Kosi Flood) की अपनी मर्जी है, जिसमें कोई भी रुकावट आज तक उसके मनमर्जी रवैये को रोक नही पायी है. तभी तो हर साल बाढ़ आनी है, लोगों को बसना-उजड़ना यहां के लोगो की नियति बन गयी है. इन सबके बीच बाढ़ से बचाव के लिए प्रशासनिक व्यवस्था भी कोसी से कम विचित्र नहीं है.

कोसी की कोख में बसर करने वाले लोगों की जिंदगी ही होती हैं नाव

बाढ़ के दिनों में नाव नहीं हो तो कोसी के दोनों तटबंधों के बीच बसी आबादी की जिंदगी सांसत में फंस जाए. प्रशासनिक विचित्रता की स्थिति यह कि बाढ़ अवधि 15 जून से शुरू है और अब विभाग नाव ढ़ूंढ़ रहा है. अभी तक नावों का पंजीयन नहीं हो पाया है जिसकी वजह कम नावों में लोगो का आना जाना एक दिन बड़ी घटना को आमंत्रित कर सकता है.

क्या कहते हैं अंचलाधिकारी

अंचलाधिकारी सुपौल प्रिंस राज का कहना है कि नावों का निबंधन 01 जुलाई से 30 सितंबर तक के लिए होता है. इसलिए समय से सब हो जाएगा. ऐसे जहां भी नाव की जरूरत पड़ती है वहां नाव उपलब्ध कराया जा रहा है.

नाव के बिना कोसी में मुश्किल है जीवन

दो तटबंधों के बीच बसे लोगों के लिए रोजमर्रा के सामान की जरूरत हो तो नाव, खेतीबारी के लिए निकलना हो तो नाव, मवेशी को चारा चाहिए तो नाव. शादी के बारात से बेटी की बिदाई सब मे नाव यानी, बगैर नाव के कोसी में जीवन मुश्किल है. यह बाढ़ के मौसम के अतिरिक्त दिनों की दिनचर्या हुआ करती है इसके लिए लोग अभ्यस्त होते हैं. जब कोसी का तांडव शुरू होता है तो लोग लाचार हो जाते हैं. उस वक्त सरकार की ओर से नावों की भी लंबी-चौड़ी सूची जारी होती है. गांवों में पानी का प्रवेश हो जाता है जीवन मौत से जूझने लगता है. सरकारी महकमा प्रखंड से कागज पर ही नाव छोड़ देता है और कागज की कश्ती पर डूबती-उतराती जिंदगानी चलती रहती है.

चल रही कागजी कार्रवाई

नावों के रजिस्ट्रेशन के लिए 14 जून से तिथि निर्धारित की गई. पहले दिन किसनपुर प्रखंड क्षेत्र में निबंधन और एकरारनामा आदि की प्रक्रिया की जानी थी. यहां अब तक 22 नावों को सत्यापित किया गया है लेकिन एक भी नाव का निबंधन नहीं हो पाया है. दूसरे दिन सुपौल में किया जाना था जहां अब तक 59 नाव की आवश्यकता है, इसको चिह्नित किया गया है लेकिन निबंधन नहीं हो पाया है. सरायगढ़ भपटियाही में 25 नाव सत्यापित किए गए हैं. बसंतपुर में 17 जून, मरौना में 18 जून और निर्मली में 19 जून को यह प्रक्रिया की जानी है.

सरकारी नाव के अलावा निजी नावों का होता है पंजीयन

बाढ़ के दिनों के लिए सरकारी नाव के अलावा निजी नावाें का पंजीयन होता है. नाव पर लाल रंग का झंडा टंगा होना आवश्यक है ताकि लोग ये समझ सकें कि ये सरकारी नाव है. यह मुफ्त सेवा है. नाव भले ही नदी में छोड़ दी जाती हो, लेकिन पीड़ितों के लिए बगैर शुल्क कोई सेवा नहीं मिलने वाली.

स्थानीय नाविक ही चलाते हैं सरकारी नाव

नाव चलाने के लिए अंचलाधिकारी नाविकों का चयन करते हैं. नाव सहित उसका निबंधन परिवहन विभाग से कराया जाता है. फिर जगह निर्धारित करते हुए नाव उसके जिम्मे कर दी जाती है. एक नाव पर तीन नाविक मान्य होते है. जिसका भुगतान सरकारी स्तर से किया जाता है. इसकी निगरानी राजस्व कर्मी के जिम्मे होती है. अब इनके भुगतान की बात करें तो पिछले साल का भुगतान अब किया जा रहा है.

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