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आजादी के 71 सालों बाद भी यहां नहीं चलती रेल, 'रेल नहीं तो वोट नहीं' के साथ आंदोलन

News18 Bihar
Updated: October 2, 2018, 10:54 AM IST
आजादी के 71 सालों बाद भी यहां नहीं चलती रेल, 'रेल नहीं तो वोट नहीं' के साथ आंदोलन
प्रतीकात्मक तस्वीर

साल 1960 में कोसी बराज का निर्माण इसी रेल लाइन के जरिये हुआ था. हालांकि कोसी में बाढ़ के प्रकोप ने धीरे-धीरे मुश्किलें बढ़ा दीं.

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सुपौल में ट्रेन चलाने की मांग को लेकर आंदोलन जोर पकड़ता जा रहा है. रेल नहीं तो वोट नहीं के नारे के साथ रहवासियों ने सर्वदलीय संघर्ष समिति के बैनर तले सोमवार को 25 किलोमीटर लंबी मानव श्रृंखला बनाकर प्रदर्शन किया.

आजादी से पहले जहां रेलें चला करती थीं, वहां के लोग आजादी के इतने बरस बीत जाने पर भी एक अदद रेललाइन से महरूम हैं. सुपौल में प्रतापगंज से बीरपुर बथनाहा तक ट्रेन चलाने की मांग अब आंदोलन का रूप ले चुकी है. भारत-नेपाल सीमा के तहत आने वाले इस इलाके में यातायात को लेकर नागरिकों को काफी सफर करना पड़ता है. विडंबना है कि अंग्रेजी हुकूमत के वक्त में यहां फिर भी छोटी लाइन चला करती थी. साल 1960 में कोसी बराज का निर्माण इसी रेल लाइन के जरिये हुआ था. हालांकि कोसी में बाढ़ के प्रकोप ने धीरे-धीरे मुश्किलें बढ़ा दीं.

हालात दिनोंदिन बिगड़ते चले गए. हर राजनीतिक पार्टी ने चुनाव के वक्त रेल चलाने का आश्वासन तो दिया लेकिन अब तक किसी ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया. लोगों का कहना है कि सरकार को बीरपुर प्रतापगंज के बीच जमीन पहले से ही उपलब्ध है. ऐसे में सरकार को इंडो-नेपाल बार्डर पर बसे बीरपुर तक ट्रेन चलानी चाहिए.

इलाके के पूर्व सांसद सुखदेव पासवान कहते हैं कि यह आन्दोलन अब जनआन्दोलन की शक्ल ले चुका है. लोग सर्वदलीय संघर्ष समिति के बैनर तले आंदोलन कर रहे हैं. वे मांग कर रहे हैं कि रेल जल्दी शुरू नहीं हुई तो वे चुनावों में वोट का बहिष्कार कर देंगे. (रिपोर्ट- अमित झा )

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First published: October 2, 2018, 10:54 AM IST
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