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ग्राउंड ज़ीरो से रिपोर्ट: हर साल 6 जिलों को ऐसे तबाह कर जाता है 'बिहार का शोक'

News18 Bihar
Updated: August 1, 2018, 12:47 PM IST
ग्राउंड ज़ीरो से रिपोर्ट: हर साल 6 जिलों को ऐसे तबाह कर जाता है 'बिहार का शोक'
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हर साल 15 जून से लेकर 15 अक्टूबर तक मॉनसून सिर पर रहता है. खास तौर पर जून और जुलाई में नेपाल के पहाड़ी क्षेत्र में अत्यधिक बारिश होने के कारण यह नदी अपने उफान पर रहती है. नदी अपने वेग के कारण तटबंध को तोड़कर बाहर निकलने को आतुर रहती है.

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हर साल मॉनसून में कोसी नदी जब उफान पर होती है तो तटबंध के अंदर बसे लोगों पर कहर बनकर टूटती है. अगर तटबंध तोड़कर बाहर आती है तो कुसहा त्रासदी जैसे हालात बन जाते हैं. इन्हीं मसलों पर न्यूज़18 की टीम कोसी नदी के नेपाल प्रभाग के बराह क्षेत्र से लेकर तराई क्षेत्र के इलाकों में होने वाली तबाही का जायजा लेने पहुंची. पढ़िए ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट...

हिमालय के तिब्बतीय पर्वत श्रृंखला से सात धाराओं में निकलने वाली कोसी नदी नेपाल के त्रिवेणी में सभी धाराओं को समेट कर एक साथ जमीन पर उतरती है. यहां इसकी चौड़ाई महज 100 से 150 मीटर रहती है. यही नदी जैसे-जैसे बिहार के 6 जिलों में प्रवेश करती है तो रौद्र रूप अख्तियार कर लेती है. इस वजह से हर साल कोसी तटबंध के अंदर बसे साढ़े 9 लाख लोगों को घर से बेघर कर देती है. साथ ही कोसी इलाके के 6 जिले सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, खगड़िया, पूर्णिया और कटिहार जिलों के लोगों के माथे पर भय और चिंता की लकीर खिंच देती है.

एक बाढ़ पीड़ित परिवार के मुखिया ने बताया कि हिमालय के तिब्बतीय पर्वत श्रृंखला से निकलने वाली सात धाराओं (क्रमशः इंद्रवती, सुन या भोट कोसी, तामा कोसी , लिक्षु कोसी , दूध कोसी , अरुण कोसी , तामर कोसी की धाराएं जिन्हें सप्तकोसी कहां जाता है) का त्रिवेणी में संगम होता है. इस बारे में एक नेपाली नागरिक ने कहा कि हिमालय पर्वत स्थित अपने उद्गम स्थल से त्रिवेणी संगम स्थल तक 4 सौ किलोमीटर की यात्रा कर कोसी नदी बराह क्षेत्र में समतल पर उतरती है.

उसने बताया कि समतल से 42 किलोमीटर का सफर तय कर यह बिहार की तराई में स्थित कोसी बराज पहुंचती है. इसके बाद कोसी बराज से 258 किलोमीटर की यात्रा कर यह नदी अपने संगम स्थल खगड़िया जिले के कुरसेला में गंगा नदी में समाहित हो जाती है. यानी कुल मिलाकर यह नदी अपने उद्गम स्थल से संगम स्थल तक 710 किलोमीटर की यात्रा करती है. इस दौरान बिहार के पांच जिले के 7 हजार 770 वर्ग किलोमीटर और नेपाल में 1,295 वर्ग किलोमीटर में अपने साथ लाई गाद (बालू) को जमाकर हर साल नदी उथली होती जा रही है.

बराह क्षेत्र के चतरा में 100 से 120 मीटर में बहने वाली यह नदी जब धरातल पर उतरती है तो 10 से 12 किलोमीटर की चौड़ाई में बहकर तटबंध के अंदर बसे साढ़े 9 लाख लोगों की जिंदगी पर कहर बनकर टूटती है और जान-माल के साथ ही उसके आशियाने को अपने आगोश में समेट लेती है. साथ ही जब तटबंध तोड़कर कुसहा त्रासदी की तरह बाहर निकलती है तो 6 जिले के 35 लाख लोगो की जिंदगियों पर कहर बनकर टूटती है.

हर साल 15 जून से लेकर 15 अक्टूबर तक मॉनसून सिर पर रहता है. खास तौर पर जून और जुलाई में नेपाल के पहाड़ी क्षेत्र में अत्यधिक बारिश होने के कारण यह नदी अपने उफान पर रहती है. नदी अपने वेग के कारण तटबंध को तोड़कर बाहर निकलने को आतुर रहती है. वहीं इंजीनियर बाढ़ नियंत्रण तकनीकों से नदी को तटबंध तोड़ने से रोकने की कोशिश करते हैं. बाढ़ अवधि के दौरान नदी और इंजीनियरों के बीच तटबंध तोड़ने और रोकने का संघर्ष जारी रहता है. अगर इस संघर्ष में जीत नदी की होती है तो 6 जिले के 35 लाख लोग बेघर हो जाते हैं और अगर जीत इंजीनियरों की हुई तो लोग कोसी नदी को प्रणाम कर अपनी जिंदगी बख्श देने के लिए शुक्रिया कह भय से मुक्त हो जाते हैं.

(रिपोर्ट - अभिषेक मिश्रा)
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First published: August 1, 2018, 11:27 AM IST
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