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फर्जीवाड़ा: बिहार के सुपौल में वर्षों से बिना स्कूल गए ही लाखों के वेतन पा रही हैं कई 'मैडम'

बिहार के सुपौल में बड़ा 
शिक्षा विभाग में फर्जीवाड़ा सामने आया

बिहार के सुपौल में बड़ा शिक्षा विभाग में फर्जीवाड़ा सामने आया

अधिकारियों की मिलीभगत से 50वें साल में भी शिक्षिका को गर्भवती बताकर छुट्टी स्वीकृत की गई और उसे वेतन का भुगतान किया गया. इसमें खास बात यह थी कि वह 7 वर्षों से विद्यालय से गायब थी.

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    बिहार के सुपौल जिला शिक्षा विभाग में एक बड़ा घोटाला सामने आया है. जिले के अलग-अलग स्कूलों की कई शिक्षिकाएं दिल्ली, बेंगलुरु सहित देश के अन्य शहरों में वर्षों से रह रही हैं, लेकिन हर साल का वेतन एकमुश्त उठा रही हैं. बताया जा रहा है वर्षों से अपने स्कूल से 'गायब' कई शिक्षिकाएं फर्जी प्रतिनियोजन दिखाकर बीईओ यानि ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर की मिलीभगत से सरकार को लाखों का चूना लगा रही हैं.

    दरअसल, ये सारा खेल अधिकारियों और शिक्षिकाओं की सेटिंग से चलता है. भले ही वह रजिस्टर में कई वर्षों तक बिना किसी सूचना के अनुपस्थित रहीं, लेकिन न तो उनकी नौकरी गई और न ही कोई कार्रवाई की गई.

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    बीईओ से सेटिंग कर कोई गर्भवती बन कर तो कोई मेडिकल ग्राउंड पर स्कूल नहीं आती हैं. कई ऐसी भी हैं जो किसी अन्य विद्यालय में प्रतिनियोजित होकर वेतन का भुगतान ले रही हैं. खास बात यह कि इनका नाम शिक्षा विभाग की फाइलों में भी नहीं है.

    अधिकारियों की मिलीभगत
    अधिकारियों की मिलीभगत से 50वें साल में भी शिक्षिका को गर्भवती बताकर छुट्टी स्वीकृत की गई और उसे वेतन का भुगतान किया गया. इसमें खास बात यह थी कि वह 7 वर्षों से विद्यालय से गायब थीं.

    मामला सुपौल जिले के पिपरा प्रखंड का है. यहां के बीईओ सूर्यदेव प्रसाद ने मध्य विद्यालय हटबरिया में पदस्थ टीचर कुमारी सुभद्रा ठाकुर को 5 जुलाई 2017 से 16 नवम्बर 2017 तक मातृत्व अवकाश दिया.

    फर्जीवाड़ा सामने आया तो न्यूज 18 ने ऑन द स्पॉट पड़ताल शुरू की. मध्य विद्यालय हटबरिया से शुरू हुई पड़ताल में पता लगा कि सुभद्रा ठाकुर का मूल विद्यालय है. इस विद्यालय से शिक्षिका कुमारी सुभद्रा ठाकुर 2012 से बिना सूचना के गायब हैं.

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    विद्यालय के शिक्षक शिक्षिकाएं तो कुमारी सुभद्रा ठाकुर के नाम से अवगत है पर पहचानती नहीं हैं. वर्तमान प्रधानाध्यापक मनोज कुमार मित्रा बताते हैं कि कुमारी सुभद्रा ठाकुर 2012 से ही विद्यालय से गायब हैं, जिसकी जानकारी हर माह पीपरा बीईओ कार्यालय को दिया जा रहा है.

    वे ये भी बताते हैं कि पीपरा बीईओ के द्वारा 1 फरवरी 2016 को प्राथमिक विद्यालय दुबियाही में प्रतिनियोजन किया गया है, लेकिन इस विद्यालय के शिक्षक भी कुमारी सुभद्रा ठाकुर से अवगत नहीं हैं.

    फिर 17 नवम्बर 2017 से 2 अक्टूबर 2018 तक उन्हें फिर कार्यरत दिखाया और फिर 3 अक्टूबर 2018 से 31 दिसम्बर 2018 तक चिकित्सकीय अवकाश में दिखाने और फिर जनवरी 2019 के कार्यरत अवधि का वेतन भुगतान करने का प्रस्ताव विभाग को भेजा था.

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    बेंगलुरु में रहने के बावजूद लाखों का वेतन एकमुश्‍त
    न्यूज 18 की पड़ताल आगे बढ़ी तो पता लगा कि यह अकेला मामला नहीं है. त्रिवेणीगंज प्रखंड के प्राथमिक विद्यालय कुकूरधरी की शिक्षिका सुनिता सुमन भी इसी तरह नवंबर 2010 से ही गायब हैं, लेकिन शिक्षा विभाग की फाइलों में इन्हें बीईओ की मिलीभगत से नवंबर 2010 से अप्रेल 2017 तक का वेतन 6 लाख 92 हजार रुपया एकमुश्त मिल चुका है.

    वहीं, उत्क्रमित मध्य विद्यालय दतुवा की शिक्षिका ज्योति रानी विद्यालय से 2018 से बिना सूचना के गायब हैं. दूसरी तरफ, मध्य विद्यालय मटकुरिया की किरण कुमारी कई सालों से विद्यालय से गायब हैं. वह बेंगलुरु में रहती हैं, लेकिन बीईओ की मिलीभगत से इन्हें भी हर माह वेतन का भुगतान मिल रहा है.

    सुपौल सदर प्रखंड की प्रियंका कुमारी मध्य विद्यालय परसौनी ये भी 6 महीने से विद्यालय से बिना सूचना के गायब हैं. साथी शिक्षक बताते हैं कि मैडम दिल्ली में अपने पति के साथ रहकर अपने बच्चों को शिक्षा दे दिलवा रही हैं और वेतन यहां से पा रही हैं. सवाल उठता है कि आखिर ये खेल कैसे सालों साल से जारी है?

    दरअसल, जिले में ऐसी शिक्षिकाओं की संख्या शायद सौ के करीब में होगी, लेकिन जिसके पति सरकारी वरिय मुलाजिम हैं या जिनके पति बाहर रहकर व्यापार या अच्छी नौकरी कर रहे हैं, वे अपनी पत्नियों के लिए ऐसी सौदेबाजी कर रहे हैं.

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    शिक्षा अधिकारी को भी मिलता है हिस्‍सा
    बताया जा रहा है कि बिना काम के होने वाले लाखों-लाख के भुगतान में एक मोटा हिस्सा बीईओ को भी मिला करता है. ऐसे केस को ढूंढ निकालना इसलिए भी कठिन होता है क्योंकि किसी प्रखंड से सभी विद्यालयों का बीईओ के एकमुश्त वेतन का लिस्ट भेजते हैं.

    सबसे खास यह है कि प्रतिनियोजन यानि एक विद्यालय से दूसरे विद्यालय में पदस्थापन का प्रावधान ही नहीं है. इसको लेकर विभाग 2012 से लेकर अब तक कई पत्र निर्गत कर चुका है. साल 2016 में शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव आर के महाजन ने एक पत्र जारी कर सभी शिक्षा पदाघिकारियों को आदेश देकर इस पर रोक लगाई थी.

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    इसमें यह भी कहा गया था कि प्रतिनियोजन अवधि का वेतन विभाग नहीं देगा और इसकी वसूली प्रतिनियोजन करने वाले अधिकारीयों से होगी. लेकिन यह आदेश कागजों में ही सिमटकर रह गया और प्रतिनियोजन और भुगतान का खुला खेल बदस्तूर जारी है.

    इस मसले पर हमने जिला शिक्षा पदाधिकारी से पूछा तो वो हमारी जानकारी पर संज्ञान लेने की बात कह रहे हैं. -बहरहाल अब इंतिजार है कि शिक्षा विभाग इस मसले पर क्या कार्रवाई करती है.

    रिपोर्ट- अमित झा 

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