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सुपौल में लड़कियों से छेड़छाड़- मारपीटः 'मनचलों का विरोध किया तो पूरा गांव हम पर टूट पड़ा'

Amit kumar jha | News18 Bihar
Updated: October 9, 2018, 1:43 PM IST
सुपौल में लड़कियों से छेड़छाड़- मारपीटः 'मनचलों का विरोध किया तो पूरा गांव हम पर टूट पड़ा'
प्रतीकात्मक फोटो

सुपौल के कस्तूरबा स्कूल की लड़कियां बदहवास भाग रही थीं और हमलवार उन पर ईंट, पत्थर और लाठियां बरसा रहे थे. सातवीं क्लास की रानी (बदला हुआ नाम) भी इस हमले की शिकार हुई और 34 लड़कियों के साथ इसका इलाज त्रिवेणीगंज अस्पताल में चल रहा है. पढ़िए उस दुखद शाम की कहानी रानी की जुबानी...

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छह अक्टूबर की शाम बिहार के सुपौल में डपरखा कस्तूरबा आवासीय स्कूल में छठी से आठवीं क्लास तक की लड़कियों के साथ जो कुछ हुआ, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट को भी टिप्पणी करनी पड़ी. छेड़खानी का विरोध करने के बाद आरोपियों के घरवालों और गांव के लोगों ने स्कूल पर धावा बोल दिया. लड़कियां बदहवास भाग रही थीं और हमलवार उन पर ईंट, पत्थर और लाठियां बरसा रहे थे. सातवीं क्लास की रानी (बदला हुआ नाम) भी इस हमले की शिकार हुई और 34 लड़कियों के साथ इसका इलाज त्रिवेणीगंज अस्पताल में चल रहा है. पढ़िए उस दुखद शाम की कहानी रानी की जुबानी...

मैं 12 साल की हूं. त्रिवेणीगंज के कस्तूरबा विद्यालय में 7 वीं की छात्रा हूं. मैं आपको अपनी कहानी सुनाती हूं कि कैसे लोगों ने मुझे दर्द दिया है. तारीख 6 अक्टूबर था और शाम के 5 बज रहे थे, मैं और मेरी सहेली आपस में बात ही कर रहे थे कि फिर से मोहन और हरि आ धमके. इन्हें देख मुझे डर सताने लगा, क्योंकि यही वो दोनों थे, जो रोज मुझे गालियां देते थे और दीवारों पर भद्दी- भद्दी गालियां लिखते थे.

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कई बार वार्डेन से इसकी शिकायत भी की, लेकिन वो हर बार हम सबको शांत कर देती थींं, लेकिन 6 अक्टूबर को जो हुआ, वो मैं जीवन भर नहीं भूल सकती हूं. जब इस स्कूल में मैं पहली बार आयी तो मुझे लगा कि अब मैं भी पढ़ लिखकर कुछ बन जाऊंगी. अब मेरे घर वालों को मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी. यहां आते ही हमने अपनी पढ़ाई शुरू कर दी. यहां कई दोस्त हैं मेरे, जिनसे मैं अपना दुख दर्द सब कुछ शेयर करती हूं.

पढ़ाई के बाद शाम को बगल के स्कूल कैंपस में खेलने जाना हमारी रोज की दिनचर्या थी. रोज मैं और बड़ी दीदी और काजल, नैना खूब खेलते थे. बहुत अच्छा लगता था हमें इन सबके साथ, लेकिन कुछ दिनों से मोहन और हरि तंग करने लगा था. रोज दीवारों  पर अपशब्द लिखना मानो इनकी आदत बन गयी थी.

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पता नहीं इसे ऐसा करने में क्या मजा आता था. पहले भी दीवारों पर लिखने के कारण नोंकझोंक होती थी, लेकिन उस दिन भी हमने इन दोनों लड़कों का विरोध किया. नोंकझोंक के बाद झगड़ा हो गया.  हमने सोचा क्यों नहीं विरोध करूं. अब लड़कियां किसी से कम थोड़े ही न हैं. हम अब अंतरिक्ष की सैर करते हैं, बोर्डर की सुरक्षा भी करते हैं, किस मामले में हम इन लड़कों से कम हैं.
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हमने उनको सुनाया और उसके बाद हम लोग अपने विद्यालय आ गए. अब हाथ पैर धोकर थोड़ा आराम करने वाले ही थे कि अचानक बहुत सारे लोगों ने हम लोगों पर हमला कर दिया. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक मां होकर वो मुझे इतनी बुरी तरीके से पीटने लगेगी. पता नहीं उस दिन उन लोगों को क्या हो गया था कि वो सबको बदहवास पीट रहे थे और हम लोग असहाय होकर मार खा रहे थे.

तब लगा कि हम कितने कमजोर हैं. कोई मां इतनी भी गुस्सा कर सकती है ? मुझे अपनी मां की याद आ गई. वो भी मारती थी लेकिन इस तरह नहीं. मैं तो शायद इस दर्द को झेल लूंगी पर मैं वो शाम भूल नहीं पाऊंगी. हमें इतना पीटा गया कि बयां नहींं कर सकती. कोई लाठी से पीट रहा था तो कोई ईंट फेंक रहा था.

तब मुझे बहुत गुस्सा आया कि सरकार ने इतने गंदे लोगों के बीच हमारा विद्यालय क्यों खोल दिया. गांव में मानो हर कोई हमसे नाराज था. हम सबको पीटा जा रहा था, लेकिन कोई बचाने नहीं आया. अब मैं अस्पताल में हूं , डॉक्टर अंकल ने मेरा इलाज ठीक से किया है, शायद जल्द ही ठीक हो जाऊंगी. सुना है एसपी अंकल ने उन सबको पकड़ लिया है और जेल भेज दिया है.

(इस पीड़ित लड़की ने जिन दो आरोपियों का जिक्र किया है, वो गिरफ्तार किए जा चुके हैं)

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First published: October 9, 2018, 10:30 AM IST
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