Sikta Assembly Seat: सिकटा में जोरदार होगा चुनावी घमासान, 2015 में बीजेपी को हराकर जेडीयू ने मारी थी बाजी

सिकटा से पिछले 20 साल में किसी उम्मीदवार को दोबारा विधायक बनने का मौका नहीं मिला है.
सिकटा से पिछले 20 साल में किसी उम्मीदवार को दोबारा विधायक बनने का मौका नहीं मिला है.

Sikta Assembly Seat: पिछले 20 साल के दौरान हुए पांच चुनावों में जनता ने सिकटा विधानसभा क्षेत्र (Sikta Assembly Seat) से कभी एक उम्मीदवार को दूसरा मौका नहीं दिया. 2020 के विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election) की जंग रोचक होने के हैं आसार.

  • News18 Bihar
  • Last Updated: September 21, 2020, 11:52 AM IST
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पश्चिमी चंपारण. सिकटा विधानसभा क्षेत्र (Sikta Assembly Seat) में पिछले दो दशकों के दौरान हुए चुनावों के नतीजे काफी चौंकाने वाले रहे हैं. इस विधानसभा क्षेत्र की जनता ने कभी भी एक उम्मीदवार को दूसरा मौका नहीं दिया है. 2000 में हुए चुनाव में बीजेपी (BJP) ने यहां से जीत हासिल की, लेकिन 5 साल बाद जनता ने इस पार्टी को हटाकर दूसरे को नेता चुन लिया. यही नहीं, साल 2005 में बिहार में दो बार विधानसभा के चुनाव हुए, इन दोनों चुनावों में भी सिकटा सीट की परंपरा बदली नहीं. फरवरी 2005 के चुनाव में जहां समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार विधायक चुने गए, तो नवंबर के चुनाव में कांग्रेस (Congress) ने यहां की जनता का विश्वास हासिल किया. इसके बाद 2010 और 2015 के चुनावों में भी परंपरा बरकरार रही. ऐसे में 2020 के चुनाव (Bihar Assembly Election) के नतीजे चौंकाने वाले होंगे या जनता इस बार कुछ अलग सोचेगी, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं.

2015 में दिखी कांटे की टक्कर
साल 2015 में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान महागठबंधन और राजग के बीच टक्कर थी. महागठबंधन में जहां राजद, जेडीयू और कांग्रेस प्रमुख घटक दल के रूप में शामिल थे, वहीं राजग की ओर से बीजेपी प्रमुख पार्टी के रूप में चुनाव लड़ रही थी. सिकटा विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में भी बिहार की तत्कालनी राजनीतिक हालात की झलक साफ दिखाई दे रही थी. यहां जेडीयू और बीजेपी के बीच मुकाबला था, जिसमें जदयू ने बहुत कम मतों के अंतर से ही सही, लेकिन बाजी जीत ली. 2015 में जेडीयू की तरफ से खुर्शीद उर्फ फिरोज अहमद चुनाव मैदान में थे. उनका मुकाबला बीजेपी के दिलीप वर्मा से था. दिलीप वर्मा यहां के सीटिंग एमएलए थे. लेकिन महागठबंधन के उम्मीदवार के सामने वे खेत रहे. खुर्शीद अहमद ने उन्हें 2835 वोटों से हराकर चुनाव जीत लिया.

2015 का चुनावी मुकाबला इसलिए भी रोचक है, क्योंकि इससे पहले 2010 के चुनाव में भी इन्हीं दोनों उम्मीदवारों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला था. 2010 के विधानसभा चुनाव में दिलीप वर्मा ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़कर फिरोज उर्फ खुर्शीद अहमद को 8000 से अधिक मतों से चुनावी शिकस्त दी थी. इस चुनावी हार का बदला खुर्शीद अहमद ने 2015 में लिया. लेकिन इस बार जबकि बीजेपी और जेडीयू दोनों साथ मिलकर ही विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरने वाले हैं, ऐसे में सिकटा के चुनाव पर सबकी नजरें हैं. खासकर महागठबंधन के घटक दलों की जोर-आजमाइश के बीच यहां की जनता किसके पक्ष में फैसला करेगी, यह कहना अभी मुश्किल है.
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