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Start-Up: ये है बिहार का कश्मीरी शॉल! जानें क्यों कश्मीर व पंजाब के लोग हैं इसके दीवाने

जब अमेरिकी फल का उत्पादन गया में हो सकता है, तो कश्मीर के शॉल बिहार में क्यों नहीं बन सकते! कपड़ा कश्मीर से तथा धागे अम ...अधिक पढ़ें

    रिपोर्ट – आशीष कुमार

    पश्चिम चम्पारण. बेहतरीन कारीगरी और खास किस्म के मुलायम कपड़ों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर कश्मीरी शॉल को अब चम्पारण में भी तैयार किया जाने लगा है. कुछ समय पहले तक इसे देश के कुछ गिने चुने राज्यों में ही तैयार किया जाता था पर अब बिहार में भी इसका उत्पादन शूरू हो गया है. दरअसल बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के चनपटिया में बड़े पैमाने पर बेहतरीन किस्म के कश्मीरी शॉल बनाए जा रहे हैं, जिन्हें देश के कई राज्यों में सप्लाई किया जा रहा है. बड़ी बात ये है कि सर्दी के इस सीजन में अब तक लगभग 1 लाख कश्मीरी शॉल अमृतसर, श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर तक सप्लाई किए जा चुके हैं.

    वैसे तो चनपटिया स्टार्टअप ज़ोन में कुल 57 यूनिट्स हैं, जिनमें अलग अलग चीजें तैयार की जाती हैं, लेकिन इनमें से 2 यूनिट्स में खासतौर पर कश्मीरी शॉल बनाया जाता है. दूसरी यूनिट के ओनर तेजनारायण ने बताया कि दोनों यूनिटों में अलग अलग डिजाइन वाले शॉल तैयार किए जाते हैं. पहली यूनिट में कम कारीगरी वाले शॉल बनते हैं और तेजनारायण की यूनिट में बारीक कढ़ाई तथा डिजाइन वाले. पहली यूनिट में हर दिन लगभग 80 से 90 शॉल तैयार कर लिए जाते हैं. वहीं तेजनारायण की यूनिट में हर दिन 60 से 70 यानी कुल करीब 150. डिजाइन वाले एक शॉल को तैयार करने में 6 से 7 घंटे का समय लग जाता है.

    क्या है शॉल की लागत और कीमत?

    तेजनारायण ने बताया कम डिज़ाइन वाले एक शॉल को तैयार करने में कपड़े, धागे तथा अन्य चीजों को लेकर लगभग 300 से 350 रुपये की लागत आती है. इन्हें बाज़ार में 400 से 450 रुपये की थोक कीमत पर बेचा जाता है. वहीं महीन कारीगरी वाले एक कश्मीरी शॉल को बनाने में कपड़ा तथा धागा सहित कुल 450 से 600 रुपये तक लागत आती है. इन्हें थोक बाजार में 700 से 800 में बेचा जाता है. उन्होंने बताया इन यूनिटों में नॉर्मल शॉल, स्टोल और दुपट्टे भी बनाए जाते हैं, लेकिन सर्दियों के सीज़न में विशेष रूप से कश्मीरी शॉल का काम होता है.

    हौसले को ऐसे मिली सरकारी मदद

    चनपटिया स्टार्टअप ज़ोन के अध्यक्ष ओम प्रकाश ने बताया लॉकडाउन के पहले वह भी दूसरे राज्य में काम करते थे. आज उनकी अपनी एक फैक्ट्री है. दरअसल, वैश्विक मंडी में जब चनपटिया के सभी कारीगर अपने घर वापस आए तब डीएम कुंदन कुमार ने उन्हें केंद्र की पीएमईजीपी योजना के तहत बैंक ऑफ बड़ौदा से लोन की सुविधा दिलवाई. यहां के कामगारों ने सरकार की मदद और खुद के हौसले से नई इबारत लिखने का काम किया और अब यह कला विदेशों तक भी पहुंच रही है.

    Tags: Bihar News, Designer clothes

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