लाइव टीवी

पुण्यतिथि विशेष : हमने गांधी को माना पर उनकी कही एक न मानी

News18Hindi
Updated: January 30, 2020, 5:44 AM IST
पुण्यतिथि विशेष : हमने गांधी को माना पर उनकी कही एक न मानी
शहीद दिवस पर जानें महात्मा गांधी का जीवन के प्रति नजरिया

गांधी जी दरअसल भारत की वो शिक्षा प्रणाली है जिसे अंतर्सात करके ही हम असली भारत का निर्माण कर सकते हैं. हम उस पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं जिसकी आज देश को ज़रूरत है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 30, 2020, 5:44 AM IST
  • Share this:
एक बार गांधी जी इलाहाबाद में आनंद भवन में रुके हुए थे. सुबह का वक्त था, गांधी जी अपनी नीम की दातौन से दांत साफ कर रहे थे. उन्होंने पास में एक लोटे में पानी भर कर रखा हुआ था. तभी वहां से एक और व्यक्ति गुज़रा और गलती से उनका पैर पड़ने की वजह से गांधी जी के पास रखा हुआ लोटा लुढ़क गया. जब तक गांधी जी ने उसे उठाया उसमें से काफी पानी बह चुका था. फिर गांधी जी ने उतने ही पानी से अपना बाकी का काम निपटाया. जब नेहरू जी को ये बात पता चली तो वो गांधी जी के पास पहुंचे और उन्होंने उनसे कहा कि बापू आप प्रयाग के किनारे बैठे हो यहां पानी की कोई कमी नहीं है. नेहरू जी की बात पर गांधी जी ने जवाब देते हुए कहा कि लेकिन मेरे हिस्से का पानी तो गिर गया है ना. इसलिए अब मैं और पानी नहीं ले सकता हूं.

इसी तरह गांधी जी अपनी दातौन को दो भागों में काट कर दोनों तरफ से इस्तेमाल करते थे. और एक ही बार इस्तेमाल करके फेंकते नहीं थे बल्कि जब तक वो सूख नहीं जाती थी तब तक इस्तेमाल करते थे. और जब वो इस्तेमाल करने के लायक नहीं रह जाती थी वो उसे एक जगह पर इकट्ठा कर लिया करते थे ताकि सर्दी में वो आग सेंकने या दूसरे कामों में इस्तेमाल हो सके. उन्होंने अपने सभी साथियों में भी ये आदत डलवाई थी.

देखा जाए तो ये एक छोटा सा प्रयास लग सकता है लेकिन इसके पीछे पर्यावरण के लिए जो गंभीरता है उसका अंदाजा लगाया जा सकता है. गांधी जी का मानना था कि प्रकृति को बचाने के लिए हमें उसे आचरण में लाना ज़रूरी है. आज जब हम उस हाल में आ गए हैं जब डूमक्लॉक को वैज्ञानिकों ने आखरी सौ सेकेंड पर सेट कर दिया है यानि हम विनाश के इतना करीब आ गए हैं. ऐसे में गांधी की शिक्षा, गांधी की मानना बेहद ज़रूरी लगने लगा है.

आरक्षण, नेहरू, गांधी
भाजपा विधान पार्षद प्रवीण दारेकर ने कहा कि पं. जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी ने गोल मेज सम्मेलन के दौरान आरक्षण देने का विरोध किया था.




गांधी जी दरअसल भारत की वो शिक्षा प्रणाली है जिसे अंतर्सात करके ही हम असली भारत का निर्माण कर सकते हैं. हम उस पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं जिसकी आज देश को ज़रूरत है. गांधी जी का दर्शन उनकी सोच, उनको लेकर बच्चों में खास कर कॉलेज के विद्यार्थियों के मन में तमाम तरह के सवाल हैं. उन सवालों का जवाब देने और छात्रों के मन में गांधी की सोच को सही पहलू दिखाने के लिए मध्यप्रदेश के शिक्षाविद डॉ.ब्रह्मदीप अलूने इन दिनों पूरे प्रदेश भर के कॉलेज में घूम-घूम कर गांधी संवाद कर रहे हैं. इसी सोच के चलते एक विचार ने जन्म लिया जो “गांधी है तो भारत है ” किताब के रूप में सामने आई है. इस किताब की खास बात ये है कि इसमें गांधी जी के उन पहलुओं पर बात की गई है जो प्रासंगिक भी है और साथ में जिन पर अक्सर बात नहीं की जाती है. अच्छी बात ये है कि किताब भाषण देने के बजाए एतिहासिक तथ्यों के साथ संदर्भों को जोड़ती है, जिससे गांधी जी के विचार और उनकी बातों के लेकर दी गई जानकारी कोरी लफ्फाजी नहीं रह जाती है. मसलन किताब में गांधी जी पर्यावरण को लेकर कहते हैं कि ‘ यदि एक मनुष्य आवश्यकता से अधिक उपभोग करता है तो दूसरे मनुष्य को भूखा सोना पड़ता है. प्रकृति मनुष्य को सुखी और संतुलित जीवन तो दे सकती है. लेकिन वह अनियंत्रित और असीमित इच्छाओं को सहन नहीं कर सकती है.’

महात्मा गांधी का नजरिया
महात्मा गांधी का नजरिया


किताब इसी बात को वर्तमान से जोड़ते हुए बताती है कि किस तरह आज दुनियाभर में 86 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं जिसमें से सबसे ज्यादा करीब 21 करोड़ लोग भारत में हैं. देश में 40 फीसद बच्चे औऱ 50 फीसद युवा कुपोषण का शिकार हैं. भारत में अमूमन हर आधे घंटे में एक किसान अपनी जान दे देता है. जबकि देश में 60 करोड़ क्विंटल अनाज गोदामों में रहता है और गरीबों की दो जून की रोटी महज़ एक करोड़ क्विंटल में पूरी हो सकती है. इस असुंतुलन के देखते हुए लगता है कि गांधी ने सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित करने का जो सपना देखा था उससे हम अभी कोसों दूर है.

गांधी है तो भारत है, के ज़रिये पता चलता है कि किस तरह गांधी जी ने भारत कि विविधता को घोल कर पी लिया था, वो उनके अंदर इस कदर समाहित हो गया था कि उन्हें चाह कर भी अलग नहींं किया जा सकता था और इसलिए गांधी होने का मतलब संपूर्ण भारत होना था. गांधी जी ग्राम स्वराज को मशीनीकरण से बचाकर पर्यावरण को भी शुद्ध औऱ सुरक्षित रखना चाहते थे. गांधी का कहना था कि अपने आसपास के समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से अधिकांश गांव आत्म निर्भर थे, वे अपनी जरूरत की चीज़े खुद ही तैयार कर लेते थे.

(फाइल फोटो)


गांधी जी और साफ हवा
गांधी जी पर्यावरण को लेकर किस कदर सजग थे, इसका अंदाजा उनके एक लेख “की टु हेल्थ” में नजर आता है. इसमें साफ हवा पर अलग से एक अध्याय लिखा गया है, जिसमें कहा गया है कि शरीर को तीन तरह के प्राकृतिक पोषण की जरूरत होती है हवा, पानी और भोजन. इसमें साफ हवा सबसे ज़रूरी है. उनका मानना था कि प्रकृति ने हमारी जरूरत के हिसाब से हमें पर्याप्त मुफ्त हवा दी है लेकिन विकास औऱ आधुनिक सभ्यता की बदौलत इसकी भी कीमत तय कर दी गई है. उनका कहना था कि अगर किसी व्यक्ति को साफ हवा के लिए घर से दूर जाना पड़ रहा है तो इसका मतलब है कि वो साफ हवा के लिए पैसे खर्च कर रहा है. आज से करीब 100 साल पहले ही, 1 जनवरी 1918 को उन्होंने अहमदाबाद की एक बैठक में कहा था कि भारत की आजादी को तीन मुख्य तत्वों वायु, जल और अनाज की आजादी के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए .

 

कार को लेकर गांधी जी का नज़रिया
विकास और गति की मारी दुनिया जो इन दिनों हर लिहाज से बेहद जल्दी में नजर आ रही है. जिनकी बदौलत ही आज कारों और हवाई जहाजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही . जबकि हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण के लिए कारों की बढ़ती संख्या कितना बड़ा खतरा है. इसी गतिशीलता के पीछे भाग रही दुनिया को लेकर गांधी जी की सोच कुछ अलग थी. 1938 में जब गांधी जी को बताया गया कि अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति की इच्छा है कि उनके देश में प्रत्येक नागरिक के पास दो कारें और दो रेडियो सेट हों तो महात्मा गांधी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि अगर हर भारतीय परिवार के पास भी एक कार होगी तो सड़कों पर चलना दूभर हो जाएगा. यही नहीं दांडी मार्च के दौरान जब कुछ लोग कार पर संतरे रख कर लाए तो उन्होंने कहा था कि नियम होना चाहिए कि यदि आप चल सकते हो तो कार से बचें.

यही नहीं गांधी जी वर्षा जल संचयन, वनों के काटे जाने, जैसी बातों के भी समर्थक थे.
“सर्वाइविंग द सेंचुरी: फेसिंग क्लाउड कैओस एंड अदर ग्लोबल चैलेंजेस” नाम की किताब में धऱती को बचाने के लिए चार मानक सिद्धांतों अहिंसा, स्थायित्व, सम्मान और न्याय को जरूरी बताया गया है. ये सब वो तथ्य हैं जो बताते हैं कि पृथ्वी को बचाने के लिए गांधीजी की मौलिक सोच और उनके विचार कितने महत्वपूर्ण और गहरे हैं.

लेकिन यहां एक बात गौर करने वाली है. गांधी जी पर भारत में मुन्नाभाई से लेकर मेकिंग ऑफ महात्मा, मैने गांधी को नहीं मारा, गांधी माय फादर तक तमाम तरह की फिल्में बनी जो गांधी जी पर आधारित थी. औऱ असंख्य फिल्में ऐसी भी हैं, जिसमें गांधी को एक मेटाफर की तरह इस्तेमाल किया गया लेकिन फिर भी रिचर्ड एटनबर्ग की गांधी पर आधारित फिल्म और उसमें बेन किंग्सले का गांधी का निभाया किरदार अमर है. वजह सिर्फ इतनी है कि हम गांधी जो को मानते तो रहे हैं लेकिन हम गांधी की आज तक नहीं मान पाए जबकि जिन विदेशियों को उन्होंने भारत की ज़मीन से उखाड़ फेंका था उन्होंने ना सिर्फ गांधी को माना बल्कि उनकी भी मानी. ऐसे में गांधी है तो भारत है जैसी किताबें बेहद ज़रूरी हो जाती हैं.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए ब्लॉग से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: January 30, 2020, 5:44 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर