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बुक फेयर यानी प्रकाशकों का बिजनेस और लेखकों का त्यौहार

News18Hindi
Updated: January 15, 2020, 12:58 PM IST
बुक फेयर यानी प्रकाशकों का बिजनेस और लेखकों का त्यौहार
दिल्ली बुक फेयर

सवाल सामने आ खड़ा होता है कि फिर ऐसे आयोजनों में हिंदी लेखक इतना बढ़-चढ़कर शरीक क्यों होते हैं?

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  • Last Updated: January 15, 2020, 12:58 PM IST
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दिल्ली के प्रगति मैदान में 4 जनवरी से शुरू हुआ विश्व पुस्तक मेला कल यानी 12 जनवरी को खत्म हो गया. इस साल के पुस्तक मेले की थीम ‘गांधी : द राइटर्स राइटर’ थी. भारत और विदेशी प्रकाशकों की संख्या 600 से अधिक थी जिन्होंने 1300 से अधिक स्टॉल पर किताबों की प्रदर्शनी लगाई. आयोजकों के मुताबिक, 2020 का यह आयोजन किताबों की बिक्री के लिहाज से पिछले साल के बनिस्बत बेहतर रहा. इस साल हिंदी और अंग्रेजी दोनों में गांधी पर लिखी किताबें और गांधी की लिखी किताबों की मांग ज्यादा रही. सोचा जा सकता है कि असत्य और हिंसा के इस दौर में सत्य और अहिंसा की तलाश में निकले लोग गांधी को पकड़ने की कोशिश करते रहे. यह सुखद है.

वैसे, हर साल पुस्तक मेले में ठीक-ठाक भीड़ उमड़ती है. इस बार भी देखने को मिली. पर हिंदी के प्रकाशक अक्सर यह रोना रोते हैं कि हिंदी में पाठक कम हैं. वे किताबें कम खरीदते हैं. किताबों की बिक्री पर चल रही बहस में यह बात प्रकाशकों की ओर से बार-बार आती है कि आज के लेखक स्वांतः सुखाय लिखते हैं. वे पाठकों की रुचि के अनुरूप नहीं लिखते. यहीं पर एक सवाल मन में यह उठता है कि अगर हिंदी के पाठक कम हैं, मेले से प्रकाशकों को कोई खास लाभ नहीं मिलता तो फिर ये प्रकाशक अलग-अलग शहरों से अपना माल ढोकर ऐसे पुस्तक मेले में शामिल ही क्यों होते हैं? अगर हिंदी के लेखक अपने पाठकों की नब्ज नहीं पकड़ पा रहे तो फिर प्रकाशक ऐसी किताबें छाप ही क्यों रहे हैं?

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जाहिर है कि इस सवाल का एक जवाब तो है – नीयत में खोट। बेशक प्रकाशकों को ऐसे मेलों से फायदा तो होता ही है. उनकी संस्था का प्रचार भी होता है और किताबें भी इतनी बिक जाती हैं कि माल समेत उनके आने-जाने और रहने का खर्च आसानी से निकल जाता है. महज खर्च ही नहीं निकलता, कहना चाहिए कि उन्हें लाभ भी होता है. पर जब लेखकों की लिखी किताबों से प्रकाशकों को आर्थिक लाभ होता है तो फिर रॉयल्टी देते वक्त उनका यह लाभ कहां गुम हो जाता है. कई बार यह दिखता है कि अधिकतर प्रकाशक व्यावसायिक चतुराई दिखाते हैं और लेखक के हिस्से की कमाई भी अपने नाम कर जाते है. यह ‘चतुराई’ किसी भी लिहाज से लंबा व्यावसाहिक हित नहीं दे सकती.

तो फिर ऐसे आयोजनों का औचित्य क्या है, जिसमें लेखकों को कोई फायदा नहीं होता. दरअसल, हिंदी पट्टी ने प्रकाशकों के गैरपेशेवराना रवैये के कारण लगभग यह स्वीकार कर लिया है कि लेखन विधा से आप रोजी-रोटी नहीं चला सकते. लेखन का काम स्वांतः सुखाय जैसा मामला है.

यहीं पर यह सवाल सामने आ खड़ा होता है कि फिर ऐसे आयोजनों में हिंदी लेखक इतना बढ़-चढ़कर शरीक क्यों होते हैं? यहां पर मेरा मानना है कि हिंदी पट्टी के अधिकतर लेखकों का अंदाज पेशेवराना नहीं है. वे ‘लाभ न होने को’ अपनी नियति मान चुके हैं. उन्हें बस इतने भर से संतोष हो जाता है कि उनकी किताब मेले में प्रकाशक के स्टॉल पर दिखी. वहां कुछ पाठकों ने उनकी किताबें खरीदीं.

लाभ और घाटे की यह बहस वैसे है तो पुरानी, यह तो चलती रहेगी. पर ऐसे आयोजनों के साइड इफेक्ट इस लाभ-हानि के सवाल से कहीं ज्यादा बड़े हैं. मुझे लगता है कि ऐसे मेले लेखक और पाठकों के लिए एक ऐसा मंच सुलभ कराते हैं जहां दोनों के बीच संवाद पैदा होता है. इस मुद्दे पर वरिष्ठ कवि संजय कुंदन से बात हो रही थी. उनका मानना है कि पुस्तक मेले को विक्रय केंद्र के रूप में देखना एक नजरिया है, दूसरा नजरिया पाठक-लेखक संवाद भी है. मगर यह दूसरा नजरिया भी सही ढंग से सध नहीं पा रहा. उन्होंने कहा, बेहतर होता कि इस संभावना को और मजबूत किया जाता. पुस्तक मेलों में पाठकों और लेखकों के बीच संवाद की ठोस योजना बनाई जाती तो शायद हिंदी लेखकों, पाठकों और प्रकाशकों को और बेहतर नतीजा मिल पाता.मुझे लगता है कि बेहतर की संभावना तो हर स्थिति में बनी रहती है. ऐसे में ऐसे मेलों का एक बड़ा औचित्य यह दिखता है कि हिंदी पट्टी के पाठकों को अपनी मनपसंद कई किताबें एक ही जगह पर आसानी से सुलभ हो जाती हैं. अब इसे प्रकाशकों-लेखकों की प्रचार की कमी कहें या पाठकों का कम जागरूक होना मानें पर सच तो यह है कि कई महत्वपूर्ण किताबों के प्रकाशन की पूरी जानकारी पाठकों को नहीं होती. ऐसे में जब कोई पाठक पुस्तक मेले में जाता है तो वह अलग-अलग प्रकाशकों के स्टॉल पर भटकता भी है. इस भटकाव में कई बार वह अपनी पसंद की किताबें पा लेता है और कई बार उसे निराशा भी हाथ लगती है. इस क्रम में उसके पास कई नई किताबों की सूचना भी मिलती है. मुमकिन है कि इन नई सूचनाओं में कोई सूचना उसके काम की भी निकल जाए.

पाठकों को दूसरा लाभ यह मिलता है कि उनकी मुलाकात अपने पसंद के लेखकों से होती है. विचारों का आदान-प्रदान होता है. बहुत हड़बड़ी में ही सही पर पाठक और लेखक बातचीत में एक दूसरे को तौलते हुए अपनी कोई राय बना पाते हैं. पाठक यह तय कर पाते हैं कि उसका प्रिय लेखक वाकई प्रिय है या उन्हें कोई गलतफहमी रही थी. लेखक यह समझ पाता है कि उसके लेखन का पाठक पर क्या असर पड़ रहा. तो संवाद की ये जो संभावना ऐसे मेले देते हैं, यही ऐसे आयोजनों की कामयाबी है.

इस नजरिये से देखूं तो इस नतीजे पर पहुंच पाता हूं कि ऐसे मेलों से सबसे ज्यादा हासिल पाठकों के हिस्से जाता है. मेले में लेखकों से संवाद और किताबों से जुड़कर पाठकों के बीच विचारों की एक शृंखला बनती है, जिन्हें वह भावी जीवन भर पालता-पोसता है. प्रकाशकों के हिस्से वह बिजनेस आता है जो उन्हें प्रकाशन व्यवसाय में टिके रहने के लिए जरूरी है. रही बात हिंदी पट्टी के लेखकों की तो उनके हिस्से वह तोष है, जो उन्हें आगे भी लिखते रहने की प्रेरणा देता है और उम्मीद जगाता है कि देर-सबेर व्यावसायिक चतुराई खत्म होगी और उन्हें अपने लिखे का आर्थिक लाभ भी होगा.

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First published: January 13, 2020, 12:15 PM IST
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