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21 दिन बाद बाड़े से निकलकर क्या कीजिएगा?

News18Hindi
Updated: March 26, 2020, 11:50 AM IST
21 दिन बाद बाड़े से निकलकर क्या कीजिएगा?
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आज प्रकृति ने पूरी दुनिया को बताया है कि बाड़े में कैद होना क्या होता है. भले ही उसका स्वरूप वैसा ही हो जैसा आप चाहते हों.

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  • Last Updated: March 26, 2020, 11:50 AM IST
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लाइफहाथी का एक बच्चा, कुछ ही हफ्तों का रहा होगा, एक राष्ट्रीय अभ्यारण्य (sanctuary) में अकेला भटक रहा था. उसकी जितनी उम्र थी उसके हिसाब से तो साथ में उसकी मां को होना ही चाहिए था लेकिन वो कहीं दिखाई नहीं दे रही थी. एक भलेमानस को हाथी के इस बच्चे पर दया आई या यूं कहें कि वो हाथियों को बचाने वाले समूह का सदस्य था. वो बच्चे को अपने साथ एक सुरक्षित जगह ले आया. अब उस हाथी के बच्चे के लिए वो जगह ही उसका घर था. अब उसे मां के दूध की जगह फॉर्मूला दूध मिल रहा था जिसे वो बोतल से पी रहा था. उसकी मां शायद आदमी और हाथियों के बीच हुए संघर्ष का शिकार हो चुकी थी.

ये नन्हा हाथी - 'हाथी मेरे साथी' जैसी किसी फिल्म का नहीं है. ना ही बच्चे को बचाने वाला कोई राजेश खन्ना है बल्कि ये वो हकीकत है जो भारत के दक्षिणी छोर यानि श्रीलंका में दुनिया के ख़ास जानवरों में से एक हाथियों की मुश्किलों को बयान करती है. सदियों तक इस हिस्से में खुलेआम घूमते रहने के बाद ये विशाल शाकाहारी जीव अब ऐसी लड़ाई में फंस गए हैं जिसे वो जीत नहीं सकते. ज़मीन पर लगातार हो रही बसावट और खेती के लिए साफ हो रहे जंगलों की वजह से यहां इंसान औऱ हाथियों के बीच की दूरी लगातार कम होती जा रही है और इसके खतरनाक नतीजे सामने आ रहे हैं.

श्रीलंका से हाथियों का रिश्ता कोई आज का नहीं है बल्कि ये रिश्ता पांच हजार साल पुराना है. दुनिया भर में एशियाई हाथी श्रीलंका के हिस्से में सबसे ज्यादा आए हैं. यहां करीब 6 हजार हाथी, 2 करोड़ 10 लाख लोगों के साथ मिलकर रहते हैं. यहां हाथियों को जश्न और पूजा में शामिल किया जाता रहा है, ये उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी में शुमार रहा है, यहां इसे ताकत, बुद्धि, किस्मत और संपन्नता का प्रतीक माना जाता हैं. चावल और श्रीलंकन हाथियों के बगैर इस देश की कल्पना भी नहीं की जा सकती है लेकिन ज़मीन की भूख, प्राकृतिक जंगलों की जगह कंक्रीट जंगलो का निर्माण, लगातार बढ़ती आबादी और उनके लिए तैयार की जा रही खेती की ज़मीन ने इस तस्वीर को बदल कर रख दिया था. आज हालात ये हो गए है यहां हाथियों की संख्या इस कदर घटी है कि वो विलुप्त प्रजातियों में शुमार हो गए हैं. पहले हाथी जहां खुले आम घूमा करते थे. अब वहां उनके खड़े रहने पर भी मनाही हो गई है. इसका नतीजा ये निकला कि वो बेघर तो हुए ही साथ ही उनके खाने की दिक्कतें भी लगातार बढ़ रही है. भूख ऐसी प्रक्रिया होती है जो वो सब करने पर भी मजबूर कर देती है जिसकी कल्पना मात्र से भी हम शायद घबरा कर उठ जाएं. ऐसा ही यहां हाथियों के साथ हो रहा है. वो उन खेतों में जाने लगे, उस अनाज को खाने लगे जो इंसान अपने लिए पैदा कर रहा था. तकनीकी तौर पर तो वो ज़मीन हाथी की ही थी और जिस तरह हमारे खेतों को अधिया पर देने की परंपरा रही है और उसकी उपज को दो हिस्सों में बांट लिया जाता रहा है. उस लिहाज से हाथी भी अपना हिस्सा ले रहे हैं. अब चूंकि उन्हें उनका हिस्सा दिया नहीं जा रहा था . तो उन्होंने जबरन अपना हिस्सा लेना शुरू कर दिया बस यहीं से संघर्ष बढ़ने लगा.

खास बात ये है कि जो फसल हम उगाते हैं उससे कहीं गुना बेहतर और पोषक भोजन वो होता है जो हाथियों को जंगल में मिला करता था. हाथी प्रकृति से बंधे हुए हैं और उन्हें मालूम है कि उनके शरीर को कितने पोषक तत्व की ज़रूरत है चूंकि हमारी फसल उतनी पोषक नहीं है तो हाथी ज्यादा खा रहे हैं और इंसान इसलिए खफा है क्योंकि उसे लग रहा है कि हाथी उसकी मेहनत को बरबाद कर रहा है.



इस संघर्ष को कम करने के लिए पहले जो समाधान निकाला गया वो ये था कि हाथियों को किसी राष्ट्रीय पार्क में डाल दिया जाए, जहां वो घूमते थे उस इलाके में इलेक्ट्रिक बाड़ा लगा दिया गया. कुल मिलाकर समाधान वो था जो इंसानों के लाभ का था. इसलिए गड़बड़ी में कोई कमी नहीं आई और संघर्ष जारी रहा.

श्रीलंका में 24 सालों से काम करने वाले डॉक्टर प्रुथु ने इस संघर्ष से निपटने का दूसरा तरीका निकाला. इस बार इलेक्ट्रिक तारों से घिरे सुरक्षित बाड़े में हाथियों कों नहीं रखा गया बल्कि इसे इंसानों के चारों तरफ लगा दिया गया . कुल मिलाकर अब हाथी बाहर थे और इंसान और उनके खेत के चारों तरफ बाड़ा था. ये एक मौसमी बाड़ा था, जब किसान बुआई करता तो एक दो दिन के लिए इस बाड़े को लगा लेता, फिर जब कटाई को वक्त आता तो बाड़े को लगा कर कटाई करके अनाज घर ले जाता. और अगर उसे अगली बुवाई करनी होती तो बाड़ा लगा रहने देता. बाकी वक्त ये ज़मीन हाथियों के लिए होती थी. इसके अलावा सारे जंगल औऱ बची हुई सारी ज़मीन हाथियों के हवाले थी.

अगर आप ऊपर का हिस्सा पढ़ते हुए यहां तक आ गए हैं तो थोड़ी देर के लिए रुकिये और अपने घर से बाहर निकल कर गैलरी, छत या आंगन में जाइए. आपको जो चिड़ियों का कलरव सुनाई देगा, वो आपने कई सालों से नहीं सुना होगा या उसे सुनने के लिए ही आपने कई बार पहाड़ों पर वीकेंड मनाने की योजना तैयार की होगी. अगर आपके घर के आस पास कोई पार्क हो तो उसमें झांकिए, गिलहरी को इतना उछलते हुए आपने नहीं देखा होगा. बगैर किसी बर्ड सेंक्चुरी में जाए आप आसानी से चिड़ियों को फूलों का रस पीते हुए देख सकते हैं.

दरअसल जिस ज़मीन को हमने हड़पा है, जिस नदी को हम पी गए हैं, हमने बरबाद कर दिया है. जिस हवा को हमारी सहूलियतों ने जहरीला बना दिया है और जो कलरव हमारे शोर के पीछे कहीं दब गया था. प्रकृति ने वही आपको सुनाया है.

आज प्रकृति ने पूरी दुनिया को बताया है कि बाड़े में कैद होना क्या होता है. भले ही उसका स्वरूप वैसा ही हो जैसा आप चाहते हों. तारों से घिरे पेड़ों के झुंड जिसे आपने अभ्यारण्य या जंगल का नाम दिया है वो आपके लिए हरे भरे ज़रूर होंगे लेकिन वो जानवरों के लिए बाड़ा ही था. शायद जब आप इस बाड़े से बाहर निकले तो आप ये समझ चुके होंगे और हम एक नई दुनिया के निर्माण में नई सोच लेकर आगे बढ़ेंगे.

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First published: March 26, 2020, 11:50 AM IST
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