बिहार में बजा चुनावी बिगुल, जानें क्यों अलग हैं इस बार के Assembly Election

 इस बार के विधानसभा चुनाव भी कई चुनौतियों के लिए जाने जाएंगे. (सांकेतिक तस्वीर)
इस बार के विधानसभा चुनाव भी कई चुनौतियों के लिए जाने जाएंगे. (सांकेतिक तस्वीर)

कोरोना संकट से जुझने के बाद अगर ये चुनाव बिना किसी बाधा के पूरे हो जाते हैं तो चुनाव आयोग (Election Commission) दुनिया भर के सामने एक उदाहरण पेश करेगा और आने वाले एक दो सालों तक सफलता को दोहराएगा भी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 26, 2020, 11:12 AM IST
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अरसे बाद बिहार में सिर्फ तीन चरणों में चुनाव (Bihar Assembly Election) होने वाले हैं. चुनाव आयोग के बाद बिहार में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गयी हैं. रिकार्ड चौथे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) एक बार फिर अपने विकास के कामों की फेहरश्त गिनाने से पीछे नहीं हैं. नीतीश ने सक्षम बिहार-स्वालंबी बिहार का नारा दे दिया है. साथ ही मौजूदा कार्यकाल में अपने 7 निश्चय को पूरा करने का दावा कर रहे नीतीश कुमार ने ये भी ऐलान कर दिया कि वो अगले सात निश्चय के ऐजेंडे के साथ तैयार हैं. बीजेपी का उन पर दांव लगाने का ऐलान भी बिहार में एनडीए (NDA) के बीच खींचतान को कम के कम ही रख रहा है. बीजेपी सूत्रों ने ये भी संकेत दिए हैं कि अगर जेडीयू की सीटें भी कम आई तो भी गठबंधन के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे. लोकजनशक्ति पार्टी के इरादे जेडीयू से दो दो हाथ करने के नजर आ रहे हैं, तो भी किसी के माथे पर शिकन नजर नहीं आ रही है.

नीतीश कुमार के लिए ये एक रिकॉर्ड चौथा टर्म तो होगा ही. साथ ही 4 दशकों के बाद पहली बार ऐसा विधानसभा चुनाव होगा जिसमें लालू प्रसाद यादव प्रचार करते नहीं नजर आएंगे. ये बात और है कि उनके बेटे तेजस्वी यादव एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभर कर सामने तो आए हैं, लेकिन मजबूत विकल्प के रूप में अब तक कोई सफलता के झंडे नहीं गाड़े हैं. लालू यादव का माई फॉर्मुला अब तक उनके लिए भी एक मजबूती से खड़ा नजर आ रहा है, लेकिन यूपीए में खींचतान जारी है. सीटों की मारामारी को लेकर न तो कांग्रेस और न ही बाकी सहयोगी अपने पत्ते खोल रहे हैं. कुल मिलाकर एक बिखरा विपक्ष है जो बूथ स्तर तक मजबूत टीम बीजेपी से कितना टकरा पाएगी, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं.

साल 2020 चुनौतियों का साल है



कोरोना संकट, अर्थव्यवस्था का बिगड़ना, चीन के साथ सीमा पर तनातनी, पूरा देश चुनौतियों से जुझ रहा है,  इसलिए इस बार के विधानसभा चुनाव भी कई चुनौतियों के लिए जाने जाएंगे.


चुनौती नंबर 1- चुनाव आयोग के नाम

कोरोना के संकट के बाद का ये पहला विधानसभा चुनाव है. चुनाव आयोग के सामने बड़ी चुनौती है इतने बड़े स्तर पर चुनावी ड्यूटी पर कर्मचारियों को तैनात करना और साथ ही ये सुनिश्चित करना की दिशा निर्देशों का पालन होता रहे. तभी तो तारीखों का ऐलान करने के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ने वो तमाम उपाय गिनाए जो कोरोना से जंग में चुनाव आयोग इस्तेमाल करेगा. कोरोना संकट से जुझने के बाद अगर ये चुनाव बिना किसी बाधा के पूरे हो जाते हैं तो चुनाव आयोग दुनिया भर के सामने एक उदाहरण पेश करेगा और आने वाले एक दो सालों तक सफलता को दोहराएगा भी. लेकिन अभी तो ये शुरुआत ही है. नेताओं और जनता ने भी कोरोना से सबक ले लिया है, इसलिए अनुशासन बना रखने के आसार नजर तो आ ही रहे हैं.

चुनौती नंबर 2- नीतीश सरकार की अग्नि परीक्षा

कोरोना की चुनौती का सामना करने में नीतीश सरकार कितनी खरी उतरी इसका फैसला आना बाकी है. साथ ही बाढ़ की विभिषिका झेल रहा बिहार. नीतीश सरकार ने कोशिश तो की लेकिन कोरोना का संकट और प्रवासी मजदूरों की वापसी में पहले हाथ पीछे खींचना, फिर गलती दूसरे राज्यों पर टालना बिहार के वोटरों ने देखा है. साथ ही 15 साल की एंटी इंकंबेंसी भी है. बिहार बदला तो है लेकिन प्रकृति की मार से बचना आसान नहीं होता. प्रकृति की विभिषिका से बचना किसी विकसित देश के लिए भी आसान नहीं होता. लेकिन नीतीश कुमार की कोशिशों को कोई नजरअंदाज नहीं कर रहा. कम से कम बिहार की जनता ने एक उम्मीद से उन्हें राज्य की सत्ता दी थी और एक बार फिर वोटर ही तय करेगा कि उनके सपने साकार करने की कोशिश किसने की है.

चुनौती नंबर 3- विपक्ष की एकजुटता

बिहार में विपक्ष की मुश्किल यही रही कि वो न तो सरकार की कमियों को गिना पायी और ना ही एकजुटता का संदेश दे पायी. लालू का उत्तराधिकारी कौन के मसले पर उनके ही कुनबे में घमासान मचता रहा. तेजस्वी यादव हावी होकर निकले तो उनके बाकी सहयोगी उनके सीएम पद का उम्मीदवार घोषित करने से कतराते रहे हैं. जाहिर है लालू यादव का बनाया मुस्लिम यादव समीकरण का जादू अब भी बरकरार है, लेकिन मुश्किल ये है कि इसमें दूसरी जातियों का मेल नहीं हो पा रहा है. जीतनराम मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा, सब एनडीए वापसी की राह में हैं. कांग्रेस अपनी उलझनों में ऐसी फंसी है कि वो तेजस्वी यादव का साथ देने के बजाए अपनी नाप तौल लगी है. यानी ये विपक्ष की अग्निपरीक्षा है कि कैसे एकजुट होते हैं.

चुनौती नंबर 4- मोदी मैजिक

कोरोना से जंग हो या फिर चीन के साथ सीमा पर दो-दो हाथ, मोदी सरकार ने देश और दुनिया भर में वाहवाही लुटी है. प्रवासी मजदूरों के लिए भी मोदी सरकार ने आगे बढ़ कर काम किया. बिहार पर तो पीएम मोदी का खास ध्यान था. देश भर में चुने गए 116 सबसे पिछड़े जिले जहां क्षमिक लौटे थे, उनमें बिहार के जिलों की संख्या सबसे ज्यादा थी. चुनावों के पहले अपनी वर्चुअल रैलियों में पीएम मोदी ने 1600 करोड़ की लागत की योजनाओं का ऐलान भी किया. 2015 में ऐलान की गई कुल 54 योजनाओं में 8 का काम पूरा हो चुका है और 38 काम पूरा होने की कगार पर है. इसलिए एंटी इंकंबेंसी का माहैल भले ही कुछ इलाकों में नजर आए, लेकिन एनडीए को भरोसा है मोदी मैजिक ही एक बार फिर उनकी नैय्या पार लगाएगा और पीएम मोदी ने इसकी शुरुआत कर दी है.

बिहार के चुनावी नतीजों की दुनिया भऱ को हमेशा से प्रतीक्षा रहती है, इसलिए चुनौती भरे इस साल में बिहार का चुनाव एक बार फिर कोई न कोई मिसाल जरूर पेश करेगा.
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