'सिलगेर में सीआरपीएफ ने गोली नहीं चलाई और दोषियों को सजा जरूर मिलनी चाहिए'

आदिवासियों का धरना प्रदर्शन. (Pic- News18)

आदिवासियों का धरना प्रदर्शन. (Pic- News18)

'अगर सरकार अपने अर्ध शिक्षित सुरक्षा बलों पर नियंत्रण नहीं रख सकती और उसकी गम्भीर गलतियों की आलोचना भी नहीं कर सकती तो इस दंडहीनता के माहौल का भविष्य बेहतर नहीं दिखता.'

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  • Last Updated: June 10, 2021, 11:13 AM IST
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सिलगेर के सीआरपीएफ कैम्प के बाहर हुई पुलिसिया गोलीबारी के बाद, जिसमें अब तक 4 आदिवासी मारे गए हैं, मैंने सीआरपीएफ के एक बड़े अधिकारी, जो बड़े दिन बाद मोबाइल रेंज में आए थे, हड़बड़ाकर पूछा 'तो गोली चलाने के पीछे कोई कारण था क्या?' उन्होंने शांति से जवाब दिया 'हम सीआरपीएफ वालों ने गोली नहीं चलाई थी. पुलिस और डीआरजी के लोग मामले को संभाल नहीं पाए और गलती कर बैठे.'

मैंने पूछा- तो जिन्होंने गोली चलाई क्या उनको सजा मिलनी चाहिए? जवाब मिला- 'जी इसकी एक प्रक्रिया है, पर जांच के बाद उनको सजा जरूर मिलनी चाहिए.' मैंने कहा मैं इस बातचीत को सुरक्षित रख रहा हूं और इस बारे में लिखूंगा. उन्होंने कहा कि मेरा नाम मत लिखिए पर लिखिए ज़रूर.

'सीआरपीएफ एक प्रोफेशनल फ़ोर्स है' उन्होंने आगे बोलना जारी रखा... इसके पहले जो कैम्प लगा था मिनपा में, वहां भी बहुत भीड़ (लगभग दो-ढाई हजार) कई दिन का राशन लेकर आई थी, पर हमने उनको बिठाकर समझा बुझाकर भेज दिया था. भीड़ के नेता टाइप के यंग और पढ़े लिखे लड़कों को हमने पूछा था तो उन्होंने बताया कि नक्सलियों के आदेश से उन्हें आना पड़ता है.

उन्‍होंने कहा, 'कमरगुडा में भी ऐसे ही भीड़ आई थी. पर वहां पर तो भीड़ ऐसी थी कि वो नाम के लिए ही आई थी. मतलब नक्सलियों को जाकर बता सके कि हां हम विरोध करने गए पर क्या करें पुलिस ने पीटकर भगा दिया'

मैंने पूछा- 'तो इस बार क्या अलग हुआ?' उन्‍होंने कहा, 'इस बार भी जनता उग्र नहीं थी, दरअसल वहां पर जनता के ऊपर नक्सलियों का दबाव ज्यादा था. अगर पुलिस दो किमी पहले कट ऑफ लगा देती तो नक्सली भीड़ में नहीं आ पाते और भीड़ के साथ नहीं होने पर भीड़ के ऊपर इतना दबाव नहीं बना पाते. जनता के पास तो ऑप्शन नहीं है. अगर नक्सलियों का कहना नहीं माने तो या तो गांव छोड़कर जाने का हुक्म मिल जाएगा या किसी दिन मुखबिरी का आरोप लगाकर मार देंगे.'

उन्होंने मुझसे पूछा- 'पर क्या आप भी सड़क बनाने के ख़िलाफ हैं जैसा काफी शहरी लोग भी आजकल कर रहे हैं? कैम्प तो इसलिए लगाने पड़ रहे हैं क्योंकि माओवादी लोग सड़क नहीं बनने दे रहे हैं बिना सुरक्षा के.जबकि ये सड़कें तो बहुत पुरानी हैं.जगरगुंडा से बासागुड़ा को जोड़ने वाली सड़क आप ही बताओ बननी चाहिए कि नहीं?

मैंने कहा, 'बिल्कुल, पर आप इस बात से सहमत हैं कि नहीं कि जिन लोगों ने गलती की है उनको सजा मिलनी चाहिए? उन्होंने जवाब दिया, 'जी बिल्कुल, अब तो जांच भी शुरू हो गई है, मेरे ख्याल से अगर सड़क, बिजली, मोबाइल टावर ये बिना सुरक्षा के लगाने दें तो कैम्पों की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. इनमें से एक भी सड़क ऐसी नहीं है जो पहली बार बन रही हो, ये सड़कें तो सब सलवा जुडूम से पहले अस्तित्व में थी. उन्हीं को नए सिरे से बनाया जा रहा है.'



फिर उनके प्रश्न के जवाब पर मैंने बोलना शुरू किया, 'किसी भी लोकतंत्र में सड़क बनाने के लिए कैम्प बैठाने के सरकार के अधिकार का विरोध तो नहीं किया जा सकता पर सरकार अगर अपने ही संविधान का पालन करते हुए ग्राम सभा से अनुमति भी ले तो उचित होगा या सरकार उस इलाक़े को अशांत घोषित कर संविधान को स्थगित भी कर सकती है, जो अब तक उन्होंने नहीं किया है.'

'और अगर सरकार अपने अर्ध शिक्षित सुरक्षा बलों पर नियंत्रण नहीं रख सकती और उसकी गम्भीर गलतियों की आलोचना भी नहीं कर सकती तो इस दंडहीनता के माहौल का भविष्य बेहतर नहीं दिखता. जहां एक ओर माओवादियों की सिर्फ़ अपनी राजनीति बचाने के लिए सड़क और पुल ना बनने देने के तर्क का समर्थन नहीं किया जा सकता, वैसे ही अकर्मण्य पुलिस की गोलीबारी की जितनी भर्त्सना की जाए वह कम है.'

उन्होंने पूछा- तो यह आंदोलन किधर जाता दिख रहा है? माओवादी अब किसान आंदोलन से सीख लेकर एक लम्बे संघर्ष की ओर लोगों को धकेलने की तैयारी में हैं ऐसा लग रहा है. इससे पहले उन्होंने दंतेवाड़ा और नारायणपुर में इस प्रयोग का सेमीफ़ाइनल किया था जहां भी हज़ारों की संख्या में आदिवासी सड़क पर आए थे जिनमें उनकी कुछ मांगें जायज और संवैधानिक थीं, पर सभी को यह समझ है कि ये आंदोलन दरअसल माओवादी आंदोलन को ज़िंदा रखने के लिए सड़क और पुल रोकने के आंदोलन हैं.

कुछ लोग कह रहे हैं कि जैसे किसान आंदोलन का कोई भविष्य नहीं है, वैसे ही सिलगेर आंदोलन का भी कोई भविष्य नहीं है.

आप राशन पानी लेकर जितने दिन चाहे बैठे रहिए पर भारत में आजकल की सरकारों पर इन सबका अब कोई असर नहीं पड़ता, चाहे वह किसी भी पार्टी की सरकार हो.

तो फिर आदर्श स्थिति होनी चाहिए? उन्होंने फिर पूछा... नेपाल में जब माओवादी आंदोलन अपने चरम पर था और बातचीत की सुगबुगाहट शुरू हुई थी तब लोगों का हुजूम काठमांडू की सड़कों पर उतरा था. लोग लोकतंत्र की मांग कर रहे थे और उस भीड़ के पीछे माओवादियों के समर्थन होने की अटकलें लगाई जा रही थी. उन शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बाद जब बातचीत हुई तो माओवादी जो पूरी दुनिया में क्रांति और माओवाद लागू करने के लिए लड़ रहे थे उन्होंने नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना की शर्त पर अपना सशस्त्र आंदोलन वापस ले लिया था.


देखना यह है कि सिलगेर आंदोलन किधर जाता है? पर इतिहास गवाह है कि जैसा नेपाल में हुआ था, अगर लाल इलाकों के बाहर के बस्तरिया इस आंदोलन में जुड़कर बस्तर में जल, जंगल और ज़मीन या बस्तर में भारत के संविधान लागू करने की मांग करते हैं और उसके बाद शुरू हुई बातचीत में अगर माओवादी बस्तर में आदिवासी समर्थक कानूनों जैसे पांचवीं अनुसूची, वनाधिकार और पेसा आदि को लागू करने की शर्त पर अपना सशस्त्र आंदोलन वापस लेते हैं तो वह उनका एक ऐतिहासिक योगदान होगा.

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