गंगा के गंगत्व में है कोरोना का इलाज ?

गंगा के गंगत्व में है कोरोना का इलाज ?
क्या गंगा में पाए जाने वाले बैक्टिरियोफेज से कोरोना का इलाज संभव है, पढ़ें

क्या गंगा में पाए जाने वाले शक्तिशाली बैक्टीरिया बैक्टिरियोफेज (Bacteriophage) से कोरोना (Covid19) का इलाज संभव है, जानें...

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वेंटीलेटर क्या होता है, औऱ जिसे वो लगा रहता है उसे किस तकलीफ से गुज़रना पड़ता है. इसका अहसास हो रहा था. चाचा पिछले 15 दिनों से भोपाल के कस्तूरबा अस्पताल में वेंटिलेटर पर थे. बीमार रहते हुए तो उन्हें लगभग दो दशक से भी ज्यादा वक्त बीत चुका था. 84 की मिथाइल आइसो साइनेट फेफड़ों में ऐसी घुसी की वहीं जम कर रह गई. जब गैस ने फेफड़ों को अपना घर बनाया था तब चाचा की उम्र कोई 27-28 के दरमियान रही होगी. उस दौरान बस ये होता कि मौसम बदलने के साथ बीमारी आ जाती. सामान्य खांसी जुखाम ने धीरे धीरे सांस फूलने औऱ दमा जैसे लक्षणों का रूप ले लिया था. शादी तो हो चुकी थी और बच्चों की चाहत ने दो लड़कियां भी गोद में डाल दी थी. फिर लड़के की चाहत ने दो लड़कियों को और धरती पर उतार दिया था. सब कुछ ठीक था, सरकारी नौकरी, उसमें अधिकारी का पद, किस्मत साथ देती गई और पदोन्नति भी होती जा रही थी लेकिन सांस फूलने का सिलसिला भी बढ़ता जा रहा था. कस्तूरबा में भरती होने से पहले वो खुद को भारत के लगभग सभी बड़े अस्पतालों में दिखा चुके थे उसमें एम्स भी शामिल है. सारी तरह की पैथी (ऐलोपैथी, होम्योपैथी, यूनानी और आयुर्वेद) का भी सहारा ले चुके थे लेकिन मर्ज जाने का नाम नहीं ले रहा था. हालात इतने ज्यादा बिगड़ने लगे थे कि साथ में ऑक्सीजन का सिलेंडर रखना पड़ता था. ऐसी ही बिगड़ते हालात में कस्तूरबा अस्पताल में वेंटिलेटर का सहारा लेना पड़ रहा था. लेकिन अब जेब भी साथ नहीं दे रही थी. वेंटिलेटर के सहारे सांस लेते औऱ स्पूटम (कफ) बाहर निकालने की प्रक्रिया ने उनके पूरे परिवार को हिला कर रख दिया था. अब भोपाल मेमोरियल अस्पताल ही अंतिम विकल्प बचा था. हालांकि भोपाल मेमोरियल पहला विकल्प होना चाहिए था क्योंकि वो गैस पीड़ितों के लिए ही बनाया गया था और वहां उनका इलाज ही नही उन पर शोध भी होता था जो बीमारी से निजात पाने में कारगर साबित हो सकता था. लेकिन ये शोध ही ऐसा शब्द था जो वेंटिलेटर का सहारा लिए हुए पीड़ित सहित कई लोगों के उस अस्पताल से किनारा करने का कारण था. चाचा की सांस फूलने औऱ बीमारी बढ़ने के पीछे की एक वजह और भी थी उनका तमाम जगह पर कोशिश करना औऱ विश्वास किसी पर भी नहीं करना, हर तरीका अपनाना औऱ किसी के साथ टिक कर नहीं रहना.


ऐसे में कस्तूरबा अस्पताल से उन्हें वेंटिलेटर लगी एंबुलेंस से भोपाल मेमोरियल ले जाने का फैसला लिया गया उनके स्पूटम (बलगम) का कल्चर टेस्ट किया गया और ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक टेस्टिंग भी हुई.
जो परिणाम आया वो हिला देने वाला था, उनके बलगम में मौजूद बैक्टीरिया लगभग सारी एंटिबायोटिक के प्रति रेजिस्टेंस (प्रतिरोधक क्षमता) बना चुका था. जिसे डॉक्टरी भाषा में मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस कहते हैं. डॉक्टर को समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. माइक्रोबायलॉजी लैब में शोधार्थियों के लिए भी ये एक चुनौतीभरा मामला था. फिर उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया जो थोड़ा अलग था. शोधार्थियों ने पीड़ित के बलगम में मौजूद बैक्टीरिया पर नीम को पीस कर बनाई गोलियों का असर देखा. असर चौंकाने वाला और सकारात्मक थे. बस पीड़ित को नीम के पत्तों की बना गोलियों को पीस कर दिया जाने लगा. दो दिन के अंदर पीड़ित वेंटिलेटर से बाहर आ गया था. धीरे-धीरे उसमें सुधार भी होने लगा. डॉक्टर कुछ और रिसर्च करना चाहते थे लेकिन चाचा को लग रहा था कि उनके साथ पता नहीं क्या किया जा रहा है और सरकारी मशीनरी के अपने चोंचले कुल मिलाकर कुछ दिनों के बाद चाचा नहीं रहे.




दरअसल विज्ञान सिर्फ संभावनाओं पर ही जीवित है. इस पूरी घटना का ज़िक्र ही सिर्फ इसलिए क्योंकि पूरी दुनिया कोरोना के संकट से जूझ रही है औऱ उससे निजात पाने की कोशिश में लगी हुई है. ऐसे में हमें गंगा के उस गंगत्व की तरफ भी ध्यान करने की ज़रूरत हैं जिसकी बदौलत गंगा की ख्याति उसे दुनिया की सभी नदियों के ऊपर रखती है.
क्या बैक्टिरियोफेज में संभावना है ?
बैक्टीरियोफेज यानि गंगा में पाया जाने वाला वो सूक्ष्मजीव जो गंगा के अंदर पनप रहे दूसरे सूक्ष्मजीवों का भक्षण करके ही अपनी भूख मिटाता है. इसी की वजह से गंगा का पानी कभी भी खराब नहीं होता है, हालांकि ये कोई ऐसी जानकारी नहीं है जो आपको नहीं पता होगी. बीते चार दशकों में ये बात इतनी बार दोहरा दी गई है कि अब तो उन लोगों को भी गंगा के इस गंगत्व के बारे में पता चल चुका है जो कभी गंगा के किनारे गए भी नहीं हैं. लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि राष्ट्रीय पर्यावरण यांत्रिकी संस्थान, नागपुर ने अपनी शोध में पाया कि अपर गंगा नदी में इस बैक्टिरियोफेज की संख्या अद्वितीय है. खास बात ये है कि इस शोध में पता चला है, कि गंगाजल में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव बैक्टिरियोफेज में 17 तरह के रोगाणुओं को जिन्हें क्लिनिकल (नैदानिक) तौर पर अलग किया गया था उनको मारने की क्षमता मौजूद है.


एक और शोध के मुताबिक कुछ फेज़ वायरस में फेफड़ों पर हमला करने वाले जानलेवा वायरस से लड़ने की क्षमता होती है और ये शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को भी बड़ा सकते हैं. एक अन्य शोध बताती है कि बैक्टिरियोफेज़ को सांस के ज़रिये शरीर में पहुंचाने यानि सूंघने से फेफड़ों की क्षमता बड़ सकती है. यही नही सेन डियागो विश्वविद्यालय ने फेज़ के बैक्टिरिया पर कई तरह के प्रयोग करके पाया कि ये बैक्टिरिया जनित बीमारियों में बहुत कारगर होता है. इस रिपोर्ट से ये निष्कर्ष निकाला गया कि प्राकृतिक रूप से पाए गय फेज़ के अलग अलग रूपों के मिश्रण को शऱीर में डाल कर कई बीमारियों से बचा जा सकता है.

क्या कहते हैं हमारे शास्त्र:
रामचरित मानस में लिखा है,

दरस,परस, मज्जन अरू पाना ।।

हरइ पाप कह बेद पुराना ।।

यानि, देखना, छूना, घिसना औऱ पीना. अगर इस हम आज के परिप्रेक्ष्य में समझे तो इसे यूं देखा जा सकता है कि मरीज को नाक के ज़रिये सुंघाकर, आचमन करके औऱ नदी में स्नान करके ( जो कहा जाता है कि नदी में नहा लेने से सारे पाप खत्म हो जाते हैं इसका तात्पर्य त्वचा के विकारों से समझा जा सकता है) इससे शरीर को लाभ पहुंचाया जा सकता है.


एचयू में आयुर्वेद के डीन यामिनी भूषण अपने पेपर में इस उपचार को तीन हिस्सो में बांटा है, शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक चूंकि बैक्टिरियोफेज जिसे फेज़ भी कहते हैं वो धऱती पर कई रूपों में पाया जाता है, इसलिए शारीरिक तौर पर तो प्राप्य है लेकिन बाकि दोनों रूपो में वो गंगा जल में ही पाया जा सकता है.

इसी तरह की एक और खोज का जिक्र मिलता है जिसके मुताबिक जापान के एक वैज्ञानिक हैं. डॉ. मसारू ईमोटो. उन्होने हाथ में जल भरकर श्राप देने की प्रक्रिया को मज़ाक में या अंधविश्वास के तौर पर नहीं लिया बल्कि इसे अपनी शोध का विषय बनाया. उनकी शोध थी - ‘पानी के सोचने समझने की क्षमता’.

उन्होने विभिन्न स्थानों के पानी को मंत्रों के बीच रखकर या राजनीतिक भाषणों के बीच रखकर -25 डिग्री पर जमाया. इतने माइनस में जाकर पानी रवा विन्यास (क्रिस्टल) में परिवर्तित हो जाता है. इस परियोजना से जुड़े सभी वैज्ञानिक उस समय आश्चर्य में पड़ गए जब मंत्रों के बीच रखे पानी के क्रिस्टल पुष्प की तरह खूबसूरत आकार लिए हुए थे. इससे भी बढ़कर जब यह प्रयोग गंगाजल पर किया गया तो उसके क्रिस्टल कमलाकार थे. शायद इसीलिए शास्त्र और लोक परम्परा ने गंगाजल को संकल्प और साक्षी का दर्जा दिया. हालांकि वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग इस तरह के प्रयोगों को विज्ञान का दर्जा नहीं देता. इसी बात को आधार बनाकर बेक्टिरियोफेज़ के साथ फेज़ थैरेपी पर भी प्रयोग किए जा रहे हैं.


क्या फेज़ थेरेपी हो सकती है कारगर? 
एंटीबायोटिक के लगातार बेअसर होने और रोगाणुओं के ताकतवर होने की वजह से वैज्ञानिक तमाम दूसरे तरीकों को भी आजमा रहे हैं इसके तहत उन्होंने बेक्टिरियोफेज़ का असर दूसरे रोगाणुओं पर देखा है. जिसके तहत पाया गया है कि सूडोमोनान एरियोजिनोसा जो फेफड़ों से संबंधित बीमारी के लिए जिम्मेदार सूक्ष्मजीव है औऱ इसमें लगातार मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस बढ़ती जा रही है. जब उस पर फेज़ थेरेपी का इस्तेमाल किया गया तो परिणाम आशा के अनुरूप मिले. इसके तहत क्रोनिक लंग डिजीज में फेज़ के नासिका द्वार से शरीर में प्रवेश करवाया गया और उससे बीमारी का असर खत्म होते देखा गया.


क्यों है बैक्टिरियोफेज ब्रह्मांड में सबसे ताकतवर?
बैक्टिरियोफेज यानि फेज या निन्जा वायरस एक ऐसा वायरस होता है जो ना तो जीवित होता है ना और ना ही मरा हुआ रहता है. हालांकि इसके आकृति को देखकर ऐसा लगता है जैसे इसे बहुत सोच समझकर किसी पेंटर ने बनाया है. इस सूक्ष्मजीव की संख्या को आप इस तरह से भी समझ सकते हैं कि इस धऱती पर जितने भी जीव पाए जाते हैं, फेज़ उन सभी को मिलाकर जो संख्या है उनसे भी ज्यादा है क्योंकि ये एककोशीय बैक्टीरिया में भी हज़ारों की संख्या में पाया जा सकता है. इस सूक्ष्मजीव की खास बात ये होती है कि ये बैक्टीरिया का जानी दुश्मन होता है. ये भी किसी दूसरे वायरस की ही तरह अपने होस्ट के शरीर के भरोसे ही जीवित रह पाता है. बैक्टीरिया एक तरह से इसका शिकार होता है जब ये फैज बैक्टीरिया के शरीर में घुसता है तो उसके साथ ही ये अपनी पूंछ को धंसाकर अपनी सारी जेनेटिक इंफोरमेशन बैक्टीरिया के अंदर डाल कर उस पर कब्जा जमा लेता है. कुल मिलाकर ये उसके शरीर का पूरी तरह अपना बना लेता है औऱ एक वक्त ऐसा आता है जब बैक्टिरिया दिखने में तो बैक्टिरिया रह जाता है लेकिन वो पूरी तरह से वायरस के कब्ज़े में आ जाता है. औऱ जब बैक्टिरिया का शरीर पूरी तरह से वायरस से भर जाता है. तो ये बैक्टिरिया के शरीर के अंदर एंडोलायसिन एंजाइम बनाना शुरू कर देते है जिससे बैक्टिरिया के शरीर पर दबाव पड़ता है औऱ वो फट जाता है.


जिस तरह से धीरे-धीरे बैक्टिरिया खुद को विकसित करते जा रहे हैं ओऱ एंटीबायोटिक भी उनके आगे हार मानने लगी है ऐसे में बैक्टिरियो फेज़ उनकी मौत का कारण बन सकता है. बीते दिनों वैज्ञानिकों ने यमुना के पानी में सुपरबग के होने की पुष्टि की थी. ये वही सुपरबग है जिसके बारे में कहा जाता है कि ये इतना भयानक हो सकता है कि ये पूरी मानवजाति को ही नही समस्त जीवित प्राणियों को खतरे में डाल सकता है. उन पर भी बैक्टिरियोफेज़ कारगर साबित हो सकता है.


ICMR को किस बात का इंतज़ार है?
कोरोना के फैलते के बाद से ही पूरी दुनिया उसकी वैक्सीन बनाने या इलाज खोजने में जुटी हुई है. यहां तक की भारतीय आयुर्विज्ञान अऩुसंधान केंद्र वर्तमान में 63 अलग अलग तरह की शोध करने में लगा हुआ है, जिसमें गिलोय, च्यवनप्राश, अश्वगंधा, तुलसी जैसी आयुर्वेदिक औषधियों सहित होम्योपैथी की दवाओं मिलाकर 15 शोध शामिल हैं. लेकिन अनुसंधान केंद्र पता नहीं क्यों बैक्टिरियोफेज़ यानि गंगा के गंगत्व पर शोध करने में आनाकानी कर रही है. जबकि विज्ञान हर संभावना को तलाशता है.

जल शक्ति मंत्रालय के लिखे एक पत्र के जवाब में आईसीएमआर में शोध और विकास समीति के अध्यक्ष डॉ. वाय.के.गुप्ता का कहना है कि गंगाजल पर क्लीनिकिल टेस्टिंग के लिए अभी उनके पास पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं है.
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन औऱ जल शक्ति मंत्रालय के पास गंगाजल में पाए जाने वाले बेक्टिरियोफेज यानि निन्जा वायरस की टेस्टिंग को लेकर कई गैर सरकारी संगठनों से पत्र प्राप्त हुए हैं जिन्हें संज्ञान में लेकर उन्होंने आइसीएमआर को एक चिट्ठी लिखी थी. लेकिन अऩुसंधान केंद्र ने इस पर जांच को नकार दिया. जबकि एनएमसीजी (NMCG) ने इस प्रस्ताव को बनाने से पहले नेशनल एन्वायर्नमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट (नीरी) के वैज्ञानिकों से इस पर चर्चा की थी. नीरी के वैज्ञानिक ने गंगाजल पर व्यापक शोध की है जिसके बाद उन्हें ये नतीजे मिले थे कि गंगाजल में पाए जाने वाले वायरस में दूसरे रोगाणुओं से लड़ने की क्षमता मौजूद है,,हालांकि इसमें एंटी वायरल होने को लेकर अभी तक शोध नहीं हुई है लेकिन गंगा जल में इम्यूनिटी बढ़ाने के लक्षण ज़रूर पाए गए थे. तमाम तरह की बातो के बावजूद आईसीएमआर पता नहीं किस वक्त का इंतज़ार कर रही है. अगर संस्थान ये कह रहा है कि उन्हें पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं तो क्या ये सबूत गिलोय, च्यवनप्राश, तुलसी जैसे पदार्थो में मिले हैं. यहां बात टकराव की नहीं बचाव की होनी चाहिए. एक कहावत कही जाती है, मरता क्या नहीं करता, अगर आपके पास कोई विकल्प नहीं है तो सारे विकल्प अपनाने में बुराई क्या है.


हो सकता है गंगा ही वो पालनहार हो जो हमें कोरोना जैसे बीमारी से पार लगा सके. औऱ ऐसा नहीं भी होता है तो भी शोध का द्वार तो खुला रखने में इंतज़ार नहीं करना चाहिए.
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