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Opinion: यूपी और बिहार सी होती जा रही है गुजरात में कांग्रेस की हालत

Opinion: यूपी और बिहार सी होती जा रही है गुजरात में कांग्रेस की हालत

पिछले एक साल में आम आदमी पार्टी काफी तेजी से उभरी है. सूरत में कांग्रेस की ज्यादातर जमीन आम आदमी पार्टी खा गई और वहां स्थानीय निकाय में विपक्ष के तौर पर अब कांग्रेस की जगह आम आदमी पार्टी है. कांग्रेस का सबसे बडा वोट बैंक मुस्लिम वोटर था, जिस पर भी असदुद्दीन ओवैसी के गुजरात राजनीति में सक्रिय होने से अब बहुत बडा खतरा खडा हो गया है.

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  • News18Hindi
  • Last Updated :

    • राजीव पाठक

    गुजरात में कांग्रेस के कुछ विधायकों ने हाल में हुई पार्टी मीटिंग में मांग की है कि गुजरात में भी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की स्ट्रेटेजी बनाने के लिए प्रशांत किशोर को बुलाया जाय. पिछले कुछ समय से इसकी चर्चा भी चल रही है, लेकिन ये बता रहा है कि गुजरात कांग्रेस के नेता अब अपने पर भरोसा खो चुके हैं. गुजरात में कांग्रेस की हालत ये हो गई है कि पिछले पांच सालों से अमूमन कांग्रेस से नेता छोड़कर भाजपा में जाते थे, लेकिन अब उन पार्टियों में भी जाने लगे हैं, जिनका गुजरात में अब तक कोई बहुत बडा जनाधार नहीं है, जैसे कि आम आदमी पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ओल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलिमीन (एआइएमआइएम).

    राज्य में 2017 के चुनावों में कई सालों बाद भाजपा 100 से नीचे सीटें जीत पाई थी (राज्य की 182 में से 99 सीटें), इससे ये लगा था कि गुजरात में कांग्रेस पुनः वापसी कर सकती है और वो एक मजबूत विपक्ष बनने वाली है. लेकिन, डेढ़ सालों में ही इतने नेता पार्टी छोडकर जाने लगे औऱ पार्टी बुरी तरह बिखरने लगी की 2019 में हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस 26 में से एक भी सीट जीत नहीं पाई. इसके अलावा, 2015 में स्थानीय निकाय के चुनावों में भी कांग्रेस ने बंपर प्रदर्शन किया था. शहरों में तो भाजपा जीत गई थी, लेकिन ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस ने भारी जीत हासिल की थी. स्थानीय निकाय के चुनावों में भी 2020 में कांग्रेस फिसड्डी साबित हुई.

    कांग्रेस शहरों में तो अपनी स्थिति नहीं ही सुधार पाई, ग्रामीण इलाकों में भी पूरी तरह ध्वस्त हो गई. इसके फलस्वरूप गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष अमित चावडा और गुजरात में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष परेश धानाणीने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था. महत्वपूर्ण है कि 2019 में लोकसभा चुनावों के परिणामों के बाद भी इन्होंने इस्तीफे दिये थे. तब इनके इस्तीफे नामंजूर कर दिए गए थे, लेकिन 2020 में स्थानीय  निकाय के चुनावों में बुरी हार के बाद दोनों के इस्तीफे मंजूर कर लिए गए. लेकिन मजे की बात यह है कि अब तक उनका रिप्लेसमेन्ट नहीं तय किया गया है, इसलिए गुजरात कांग्रेस एक तरह से पिछले कई महीनों से बिना फुल टाइम राज्य अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के ही काम कर रही है.

    कांग्रेस की सिरफुटव्वल का फायदा उठा रही आप और एआइएमआइएम
    इतनी खस्ता हालत के बावजूद पार्टी में आपसी सिरफुटव्वल थम नहीं रही है. नया अध्यक्ष बनने के लिए आपसी प्रतिस्पर्धा बहुत तेज है. इतना कम था कि एक बहुत दुःखद घटना का भी पार्टी को सामना करना पडा. कोरोना की दूसरी लहर में गुजरात कांग्रेस के प्रभारी और महाराष्ट्र कांग्रेस के युवा नेता राजीव साटव का भी देहांत हो गया. तब से गुजरात कांग्रेस का कोई प्रभारी भी नहीं है और गुजरात कांग्रेस को सबसे बडी कमी अहमद पटेल की भी महसूस हो रही है. अहमद पटेल देश में तो कांग्रेस के बडे नेताओं में थे ही, लेकिन गुजरात कांग्रेस के लिए एक तरह से हाईकमान ही थे. कोरोना के चलते करीब 10 महीने पहले उनकी भी मृत्यु हो गई.

    जब तक अहमद पटेल थे, तब तक गुजरात के किसी भी नेता की पहुंच कांग्रेस आलाकमान तक थी. क्योंकि जब भी कोई दिल्ली जाता था, तो अहमद पटेल से बात करने पर उनकी बाद तुरंत पार्टी आलाकमान तक पहुंच जाती थी, जो की अब अगर राहुल गांधी का समय न मिले तो अपनी बात गुजरात कांग्रेस आलाकमान तक नहीं पहुंचा पाती. वहीं, पिछले एक साल में आम आदमी पार्टी काफी तेजी से उभरी है. सूरत में कांग्रेस की ज्यादातर जमीन आम आदमी पार्टी खा गई और वहां स्थानीय निकाय में विपक्ष के तौर पर अब कांग्रेस की जगह आम आदमी पार्टी है. कांग्रेस का सबसे बडा वोट बैंक मुस्लिम वोटर था, जिस पर भी असदुद्दीन ओवैसी के गुजरात राजनीति में सक्रिय होने से अब बहुत बडा खतरा खडा हो गया है.

    इसी सप्ताह ओवैसी जब गुजरात आए, तो गुजरात कांग्रेस के कई पार्षद उनसे मिले, इतना ही नहीं सभी ने खुलकर कहा भी की राजनैतिक लोग मिलते हैं, तो राजनैतिक चर्चा भी होती ही है. इस तरह से इस तबके ने गुजरात कांग्रेस में अपना दबदबा बढाने के लिए ओवैसी से हाथ मिलाने की संभावना भी जताई, ताकि मौजूदा कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव बनाकर नये पद पर दावेदारी निभाना चाहते हैं. ऐसे में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भी निराशा छा रही है. और, इसीलिए अब कांग्रेस नेताओं की नहीं लेकिन प्रशांत किशोर की मांग हो रही है. लेकिन गुजरात कांग्रेस में कितना हाथ आञमाना चाहिए ये प्रशांत किशोर भी सोच रहे होंगे क्योंकि गुजरात में अब भी ब्रान्ड नरेन्द्र मोदी से मुकाबला सबसे बडी चैलेन्ज है.

    क्‍या अपने दम पर गुजरात चुनाव लड़ पाएगी कांग्रेस
    फिलहाल जानकारों को ये लग रहा है कि जिस तरह से अन्य पार्टियां गुजरात में पांव जमा रही हैं, ऐसे में अगर कांग्रेस में गुजरात में आमूल परिवर्तन नहीं हुए, तो यहां भी कांग्रेस की हालत उत्तर प्रदेश और बिहार सी हो जाएगी, जहां कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लडने की स्थिति में नहीं है. उसे किसी भी सूरत में राज्य की बडी राजनैतिक ताकत के साथ जुडना ही पडेगा तभी हि राज्य की राजनीति में कुछ पूछ बनी रहेगी.

    (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

    Tags: Aam aadmi party, Asaduddin owaisi, Assembly elections, Congress, Prashant Kishor

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