लाइव टीवी

अलविदा स्पिट्जर ! महान उपलब्धियों के लिए याद किया जाता रहेगा

News18Hindi
Updated: February 5, 2020, 1:58 PM IST
अलविदा स्पिट्जर ! महान उपलब्धियों के लिए याद किया जाता रहेगा
स्पिट्जर टेलीस्कोप के जरिये की गई खोजों की सूची काफी लंबी है.

16 साल से अधिक समय तक स्पिट्जर ने खगोलविदों को अपनी सीमाओं से आगे बढ़कर अंतरिक्ष में काम करने का मौका दिया. स्पिट्जर ने अपने 140 करोड़ डॉलर के मिशन के तहत 8 लाख आकाशीय लक्ष्यों की छानबीन की.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 5, 2020, 1:58 PM IST
  • Share this:
जब महान वैज्ञानिक गैलिलियो गैलिली ने ऐनकसाज हैंस लिपर्शे द्वारा दूरबीन के आविष्कार के बाद दूरबीन का पुनर्निर्माण किया और पहली बार खगोलीय अवलोकन में उपयोग किया था, उस क्षण के बाद लगभग चार शताब्दियां बीत चुकी हैं. तब से अब तक दूरबीनों ने खगोल विज्ञान में कई आकर्षक और पेचीदा खोजों को जन्म दिया है. इनमें हमारे सूर्य से परे अन्य तारों की परिक्रमा कर रहे ग्रहों की खोज, ब्रह्मांड के विस्तार की गति में तेजी के सबूत, डार्क मैटर और डार्क एनर्जी का अस्तित्व, जो हम पृथ्वीवासियों के लिए खतरा बन सकते हैं एस्टेरॉयड्स और कॉमेट्स वगैरह की खोज शामिल है.

आज बहुत से विशालकाय दूरबीनों का निर्माण पृथ्वी पर किया जा चुका है और कुछ दूरबीन अंतरिक्ष में भी स्थापित किए जा चुकी हैं. खगोलीय पिंड दृश्य प्रकाश के अलावा कई तरह के विद्युत्-चुंबकीय विकिरणों (Electromagnetic Radiation) का भी उत्सर्जन करते हैं. सुदूरस्थ खगोलीय पिंडों से उत्सर्जित होने वाली विद्युत्-चुंबकीय विकिरण का ज़्यादातर हिस्सा पृथ्वी के वायुमंडल को सोख लेता है और इसी वजह से पृथ्वी पर स्थित विशाल प्रकाशीय (ऑप्टिकल) दूरबीनों से उन खगोलीय पिंडों को भलीभांति प्रेक्षित नहीं किया जा सकता है. पृथ्वी के वायुमंडल से होनेवाली इस बाधा के कारण खगोलीय पिंडों के चित्र धुंधलें बनते हैं.

 

स्पिट्जर टेलीस्कोप के जरिये ब्रह्मांड की सबसे पुरानी आकाशगंगाओं की जानकारी मिली और एक नए वलय का खुलासा हुआ.


स्पिट्जर टेलीस्कोप के जरिये ब्रह्मांड की सबसे पुरानी आकाशगंगाओं की जानकारी मिली और एक नए वलय का खुलासा हुआ.


पृथ्वी की वायुमंडलीय बाधा को दूर करने और दूरस्थ खगोलीय पिंडों के सटीक प्रेक्षण के लिए 'अंतरिक्ष दूरबीनों' को निर्मित किया गया है. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने चार महान दूरबीनों या वेधशालाओं (आब्जर्वेटरीज) को अंतरिक्ष में उतारा है, हब्बल स्पेस टेलीस्कोप, कॉप्टन गामा रे आब्जर्वेटरी (सीजीआरओ), चंद्रा एक्स-रे टेलीस्कोप और स्पिट्जर टेलीस्कोप. 30 जनवरी, 2020 को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 'स्पिट्जर टेलीस्कोप मिशन' की समाप्ति की घोषणा की. हालांकि इसका निर्धारित जीवनकाल केवल 2.5 वर्ष था. फिर भी इसने लगभग 16 वर्षों तक अपनी भूमिका दक्षतापूर्वक निभाई. गौरतलब है कि स्पिट्जर स्पेस टेलीस्कोप (Spitzer Space Telescope) 950 किलोग्राम वजनी एक ऐसा खगोलीय टेलीस्कोप है जिसे अंतरिक्ष में एक कृत्रिम उपग्रह के रूप में स्थापित किया गया, इसलिए यह सूर्य के चारों ओर कक्षा में चक्कर लगाता है.

यह ब्रह्माण्ड की विभिन्न वस्तुओं की इन्फ्रारेड प्रकाश में जांच करता है. दरअसल, स्पिट्जर अंतरिक्ष में वह सबकुछ देखने में सक्षम था जिसे ऑप्टिकल टेलिस्कोपों के जरिए नहीं देखा जा सकता है. अंतरिक्ष का ज्‍यादातर हिस्सा गैस और धूल के विशाल बादलों से भरा है, जिसके पार देखने की क्षमता हमारे पास नहीं हैं. मगर यह इन्फ्रारेड प्रकाश गैस और धूल के बादलों की बड़ी से बड़ी दीवारों को भी भेद सकता है. स्पिट्जर अपने विशाल टेलीस्कोप और क्रायोजनिक सिस्टम से ठंडे रखे जाने वाले तीन वैज्ञानिक उपकरणों के साथ अबतक का सबसे बड़ा इन्फ्रारेड टेलीस्कोप है. 

इसने धूलकणों के विशालकाय भंडार के माध्यम से नए तारों और ब्लैक होल्स का भी अध्ययन किया.
इसने धूलकणों के विशालकाय भंडार के माध्यम से नए तारों और ब्लैक होल्स का भी अध्ययन किया.


स्पिट्जर को 25 अगस्त, 2003 को अमेरिका के केप कैनवरेल से डेल्टा रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा गया था. शुरुवात में इसका नाम 'स्पेस इन्फ्रारेड टेलीस्कोप फेसिलिटी' था, लेकिन नासा की परंपरा के अनुसार ऑपरेशन के सफल प्रदर्शन के बाद में बीसवीं सदी के महान खगोलविदों में से एक लिमन स्पिट्जर के सम्मान में 'स्पिट्जर' नाम दिया गया. गौरतलब है कि लिमन स्पिट्जर 1940 के दशक में अंतरिक्ष दूरबीनों की अवधारणा को बढ़ावा देने वाले अग्रणी व्यक्तियों में से एक थे. स्पिट्जर टेलीस्कोप में इन्फ्रारेड ऐरे कैमरा, इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोग्राफ और मल्टीबैंड इमेजिंग फोटोमीटर नामक तीन उपकरणों को रखा गया था. इन्फ्रारेड चूंकि एक तरह का गरम विकिरण होता है, इसलिए इन तीनों उपकरणों को विकिरण से भस्म होने से बचाने और ठंडा रखने के लिए एब्सोल्यूट जीरो यानी शून्य से 273 डिग्री सेल्सियस नीचे तापमान रखने के लिए द्रव हीलियम का इस्तेमाल किया गया था. इसके अलावा सौर विकिरण से बचाव के लिए स्पिट्जर पर सौर कवच भी लगाया गया है.

यों तो स्पिट्जर टेलीस्कोप के जरिये की गई खोजों की सूची काफी लंबी है, मगर उसके जरिये की गई प्रमुख खोजों की चर्चा यहां जरूरी है. इस टेलीस्कोप ने न केवल ब्रह्मांड की सबसे पुरानी आकाशगंगाओं के बारे में हमें जानकारी उपलब्ध कराई है, बल्कि शनि के चारों ओर मौजूद एक करोड़ तीस लाख किलोमीटर के दायरे में एक नए वलय का भी खुलासा किया है. इसने धूलकणों के विशालकाय भंडार के माध्यम से नए तारों और ब्लैक होल्स (Black Hole) का भी अध्ययन किया. स्पिट्जर ने हमारे सौरमंडल से परे अन्य ग्रहों की खोज में सहायता की, जिसमें पृथ्वी के आकार वाले सात ग्रह जो ट्रैपिस्ट-1 नामक तारे के चारों ओर प्रक्रिमा कर रहे थे, उनके बारे में पता लगाना भी शामिल है. इसके अलावा इसने क्षुद्रग्रहों और ग्रहों के टुकड़ों, बेबी ब्लैक होल्स, तारों की नर्सरियों यानी नेब्युला (जहां नए तारों का निर्माण होता होता) की खोज, अंतरिक्ष में 60 कार्बन परमाणुओं से बनी त्रि-आयामी और गोलाकार संरचनाओं यानी बकीबॉल्स की खोज, आकाशगंगाओं के विशाल समूहों की खोज, हमारी आकाशगंगा मिल्की-वे का सबसे विस्तृत मानचित्रण आदि स्पिट्जर टेलीस्कोप की महान उपलब्धियों में शामिल है.

 

डीप स्पेस नेटवर्क के जरिये प्राप्त स्पिट्जर के सभी आंकड़ों का विश्लेषण नासा की ओर से किया जा रहा है.
डीप स्पेस नेटवर्क के जरिये प्राप्त स्पिट्जर के सभी आंकड़ों का विश्लेषण नासा की ओर से किया जा रहा है.


स्पिट्जर को ठंडा रखने के लिए द्रव हीलियम बेहद जरूरी था, लेकिन 15 मई 2009 को इसकी द्रव हीलियम की सप्लाई खत्म हो गई. वर्तमान में इसके ज्‍यादातर उपकरण खराब हो चुके हैं, बावजूद इसके दो कैमरे अभी भी काम कर रहें हैं और स्पिट्जर सूर्य की परिक्रमा कर रहा है. नासा ने जब स्पिट्जर मिशन की हालिया समीक्षा की और पाया इसके कैमरे अभी भी काम कर रहे हैं, मगर इस टेलीस्कोप को अब संचालन के योग्य नहीं पाया, तो इसे रिटायर करने का फैसला लिया. नासा डीप स्पेस नेटवर्क के जरिये प्राप्त स्पिट्जर के सभी आंकड़ों का विश्लेषण नासा की ओर से किया जा रहा है.

 

स्पिट्जर की जगह लेने को तैयार है लंबे समय से प्रतीक्षित इसका उत्तराधिकारी- 'जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप'
स्पिट्जर की जगह लेने को तैयार है लंबे समय से प्रतीक्षित इसका उत्तराधिकारी- 'जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप'


नासा में खगोल भौतिकी विभाग के निदेशक पॉल हर्ट्ज का कहना है कि 'अच्छा होगा अगर हमारे सभी टेलीस्कोप हमेशा के लिए संचालित होने में सक्षम होते, लेकिन यह संभव नहीं है. 16 साल से अधिक समय तक स्पिट्जर ने खगोलविदों को अपनी सीमाओं से आगे बढ़कर अंतरिक्ष में काम करने का मौका दिया.' कुल मिलाकर स्पिट्जर ने अपने 140 करोड़ डॉलर के मिशन के तहत 8 लाख आकाशीय लक्ष्यों की छानबीन की. बहरहाल ब्रह्मांड की गहराइयों में झांकने के लिए और खोजों के इस सिलसिले को जारी रखने के लिए स्पिट्जर की जगह लेने को तैयार है लंबे समय से प्रतीक्षित इसका उत्तराधिकारी बेहद शक्तिशाली- 'जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप' (James Webb Space Telescope). हालांकि जेम्स वेब और स्पिट्जर की कार्यप्रणाली में जमीन-आसमान का अंतर होगा. मगर जेम्स वेब भी स्पिट्जर की तरह इन्फ्रारेड की खिड़की का इस्तेमाल करके ब्रह्मांड के अध्ययन में सक्षम होगा. अलविदा स्पिट्जर!

(लेखक : साइंस ब्लॉगर और विज्ञान संचारक हैं. ब्रह्मांड विज्ञान, विज्ञान के इतिहास और विज्ञान की सामाजिक भूमिका पर लिखने में रुचि है. पांच वर्षों से हिंदी विज्ञान लेखन में सक्रिय हैं.)

ये भी पढ़ें- डेटा फैक्ट्री में तब्दील होता इंसान!

              गरीब देशों में 2040 तक 81 फीसदी बढ़ सकते हैं कैंसर के मामले- WHO

 

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए ब्लॉग से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: February 5, 2020, 1:57 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर