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Opinion: क्षेत्रीय भाषाओं में न्याय पर जोर देकर हिंदी का मान भी बढ़ाना चाहते हैं मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (AP)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (AP)

संविधान लागू होने के बाद से अगर अनुच्छेद 351 पर निष्ठा से अमल किया गया होता, तो न सिर्फ़ हिंदी का विकास हुआ होता, बल्कि ...अधिक पढ़ें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उल्लेखनीय टिप्पणी की है कि भारत में न्याय को नागरिकों के साथ जोड़ा जाना चाहिए, यह काम आम आदमी की भाषा में होना चाहिए. जब तक आम आदमी इंसाफ़ का आधार नहीं समझता, उसके लिए इंसाफ़ और सरकार के आदेश में कोई अंतर नहीं होता. राज्यों के मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्टों के चीफ़ जस्टिस की संयुक्त कॉन्फ़्रेंस में मोदी ने कहा कि अदालतों में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा दिए जाने की ज़रूरत है, ताकि आम आदमी ख़ुद को न्याय से जुड़ा हुआ महसूस कर सके. इससे देश के आम नागरिकों का विश्वास न्याय प्रणाली में बढ़ेगा और वे इससे जुड़ाव महसूस करेंगे.

मोदी ने कहा कि हर बार सामाजिक न्याय के लिए कोर्ट का द्वार खटखटाने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए, कभी-कभी भाषा भी कई मसले हल कर सकती है. मोदी ने कहा कि आज़ादी के सौ साल पूरे होने पर यानी वर्ष 2047 में हम जिस तरह की न्याय प्रणाली देखना चाहते हैं, उस पर विचार करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए. मोदी की बात ध्यान इसलिए खींचती है, क्योंकि न्यायपालिका का सौ फ़ीसदी सम्मान करने वाले भारत जैसे लोकतंत्र में न्यायिक व्यवस्था पर संवेदनशीलता और गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत वास्तव में है.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत की सबसे बड़ी विशेषता है विविधता में एकता. भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज़, पहनावे, खान-पान आदि में तमाम तरह की विभिन्नताएं हैं, लेकिन हर संस्कार मूलत: भारतीय है. राष्ट्र का यह विलक्षण और विराट स्वरूप विश्व में कहीं और देखने को नहीं मिलता. देश के भूगोल की सुरक्षा के मामले में हमारी तीनों सेनाएं पूरी तरह सक्षम हैं और कर्तव्य के लिए सर्वोच्च बलिदान की भावना हर सैनिक में कूट-कूट कर भरी है. लेकिन नागरिकीय कर्तव्यों के पालन के मामले में हम अभी तक अपेक्षाकृत कच्चे हैं.

नागरिकों के मन में राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना के नागरिकीय समुद्र में कभी-कभी ज्वार आते अवश्य हैं, लेकिन दैनंदिन जीवन में हम कुछ पश्चिमी और योरपीय देशों के नागरिकों के मुक़ाबले अपने कर्तव्यों के प्रति कम ही अडिग दिखाई देते हैं. नागरिकीय कर्तव्यों से तात्पर्य आम नागरिक के कर्तव्य भर से नहीं है, बल्कि एक राजनैतिक पेशेवर, अधिकारी, व्यापारी, शिक्षक, डॉक्टर, जज, चपरासी इत्यादि सभी लोगों के कर्तव्यों से है, क्योंकि कोई काम कुछ भी कर रहा हो, अंतत: वह भारत का नागरिक तो है ही. नागरिकीय कर्तव्यों के उलट भ्रष्ट आचरण के मकड़जाल से न निकल पाने के बहुत से दुष्परिणाम हमें, समाज और देश को झेलने पड़े हैं, पड़ रहे हैं और झेलने पड़ते रहेंगे. ऐसा ही एक दुष्परिणाम है कि आज़ादी के 75 साल बाद भी भारत में हिंदी को वह सम्मान हासिल नहीं हो सका है, जिसकी वह हक़दार है. हिंदी के साथ ही तमाम स्थानीय भाषाएं भी उपेक्षा की धूल से अटी पड़ी हैं.

ऐसा तब है, जब हम सरकारी तौर पर साल में बाक़ायदा हिंदी दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा तक मनाते हैं. विश्व हिंदी सम्मेलन की रस्म भी बाक़ायदा अदा की जाती है. ऐसा तब है, जब विदेश में हिंदी का मान बढ़ रहा है. कुछ राज्य सरकारों ने स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने का काम किया है, लेकिन देश भर में जितनी सक्रियता इस तरफ़ दिखनी चाहिए, नहीं है. झारखंड में एनडीए की रघुवर दास की सरकार ने क्षेत्रीय रेलवे स्टेशनों पर संथाली भाषा में अनाउंसमेंट समेत कई अनूठे क़दम उठाए थे. कई और राज्य सरकारों ने भी क्षेत्रीय भाषाओं के विकास के लिए इक्का-दुक्का क़दम उठाए होंगे. लेकिन अंग्रेज़ी दिल-दिमाग़ वाले इस दौर में हिंदी और क्षेत्रीय/स्थानीय भाषाओं की प्राण प्रतिष्ठा के लिए जिस आंदोलन की ज़रूरत है, उसकी नींव की खुदाई तक अभी नहीं हो सकी है.

प्रधानमंत्री मोदी के क्षेत्रीय भाषाओं में न्याय की ज़रूरत पर बल देने के बाद देश के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना ने स्पष्ट कहा कि भारत में हाई कोर्टों की कार्यवाही स्थानीय भाषाओं में हो पाना फिलहाल संभव नहीं है. अगर भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टीफ़िशियल इंटेलीजेंस) की तकनीक का भविष्य में इतना विकास हो गया कि वह स्थानीय भाषाओं को समझ कर जजों को उसका मर्म समझा पाए, तो कोर्ट में स्थानीय भाषाएं लागू हो सकती हैं. हम यह भी समझ लें कि न्यायमूर्ति रमना का वक्तव्य हाई कोर्टों और ज़ाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट के सिलसिले में है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब आम आदमी की भाषा में उसे इंसाफ़ मिलने की ज़रूरत बता रहे हैं, तब ज़ाहिर है कि वे अधीनस्थ अदालतों की बात कर रहे हैं. मोदी ने वर्ष 2047 की बात की है, जो 25 वर्ष बाद आएगा. देश की तमाम अधीनस्थ अदालतें संबंधित हाई कोर्टों के अधीन होती हैं. अधीनस्थ अदालतों की प्रशासनिक देख-रेख हाई कोर्ट ही करती हैं, सुप्रीम कोर्ट नहीं. ऐसे में अगर सभी हाई कोर्ट निचली अदालतों में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने की नीति अपना लें और उस पर सतर्कता से नज़र भी रखें, तो 25 वर्ष बाद इसके अच्छे नतीजे सामने आ सकते हैं. राज्यों की हायर ज्यूडिश्यरी सर्विस की परीक्षाओं में भी स्थानीय भाषाओं के ज्ञान को वरीयता देकर माहौल बनाया जा सकता है. लेकिन इसके लिए क़ानून की पढ़ाई क्षेत्रीय/स्थानीय भाषाओं में कराने पर ध्यान देना होगा और यह काम हाई कोर्ट नहीं, केंद्र और राज्य सरकारों को ही करना होगा.

देश की आज़ादी के समय भाषा के प्रश्न पर जितनी संवेदनशीलता और गंभीरता संविधान सभा ने दिखाई, उतनी लोकतंत्र के 75 साल का होने पर दिखाई नहीं देती. संविधान सभा में हिंदी, अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रश्न पर जो बहस हुई, उसका मसौदा 278 पृष्ठों में समेटा गया है. महत्वपूर्ण और बहुआयामी बहस के बाद आयंगर-मुंशी फ़ॉर्मूले के तहत उस समय भाषा का सवाल तात्कालिक तौर पर हल किया गया. तय किया गया कि 15 साल तक अंग्रेज़ी को ही आधिकारिक भाषा माना जाए और हिंदी के अंकों के लिए तय अंतर्राष्ट्रीय अंकों का ही प्रयोग किया जाए और उसके बाद तय संसदीय प्रक्रिया के तहत हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने (अथवा अंग्रेज़ी को ही जारी रखने) का निर्णय किया जाए.

लेकिन 1950 में संविधान लागू होने के बाद यानी 1965 में हिंदी का सम्मान बहाल करने के लिए कोई बड़ी संसदीय बहस नहीं हुई. किसी ने व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवाज़ बुलंद करने की ज़हमत नहीं उठाई. तत्कालीन केंद्र सरकार और संसद हिंदी के भविष्य को लेकर कितनी गंभीर थीं कि वर्ष 1965 से पहले ही संसद में अंग्रेज़ी के लिए तय की गई 15 साल की अवधि को अनिश्चित काल के लिए आगे बढ़ाने का प्रस्ताव पेश कर दिया गया. प्रस्ताव पेश करने के लिए लाल बहादुर शास्त्री को चुना गया, ताकि उसका मुखर विरोध न हो पाए. विरोध में कुछ सांसदों ने कार्यवाही का बहिष्कार भी किया, लेकिन शास्त्री जी के लाचार होने की दलील देने के बाद संख्या बल के आधार पर तकनीकी तौर पर एक तरह से अंग्रेज़ी से समर्थन में प्रस्ताव संसद में पारित हो गया. जाने माने विधि विषेशज्ञ एलएम सिंघवी ने एक लेख में लिखा कि “अब सांविधानिक स्थिति यह है कि नाम के वास्ते तो संघ की राजभाषा हिंदी है और सह-भाषा है, जबकि वास्तव में अंग्रेज़ी ही राजभाषा है और हिंदी केवल एक सह-भाषा…. हुआ यह कि राजनीति की भाषा और भाषा की राजनीति ने मिलकर हिंदी की नियति का अपहरण कर लिया.”

अंग्रेज़ी का प्राधिकार अनिश्चित काल के लिए बढ़ाने की तत्कालीन संसदीय व्यवस्था आज के दौर में बड़ी विवशता ही साबित हो रही है. हिंदी को उचित मान अभी तक नहीं मिला है. बल्कि स्थिति तो यह है कि हिंदी बरतने पर अब आपको हीन समझा जाने लगा है. बहुसंख्य हिंदी भाषी स्वयं को भी अंग्रेज़ीदांओं के मुक़ाबले हीन समझते हैं. लोग हर हाल में बच्चों को अंग्रेज़ीदां स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं. ऐसे में अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्याय को क्षेत्रीय भाषाओं से जोड़ने की बात की है, तो यह सीधे तौर पर हिंदी का मान बढ़ाने की भी बात है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, बिहार, झारखंड समेत देश के कई  राज्यों में हिंदी ही सबसे ज़्यादा बरती जाने वाली भाषा है और क़रीब-क़रीब हर राज्य में हिंदी बरतने वाले लोगों की तादाद ठीकठाक है. उत्तर भारत की निचली अदालतों में अगर ज़्यादातर अदालती फ़ैसले हिंदी में यानी उत्तर भारत की क्षेत्रीय भाषा यानी लोगों की भाषा में होंगे, तो यक़ीनन उनका भरोसा न्यायपालिका में और बढ़ेगा.

यह सही है कि आज उत्तर भारत की बहुत सी अदालतें हिंदी में फ़ैसले सुना रही हैं. यह भी सही है कि बाक़ी प्रदेशों में भी क्षेत्रीय भाषाओं में अदालती कामकाज थोड़ा-बहुत होने लगा है. लेकिन नियम-क़ानूनों का उल्लेख अगर किसी मुक़दमे के संबंध में बहस के दौरान ज़रूरी होता है, तो वकील को अंग्रेज़ी पाठ ही प्रस्तुत करना होगा. इसलिए हिंदी में निर्णय सुनाने वाले जजों को अंग्रेज़ी में भी पारंगत होना होता है. इस लिहाज़ से होना तो यह चाहिए कि संविधान, भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी और भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता यानी सीआरपीसी के अधिकृत हिंदी अथवा क्षेत्रीय भाषाओं के पाठ को भी अंग्रेज़ी के बराबर ही मान्यता अनिवार्य रूप से दी जाए.

अधीनस्थ अदालतों में न्यायिक प्रक्रिया यदि हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में ही हो, इसके लिए ज़रूरी है कि जजों को क्षेत्रीय भाषाओं अथवा हिंदी का पर्याप्त ज्ञान हो. क्षेत्रीय भाषा में किसी मुक़दमे की अदालती कार्यवाही करने वाले किसी जज का केस का निर्णय होने से पहले ही तबादला हो जाए और उस कोर्ट में ऐसा जज आए, जिसे क्षेत्रीय भाषा नहीं आती, तो न्याय कैसे होगा? कैसे नया जज तब तक हो चुकी अदालती कार्यवाही को समझेगा? मतलब यह हुआ कि क्षेत्रीय भाषाओं में अधीनस्थ अदालतों के कामकाज के लिए ज़रूरी है कि जजों की तबादला नीति पर भी नए सिरे से हाई कोर्टों को काम करना पड़ेगा. अंग्रेज़ी का वर्चस्व बनाए रखने के पीछे भारत में भाषाई बहुलता की दलील रखी जाती है. हक़ीक़त में ऐसा है नहीं. यह सिर्फ़ गुलामी की मानसिकता का ही प्रतीक है. अंग्रेज़ी की जगह अगर हिंदी को रख दिया जाए, तो उचित ही होगा, क्योंकि हिंदी के विकास को क्षेत्रीय भाषाओं से कोई चुनौती नहीं है. हिंदी को ख़तरा अंग्रेज़ी को श्रेष्ठतर मानने से है.

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 120, 210, 343, 344, 345, 346, 347, 358, 459 और 350 में भाषाई विधान तय किया गया है. अनुच्छेद 351 में स्पष्ट किया गया है कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे, जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो, वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे. लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि संविधान लागू होने के बाद से क्या भारतीय संघ ने यह काम किया है? अगर अनुच्छेद 351 पर निष्ठा से अमल किया गया होता, तो न सिर्फ़ हिंदी का विकास हुआ होता, बल्कि दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं का आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता बढ़ती. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क्षेत्रीय भाषाओं में न्याय के विचार को अनुच्छेद 351 की आत्मा के अनुरूप ही लिया जाना चाहिए.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

Tags: Hindi, Hindi Language, PM Modi, Pm narendra modi, Supreme court of india

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