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अभिजात्य वर्ग की ट्रॉफी की जगह अब आम आदमी के असाधारण पराक्रम की निशानी बन गए हैं पद्म पुरस्कार

Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: January 27, 2020, 2:47 PM IST
अभिजात्य वर्ग की ट्रॉफी की जगह अब आम आदमी के असाधारण पराक्रम की निशानी बन गए हैं पद्म पुरस्कार
पद्म श्री अवॉर्ड से नवाजे गए तीन समाजसेवी.

पद्म पुरस्कारों (Padma Award) की भागीदारी में बदलाव को ऐसे समझें. जब 2014 में पहली बार सार्वजनिक तौर पर आवेदन मंगाए गए तो महज 2200 लोगों ने आवेदन किया. जबकि 2020 के पद्म पुरस्कारों के लिए 46000 नामांकन भरे गए.

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  • Last Updated: January 27, 2020, 2:47 PM IST
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हॉस्पिटल के बाहर लोगों को खाना खिलाने वाले लंगर बाबा (Langar Baba), 2500 से अधिक लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने वाले शरीफ चाचा (Sharif Chacha), गौसेवा को राष्ट्र की सबसे बड़ी सेवा मानने वाले भजन गायक रमजान खान उर्फ मुन्ना मास्टर (Munna Master). देश के अलग-अलग हिस्सों से ताल्लुक रखने वाले इन तीनों लोगों के बारे में देश के ज्यादातर लोग दो दिन पहले तक कम ही जानते थे, लेकिन इन तीनों को इस बार पद्मश्री से सम्मानित किया गया है और इस वजह से पूरे देश में इनकी चर्चा हो रही है.

दरअसल, इस देश में पद्म सम्मान हासिल करने वाले लोगों की प्रोफाइल में पिछले पांच साल में कितना बड़ा बदलाव आया है, इसके जीते-जागते उदाहरण हैं ये नाम. इन लोगों को पद्म सम्मान मिलना इस बात का भी सूचक है कि कई दशकों तक सिर्फ अभिजात्य वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोगों के ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाने वाले पद्म पुरस्कारों के प्रमाणपत्र अब इस देश के छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में रहने वाले लोगों की झोपड़ियों में पाए जा सकते हैं, अगर उन्होंने काम ऐसा किया हो, जिसे लोग मिसाल के तौर पर देख सकें और इससे प्रेरणा ले सकें.

मोदी सरकार के आते ही शुरू हो गए थे बदलाव

पद्म पुरस्कार प्रदान किये जाने में आए इस बड़े बदलाव की कहानी नरेंद्र मोदी ने 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के तुरंत बाद लिखनी शुरू कर दी थी. वर्ष 2014 के मई महीने में देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने वाले मोदी ने कुछ समय के अंदर ही मन में ये ठान लिया था कि देश के दूसरे, तीसरे और चौथे बड़े नागरिक सम्मानों के तौर पर मशहूर पद्मविभूषण, पद्मभूषण और पद्मश्री अब अभिजात्य वर्ग की जागीर नहीं रह जाएंगे, जैसी परिपाटी पिछले छह दशक में विकसित हो गई थी. बल्कि मोदी ने पद्म सम्मानों को देश के आम नागरिक की असाधारण उपलब्धियों को चिन्हित करने का जरिया बनाने का फैसला किया.



मोदी ने इसके लिए कई बड़े बदलाव किए. पहले सिर्फ इस देश में प्रधानमंत्री और कुछ रसूखदार मंत्री ये तय कर लिया करते थे कि इस बार पद्म सम्मानों की रेवड़ी किसे बांटी जाएगी. लेकिन मोदी ने रेवड़ी बांटने के सिस्टम को खत्म कर दिया. मोदी सरकार ने तय किया कि ये पुरस्कार रेवड़ी के तौर पर नहीं, बल्कि पारदर्शी ढंग से बांटे जाएंगे, समाज के तमाम क्षेत्रों में काम करने वाले उन लोगों को सम्मानित करने के लिए, जिन्होने असाधारण काम किये हैं अपनी सीमित क्षमता में.

नामांकन की प्रक्रिया को बनाया गया पारदर्शी

अपने इस इरादे में सफल होने के लिए पीएम मोदी ने पद्म पुरस्कारों के लिए नामांकन की प्रकिया को पूरी तरह पारदर्शी बना दिया. पद्म पुरस्कारों के लिए लोग बिना किसी दुविधा और परेशानी के आवेदन कर सकें, इसके लिए एक विशेष वेबसाइट बनाई गई. लोगों के नामांकन पर पूरी सावधानी के साथ विस्तार से चर्चा हो सके और पूरी ईमानदारी से इसकी स्क्रूटिनी की जा सके, इसके लिए इन पुरस्कारों की निर्णायक समिति में समाज के सभी क्षेत्रों की उन प्रमुख हस्तियों को जगह दी गई, जिन्होंने संबंधित क्षेत्र में बड़ा काम किया है. कैबिनेट सेक्रेटरी की अगुआई में इस समिति ने अपना काम शुरू किया. इस मामले में प्रोटोकॉल को आड़े नहीं आने दिया गया. भले ही समिति की अध्यक्षता कैबिनेट सेक्रेटरी करते रहे, लेकिन इसमें कई प्रमुख शिक्षाविद, साहित्यकार, समाजशास्त्री और सांसद रखे गए, जिनकी छवि निर्विवाद थी और जिन्होंने खुद अपने लिए बड़ा मुकाम पहले से हासिल किया हुआ था. समिति की कई-कई बैठकें की जाती रहीं और इन तमाम बैठकों के बाद अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को पद्म सम्मान दिए जाने का फैसला लिया गया.

खास बात ये रही कि न तो पुरस्कार का चयन करने वाली समिति में पार्टी लाइन के हिसाब से लोग रखे गए और न ही ये सम्मान देते समय इस बात का ध्यान रखा गया कि संबंधित व्यक्ति अपनी या सहयोगी पार्टी का है या फिर विपक्ष का. यही वजह रही कि 2017 में एनसीपी प्रमुख शरद पवार को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया, तो इस साल वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पांच बार नागालैंड के मुख्यमंत्री रहे एससी जमीर को, जो चार बार कांग्रेस की तरफ से राज्यपाल नियुक्त रहे हैं. जाहिर है, न तो शरद पवार मोदी के समर्थक हैं और न ही एससी जमीर, बल्कि पवार तो मोदी के सामने विपक्ष के सबसे बड़े चेहरों में से एक, जिन्होंने इसी साल महाराष्ट्र में बीजेपी को सत्ता से दूर रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई.

पद्म पुरस्कारों में बढ़ी है सामान्य लोगों की भागीदारी

पद्म पुरस्कारों को नवाजे जाने में सामान्य लोगों की भागीदारी किस कदर बढ़ी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब 2014 में पहली बार सार्वजनिक तौर पर इनके लिए आवेदन मंगाए गए थे, तो महज 2200 लोगों ने आवेदन किया था, जबकि 2020 के पद्म पुरस्कारों के लिए सितंबर 2019 की तय समय सीमा में ही 46000 नामांकन भरे गए यानी महज छह वर्षों के अंदर बीस गुणे का इजाफा.

लोगों की इस बढ़ी भागीदारी का नतीजा ही है कि जो पद्म पुरस्कार पहले दिल्ली और मुंबई के अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित हुआ करते थे, आज की तारीख में ये सम्मान झारखंड के किसी छोटे से गांव में रह कर पेड़ों को बचाने की मुहिम चलाने के कारण लेडी टार्जन के तौर पर मशहूर जमुना टुडू को भी मिल जाता है, तो गुजरात के बनासकांठा जिले के गांव में रहने वाले गेनाभाई पटेल को भी, जिन्होंने आधुनिक ढंग से जैविक खेती करके देश के तमाम किसानों को भविष्य का रास्ता दिखाया है. 2015 से ही पद्म पुरस्कारों से सम्मानित लोगों की सूची देखने के बाद ये साफ हो जाता है कि भारत के ये सबसे प्रमुख नागरिक सम्मान अब वीआईपी कल्चर का हिस्सा नहीं रह गए हैं, बल्कि खामोशी से अपना काम करने वाले समाज के उन नायकों और नायिकाओं को सम्मानित करने का जरिया, जो कभी अपनी उपलब्धियों का ढोल पीटने या फिर उसके बदले कुछ पाने की आशा नहीं रखते.

एक समय था, जब पद्म पुरस्कार किसी व्यक्ति की सियासी पहुंच और सत्ता के करीब होने की निशानी हुआ करते थे, लेकिन आज ज्यादातर पुरस्कृत लोग ऐसे हैं, जो सम्मान पाने के पहले राष्ट्रपति भवन तो दूर, कभी दिल्ली आए तक नहीं हैं. सीएए के विरोध के इस दौर में जब नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को मुस्लिम विरोधी ठहराने में विपक्ष ने होड़ लगाई है, ये याद रखना मुनासिब होगा कि मोदी सरकार ने 2015 से ही लगातार ऐसे मुस्लिमों को इन पुरस्कारों से नवाजा है, जिन्होंने समाज जीवन में खासा योगदान दिया है अपने सीमित साधनों के साथ. चाहे वो नाम भोपाल गैस पीड़ितों के हक के लिए लड़ने और महिलाओं को आत्म निर्भर बनाने वाले अब्दुल जब्बार का हो, जिन्हें मरणोपरांत इसी साल पद्मश्री से सम्मानित किया गया है या फिर जम्मू-कश्मीर के पूर्व उप मुख्यमंत्री और पीडीपी नेता मुजफ्फर हुसैन बेग को पद्मभूषण देना हो, उनकी धार्मिक पृष्ठभूमि आड़े नहीं आई.


यही नहीं, समाज के पिछड़े, दलित और आदिवासी तबकों से आने वाले लोगों को ये सम्मान बड़े पैमाने पर तो मिल ही रहा है, खेल, संस्कृति, कृषि, लोक कला, चिकित्सा और नारी सशक्तिकरण के लिए काम करने वाले लोगों को चिन्हित कर उन्हें भी सम्मानित किया जा रहा है. इन पुरस्कारों का शहरी स्वरूप भी खत्म हो रहा है, बड़ी तादाद उन लोगों की है, जो छोटे कस्बों या गांवों से आते हैं. जाहिर है, ये तमाम तथ्य पद्म पुरस्कारों की पसंदगी में आए उस बड़े बदलाव की कहानी कहते हैं, जो पिछले छह साल में हुए हैं. शायद इन पुरस्कारों की सार्थकता भी यही है, असली हीरो की पहचान कर उन्हें सम्मानित करना, न कि अपने खास लोगों को मलाई के तौर पर इन्हें बांटने की पुरानी परंपरा को चालू रखना.

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First published: January 27, 2020, 2:47 PM IST
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स्रोत: स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार
अपडेटेड: April 09 (05:00 PM)
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स्रोत: जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, U.S. (www.jhu.edu)
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