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इस कैलाश सत्यार्थी को कितना जानते हैं आप....

इस कैलाश सत्यार्थी को कितना जानते हैं आप....

सुबह मंत्रोच्चार कर रहे कैलाश सत्यार्थी शाम को इस्लामिक सम्मेलन को कैसे संबोधित करेंगे. उसके लिए टोपी या साफा जैसे कुछ खास कपड़े पहनेंगे? कोरोना के कारण यह कार्यक्रम इस साल ऑनलाइन हो रहा है. सत्यार्थी ने लैपटॉप चला लिया है लेकिन कपड़े तो सुबह वाले ही हैं.

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    राजन प्रकाश

    सर्दियों की एक अलसाई सुबह. हम कैलाश सत्यार्थी के नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित होने के सात साल पूरा होने की पूर्व संध्या पर, जयपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर विराटनगर बाल आश्रम पहुंचे हैं. बाल आश्रम सत्यार्थी के सुरक्षित खुशहाल जीवन के उस सपने का एक मूर्त रूप है जो वे बच्चों के लिए देखते हैं. चार एकड़ में फैले बाल आश्रम में बाल श्रम से छुड़ाए गए बच्चों को आजादी का आनंद लेते देखना, सुखद अनुभव है. यह आश्रम सत्यार्थी की पत्नी सुमेधा कैलाश की देखरेख में चलता है.

    सुबह के आठ बजे हैं. आश्रम के अंदर एक अलग चहल-पहल दिख रही है. हवन कुंड सजा है. कुछ बच्चे फूल लेकर आए हैं. एक बड़ा सा केक भी आ गया है. हमें बताया गया कि आश्रम के तीन बच्चों के जन्मदिन के अवसर पर विशेष हवन का आयोजन किया जाएगा. वैसे आश्रम में हवन प्रतिदिन होता है, लेकिन बच्चे अपने जन्मदिन के उपलक्ष्य में विशेष हवन पूजा का अनुरोध करते हैं तो उनके नाम के संकल्प के साथ ऐसा किया जाता है. तीन बच्चों में से एक बच्चा मूक-बधिर है.

    किसी ने एक बड़ी तख्ती लाकर रखी गई, जिसपर शुभकामना संदेश के साथ उन बच्चों के नाम लिखे हैं, जिनका जन्मदिन है. मैंने आश्रम के प्रबंधक से पूछ लिया कि क्या हवन कराने वाले पुरोहित का इंतजार हो रहा है?

    वे बताते हैं कि हवन के लिए भाई साहब और माताजी का इंतजार हो रहा है. भाई साहब अभी गौशाला में हैं. आश्रम के बच्चे सत्यार्थी को भाईसाहब और उनकी पत्नी को माता जी कहते हैं.

    तभी भाई साहब और माताजी आ पहुंचे हैं. बच्चों ने उन्हें घेर लिया है. अभिवादन के बाद हमें भी हवन में शामिल होने का निमंत्रण मिला है. आमतौर पर इतनी तैयारियों के साथ बिना किसी वैदिक ब्राह्मण के हवन आदि होते मैंने नहीं देखा है. हालांकि मैंने सत्यार्थी का नोबेल वाला भाषण सुना है, जिसमें उन्होंने भाषण की शुरुआत और समापन दोनों ही संस्कृत में सूक्तों के पाठ से किया था, लेकिन वह तो भाषण था.

    सत्यार्थी किसी खांटी पुरोहित की तरह मंत्रोच्चार कर रहे हैं. आहुतियां डाली जा रही हैं. सत्यार्थी दंपति को कोई देख ले तो इन्हें वेदपाठी पुरोहित ही कहे. कॉलेज के दिनों में सत्यार्थी विदिशा के दलितों के घरों में यज्ञ का आयोजन किया करते थे. वे उन दिनों को याद करते हैं, ‘जिस घर में भी यज्ञ होता था, उस परिवार के भावों को व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. आप इसे कर्मकांड समझने की भूल न करें, यह तो समाज को एकसूत्र में बांधे रखने का उद्यम था.’ ब्राह्मण परिवार में जन्मे सत्यार्थी ने अपने गृहनगर विदिशा के समाज के ठेकेदारों से आजिज आकर अपने नाम से शर्मा निकाल दिया था.

    नोबेल पुरस्‍कार विजेता कैलाश सत्‍यार्थी के आश्रम में ये वही बच्चे हैं जिन्हें कभी नर्क वाले माहौल में सुबह से शाम तक हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी दो रोटियों से पहले मालिकों की मार खानी होती थी.

    हवन के बाद केक काटा गया. केक-समोसे का लुत्फ उठाते बच्चे नाच-गा रहे हैं. संगीत सिखाने वाले मास्टर जी ढोल बजा रहे हैं. सुमेधा भी उन बच्चों के साथ नाच रही हैं. अभी वे बच्चों की माता नहीं , उनके जैसी बच्ची बन गई हैं, जो डांस के किसी स्टेप में बच्चों से एक कदम भी पीछे नहीं रहना चाहतीं. कौन कह सकता है कि ये वही बच्चे हैं, जिन्हें कभी नर्क वाले माहौल में सुबह से शाम तक हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी दो रोटियों से पहले मालिकों की मार खानी होती थी.

    ईश्वर को लेकर कैलाश सत्यार्थी के क्या विचार हैं? वे बताते हैं, ‘मैं बचपन में रोज कई घंटे पूजा करता था. साधुओं-औघड़ों की खूब सेवा करता था, ताकि कोई प्रसन्न होकर मुझे ईश्वर के दर्शन करा दे. बाद में समझ आया कि ईश्वर तो हम सबके भीतर है ही. सबसे निश्छल, निष्पाप तो बच्चे होते हैं. इसलिए बच्चों को प्रेम करके मैं ईश्वर की आराधना में जुट गया.’

    हमें दोपहर तक विदा होना था, लेकिन सत्यार्थी की आज की व्यस्तताओं को जानकर विचार बदलना पड़ा. वे दोपहर को दूर-दराज की बंजारा बस्तियों में जाएंगे, शाम को किसी अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक कार्यक्रम को भी संबोधित करेंगे. गोसेवा और हवन से लेकर इस्लामिक सम्मेलन का संबोधन तक, किसी पत्रकार के लिए ऐसे मौके छोड़ना समझदारी न होती.

    दोपहर की खिली धूप में बाल आश्रम से 60 किलोमीटर दूर फूस की झोपड़ियों के बीच एक पक्का कमरा और उस पर लगे सोलर पैनल दूर से ही चमक रहे हैं. यह बनसूर का बंजारा शिक्षा केंद्र है. आप इसे घूमंतु बंजारा समुदाय के लिए प्री-नर्सरी या नर्सरी स्कूल कह सकते हैं. सुमेधाजी ने 12 साल पहले थाणा गाजी में एक बंजारा स्कूल शुरू किया था.

    वे बताती हैं, ‘बंजारे तो घूमते रहते हैं. इनके पास न राशनकार्ड हैं न वोटरकार्ड न बच्चों का जन्म प्रमाणपत्र. इसलिए किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं ले पाते. बंजारा स्कूलों के माध्यम से हम बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिले के काबिल बनाते हैं. उसके उनकी पढ़ाई चलती रहती है.’ आज 14 बंजारा स्कूल चल रहे हैं. इस स्कूल से अक्षर ज्ञान लेकर निकली तारा बंजारा बारहवीं करके पुलिस सेवा की तैयारी कर रही है.

    कैलाशजी को किसी ने बताया कि कुछ लोग शराब पीकर पत्नी के साथ मारपीट करने लगे हैं. उन्हें समझाने को वे एक कहानी सुना रहे हैं. मेरे पास बचपन में एक साइकिल थी. एक दिन उसका एक पहिया टूट गया. मैंने सोचा एक ही तो टूटा है. उसी को चलाकर स्कूल चलते हैं. पर वह चला ही नहीं. सामने बैठे पुरुषों की ओर इशारा करके पूछते हैं कि बताओ क्यों नहीं चली मेरी साइकिल, जबकि एक पहिया तो ठीक था.

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    मैंने ईश्वर, अल्लाह, यीशू सबको बच्चों के माध्यम से देखने की कोशिश की है : कैलाश सत्‍यार्थी

    भीड़ से आवाज आती है- ‘भाईसाहबजी एक पहिए से कभी किसी की साइकल चली है?’ कहने वाला हंस पड़ता है, साथ में सब हंसने लगे हैं. सत्यार्थी कहते हैं कि घरवाली वही दूसरा पहिया है, जिसके बिना जिंदगी की साइकल नहीं चल सकती. उसे मारो-पिटोगे तो पूरा परिवार खराब हो जाएगा.

    बात सही जगह तक पहुंच गई है. एक व्यक्ति उठकर आता है और पैर छूकर माफी मांगता है. सत्यार्थी अपने गले में पड़ी माला उसे पहना देते हैं. तालियां बज रही हैं. पछतावे से भरा वह व्यक्ति भावुक हो गया है. अपने बेटे के सिर पर हाथ रखकर कसम खाता है कि धीरे-धीरे शराब छोड़ देगा, लेकिन पत्नी के साथ मारपीट आज से ही बंद. तालियां बज रही हैं. मारे खुशी के उसकी पत्नी खड़े होकर सत्यार्थी दंपति को प्रणाम कर रही है.

    शाम हो गई है. मेरी उत्सुकता बढ़ रही है कि सुबह मंत्रोच्चार कर रहे कैलाश सत्यार्थी शाम को इस्लामिक सम्मेलन को कैसे संबोधित करेंगे. उसके लिए टोपी या साफा जैसे कुछ खास कपड़े पहनेंगे? कोरोना के कारण यह कार्यक्रम इस साल ऑनलाइन हो रहा है. सत्यार्थी ने लैपटॉप चला लिया है लेकिन कपड़े तो सुबह वाले ही हैं.

    मैं उनसे अपनी उत्सुकता छुपा नहीं पाया. वे ठठाकर हंसते हैं और कहते हैं, ‘मैंने किसी धर्म को कभी उसकी किसी खास पहचान से देखने की कोशिश ही नहीं की. मैंने ईश्वर, अल्लाह, यीशू सबको बच्चों के माध्यम से देखने की कोशिश की है.’

    इस ऑनलाइन आयोजन में कई मुस्लिम देशों के राष्ट्राध्यक्ष और कई वैश्विक संगठनों के प्रमुख उपस्थित हैं. उनके संबोधन का लब्बोलुआब यही है कि अगर आपके बच्चे खुश नहीं हैं तो अल्लाह खुश नहीं हो सकते.
    शाम गहराती जा रही है. दूर दिल्ली जाना है. एक दिन में कैलाश सत्यार्थी के व्यक्तित्व के कई अनदेखे, अनछुए पहलुओं को करीब से देखने के बाद हम चल पड़े हैं. मैंने ड्राइवर को बानसूर के स्कूल में बच्चों द्वारा गाए गीत को रिकॉर्ड करने को कहा था. फुरसत में हमने वह गीत प्ले कर दिया है-

    घर-घर अलख जगाएंगे, हम बदलेंगे जमाना, हम बदलेंगे जमाना क्योंकि हम निकल पड़े हैं…

    (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

    Tags: BLOGS, Kailash Satyarthi, Nobel Prize

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