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खेतों में 'वारदात' करतीं टिड्डियां और उनका खतरा...

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Updated: February 13, 2020, 12:04 PM IST
खेतों में 'वारदात' करतीं टिड्डियां और उनका खतरा...
टिड्डियों का पनपना शुरू से ही प्रकृति से जुड़ी घटना ही रही है.

मौसम में बीते दिनों चरम गतिविधियां बढ़ने की वजह से हिंद और अरब महासागर का तापमान पिछले दो सालों में बढ़ा है जो कि टिड्डियों के तेजी से पनपने की एक वजह हो सकता है.

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एक पुल से गाड़ी गुजर रही है, अचानक उसके सामने आसमान में एक काली आकृति बनती है. जो धीरे धीरे एक विशाल आकार ले लेती है और पूरा आसमान ढक लेती है. फिर लोगों को भागते हुए दिखाया जाता है. खेत बरबाद होते हुए दिखते हैं और फिर अखबार में छपी हुई खबरों को दिखाया जाता है जिसमें लिखा होता है कि टिड्डियों के हमले से किसान तबाह हुए. 1981 में आई वारदात फिल्म एक जासूसी फिल्म है. जिसमें मिथुन ने भारतीय जेम्सबांड गनमास्टर जी-9 की भूमिका निभाई है.

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टिड्डियां खेतों पर हमला बोलती हैं
फिल्म की कहानी एक ऐसे वैज्ञानिक पर है जो टिड्डियों को अपने हिसाब से चलाने के लिए तैयार कर लेता है और टिड्डियां उसके हिसाब से खेतों पर हमला बोलती हैं और खेतों को तबाह कर देती हैं. इस तरह से वैज्ञानिक अपने हिसाब से दुनिया में फसलों के दाम भी तय करता है और जो अनाज है उससे भी वो दुनिया में पैदा होने वाले बच्चों को अपंग और अपाहिज बनाना चाहता है. फिल्म में जिस तरह से टिड्डियो के हमले को दिखाया गया है करीब 25 सालों बाद टिड्डियों का ठीक वैसा ही हमला देखा गया.

अक्टूबर 2018 में अरेबियन पेनिनसुला में आए साइक्लोन लुबान ने टिड्डियों के प्रजनन को और उकसा दिया.


जलवायु परिवर्तन
भारत पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों और अफ्रीकी देशों में हुए इस हमले को जलवायु परिवर्तन के साथ जोड़ कर भी देखा जा रहा है. वहीं जलवायु विशेषज्ञों ने इस हमले के प्रकोप के और बढ़ने की आशंका जाहिर की है. विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम में बीते दिनों चरम गतिविधियां बढ़ने की वजह से हिंद और अरब महासागर का तापमान पिछले दो सालों में बढ़ा है जो कि टिड्डियों के तेजी से पनपने की एक वजह हो सकता है.टिड्डियों का पनपना शुरू
एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर कार्बन उत्सर्जन में वैश्विक स्तर पर कमी नहीं आई तो आने वाले वक्त में इस तरह के खतरे और बढ़ेंगे. वैसे भी टिड्डियों का पनपना शुरू से ही प्रकृति से जुड़ी घटना ही रही है. हिंद महासागर और अरब महासागर में चक्रवर्तीय गतिविधियों के कारण बारिश के इजाफे से, तटीय क्षेत्रों में नमी बढ़ने से, महासागरों के तापमान में बढ़ोतरी होना स्वाभाविक है. बीते कुछ सालों से पश्चिमी हिंद महासागर और अरब सागर क्षेत्र में गर्मी से पहले और बाद में चक्रवात की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं.

भारी बारिश होना
इसके पीछे ये दलील भी दी जा रही है कि मानसून के उत्तरार्ध में भारत के पश्चिमी तट (राजस्थान को मिलाकर) पर लंबे समय तक भारी बारिश होना और मानसून के बाद चक्रवात पश्चिम हिंद महासागर के तापमान में बढ़ोतरी की वजह हो सकता है. इसके पहले 1993 में राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, हरियाणा और पंजाब ही नहीं उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से भी इन टिड्डियों के हमले से प्रभावित रहे थे.

हमले की वजह
मई 2018 में रब अल खली मरुस्थल ( जो सउदी अरब, ओमान, यूनाइटेड अरब अमीरात और यमन तक फैला है) में आए तूफान से यहां के कई इलाकों में पानी का जमाव हो गया. ये वो जगह थी जो सउदी अरब, ओमान और यमन तीनों की सीमावर्ती इलाकों में थे. इसकी वजह से रेगिस्तानी टिड्डियों को पनपने का बेहतर मौका मिला. इसके बाद अक्टूबर 2018 में अरेबियन पेनिनसुला में आए साइक्लोन लुबान ने टिड्डियों के प्रजनन को और उकसा दिया.

टिड्डियों का प्रजनन
इसके बाद जनवरी-फरवरी 2019 में लाल सागर के दोनों तटीय इलाकों में यानि अफ्रीका और एशिया वाले इलाके में अच्छी बारिश हुई. इसके बाद अफ्रीका वाले इलाके में टिड्डियों का प्रजनन तेजी से हुआ और जब उन्हें खाने को नहीं मिला तो वो अरेबियन तरफ से आ रही हवाओं की मदद से उड़ कर इधर पहुंच गईं, जहां पहले से ही टिड्डियों के लिए पसंदीदा माहौल बन गया था. टिड्डियों का ये झुंड अरेबियन पेनिनसुला से उड़ते हुए दक्षिण इरान को पार करती हुई अप्रैल-मई-जून में दक्षिण एशिया पहुंचीं.

टिड्डियां नवबंर तक वापस लौट जाती हैं
जून 2019 में भारत वाले थार मरुस्थल में भी अच्छी बारिश हुई जिससे टिड्डियों को एक बार फिर से पनपने का मौका मिल गया. राजस्थान में भले ही बारिश देर से हुई लेकिन भारी हुई, जिसकी वजह से रेगिस्तान में सेवान और सफेद धामन की पैदावार खूब हुई जो टिड्डियों के अंडे देने और बढ़ने के लिए हर लिहाज से बढ़िया था. आमतौर पर टिड्डियां नवबंर तक वापस लौट जाती हैं लेकिन इस बार नवंबर में 9 दिन तक हुई बारिश ने इन बिन बुलाए मेहमानों का और दिल लगा दिया और ये जनवरी खत्म होने तक यहीं पर मौजूद रहे.

बढ़ता तापमान टिड्डियों के प्रजनन के लिए बेहतर
यहां खास बात ये है कि ये कीड़े अपने वातावरण के बदलने के साथ खुद के बर्ताव में भी बदलाव ला रहे हैं और अब ये सर्दियों में भी यहीं डेरा जमाए हुए हैं. कुल मिलाकर भारी बारिश और बढ़ता तापमान टिड्डियों के प्रजनन के लिए बेहतर होते हैं और बीते सालों में ये दोनों ही मौसम विज्ञान की सोच से बिल्कुल अलग हुए हैं.

पहले कब हुए हमले और क्या था नुकसान
72 साल के राजस्थान के निवासी महावीर प्रसाद शर्मा अपने बचपन के अनुभव को साझा करते हुए बताते हैं कि किस तरह जब वो छोटे थे तो इसी तरह टिड्डियों का झुंड आता था और पूरे गांव वाले हाथ में थाली, चमचा या कोई भी ऐसी चीज़ जो शोर करती हो उसे लेकर खेतो में खड़े होकर बजाने लगते थे. जहां भी नजर चूंकी वहां पर ये टिड्डी पल भर में पूरा खेत साफ कर देती थी और यही नहीं उस जगह पर ये अंडे भी दे देती थी.

10 करोड़ का नुकसान
दरअसल महावीर जिस दौर की बात करते हैं उसी दौरान भारत में टिड्डियों के बचाव के लिए संस्थान टिड्डी चेतावनी संगठन की नींव (1946) रखी गई थी. इस संगठन के मुताबिक 1926 से 1931 के बीच टिड्डियों के आक्रमण से करीब 10 करोड़ का नुकसान हुआ था जो 100 साल का सबसे अधिक था. इसके बाद अगर हम देखें तो 1940-46 और 1949-55 में दो बार हमले हुए और दोनों बार करीब दो-दो करोड़ का नुकसान हुआ था. 1959-62 के दौरान यही नुकसान 50 लाख के करीब रहा और इसके बाद 1978 और 1993 में जो हमला हुआ उसमें नुकसान का आंकलन करीब 75 लाख रुपए किया गया था.

प्रकोप कम से कम तीन साल
ये टिड्डे शुरू से ही सोमालिया जैसे उत्तर-पूर्वी अफ्रीकी देशों से होते हुए यमन, सऊदी अरब और पाकिस्तान होते हुए भारत पहुंचते रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक अगर ये एक बार इलाके में घुस गए तो इनका प्रकोप कम से कम तीन साल जरूर रहता है. 1959 में ऐसे टिड्डों के बड़े दल ने बीकानेर की तरफ से धावा बोला था, जिसने 1961-62 तक टीकमगढ़ (मध्यप्रदेश) में तबाही मचाई. 1967-68, 1991-92 में भी इनके हमले हो चुके हैं.

क्यों माना जा रहा है इस बार का हमला खतरनाक
1993 में जब टिड्डियों ने हमला किया था तो उस दौरान अक्टूबर की ठंड में ये मर गई थीं लेकिन इस बार इन्होंने खुद को ठंड से भी बचाना सीख लिया है बल्कि देखा जाए तो इस बार ठंड के बाद उनका हमला और खतरनाक बन कर उभरा है.

टिड्डियां और उनकी फितरत
एक शोध के मुताबिक टिड्डियों की दुनिया भर में 10 प्रजातियां पाई जाती हैं. इनमें से चार तरह की प्रजातियां भारत में समय-समय पर देखी गई हैं. इनमें सबसे खतरनाक होती है रेगिस्तानी टिड्डी. चिंता की बात यह है कि इस बार जो टिड्डी सक्रिय है वो यही रेगिस्तानी टिड्डी ही है. दरअसल एक टिड्डी 12 से 16 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकती है. जब ये छिटपुट संख्या में होती हैं तो सामान्य रहती हैं लेकिन प्रकृति के अनुकूल वातावरण पाकर इनकी संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो जाती है.

मादा टिड्डी का आकार नर से कुछ बड़ा होता हैं और यह पीछे से भारी होती हैं. तभी जहां नर टिड्डा एक सेकंड में 18 बार पंख फड़फड़ाता है, वहीं मादा की रफ्तार 16 बार होती है. इनसे होने वाले नुकसान का अंदाज यूं लगाया जा सकता है कि इन टिड्डियों का एक छोटा दल एक दिन में 10 हाथी, 25 ऊंट या फिर 2500 लोगों के बराबर खाना खा सकता है.

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भारी बारिश और बढ़ता तापमान टिड्डियों के प्रजनन के लिए बेहतर होते हैं.


इतिहास में टिड्डी
हॉलीवुड फिल्म ममी-श्रृंखला में टिड्डियों के झुंड और उसके हमले को बहुत जोर देकर दिखाया गया है जो ये बताता है कि टिड्डियों का इतिहास मिस्र के इतिहास से जुड़ा हुआ है इसका उल्लेख हमें 1422 से 1411 ईसा पूर्व के मिस्र के प्राचीन कब्र कक्ष में मिलता है. यही नहीं 2470 से 2220 ईसा पूर्व के दौरान कब्रों पर टिड्डियों की नक्काशी भी देखने को मिलती है. 311 ईस्वी में चीन के अंदर एक महामारी फैली थी जिससे जो लोग मारे गए थे उसमें भी टिड्डी को दोषी माना गया है.

दरअसल टिड्डियों का हमला वैसे तो कोई नई बात नहीं है लेकिन यहां ये समझने वाली बात है कि 25 सालों बाद टिड्डी फिर आती है और इस बार आती है तो और ज्यादा तैयार होकर आती हैं क्योंकि प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ और पर्यावरण में हो रहे नुकसान ने उन्हें औऱ ताकतवर बना दिया है. इसलिए हमें ये समझना बेहद ज़रूरी है कि वारदात फिल्म में जो टिड्डियां किसी इंसान के कहने पर नाच रही थीं कहीं वो खुद इतनी खतरनाक न हो जाएं की हमें उनके इशारों पर नाचना पड़े.

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First published: February 13, 2020, 12:04 PM IST
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