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ये आंसू अच्छे हैं, जख्म को हमेशा ताजा रखना

आप मुकाबला हारे हो, लेकिन आपने करोड़ों का दिल जीता है. आप देश की असली बेटियां हो. आप मर्दानी हो. टांके लगने के बाद भी श ...अधिक पढ़ें

देशभर में तुम्हारी हार को भी सेलिब्रेट किया जा रहा है. तुम्हारी शान में कसीदें गढ़े जा रहे हैं, लेकिन तुम इन लफ्जों के खेल में कतई ‘सेल्फ गोल’ मत कर जाना. तुम इन आंसुओं को एक पल के लिए भी नहीं भूलना. जो जख्म तुमने अपने शरीर पर झेले हैं, वक्त के थपेड़े उन्हें भर देंगे, लेकिन तुम अपने दिल में इन जख्मों को हमेशा ताजा रखना. क्योंकि, यह याद रखना की तुम हार गए हो. हां, तुम हार गए हो और यही सच है. तुम्हें ओलंपिक में कोई मेडल नहीं मिला है.

दिल जीतना और पोडियम फिनिश का अंतर तुम्हें पता है. इसलिए याद रखना तुम हार गई हो. यह भी याद रखना कि दिल जीतने जैसा कुछ नहीं होता है. बस कहने और सुनने को यह अच्छा लगता है, लेकिन तुम्हारा दिल जानता है कि हार, हार ही होती. यहां हारकर जीतने वाले को ‘बाजीगर’ जैसा कुछ नहीं होता. इसलिए कोई तुम्हें बाजीगर पुकारे या मर्दानी का तमगा दे. कोई हमारे बॉक्सर सतीश को शेर बुलाए, लेकिन तुम याद रखना..!

अब से आगे तुम्हारे चेहरे पर भले ही स्माइल हो, लेकिन सीने में इन आंसुओं की टीस को महसूस करते रहना. यह सब तक करते रहना, जब तक तुम पेरिस में पोडियम फिनिश ना कर लो. क्योंकि, याद रखना तुम हार गए हो.

मिल्‍खा सिंह और पीटी ऊषा को तउम्र अखरती रही यह बात..
मिल्खा सिंह और पीटी उषा तो भारतीय खेलों के रोल मॉडल हैं. हर कोई उनके जैसा दर्जा हासिल करने का ख्वाब देखता है, लेकिन याद रखो की जिंदगी में सबकुछ हासिल करने के बावजूद उन्हें बस ओलंपिक पोडियम फिनिश नहीं करना ताउम्र अखरता रहा. यह हार इसलिए भी याद रखना कि ये दुनिया तुम्हें भुला ना दे.

यकीन ना हो तो, पांच साल पहले चौथे स्थान पर रही दीपा करमकर या 2012 में चौथे स्थान पर रहे शूटर जॉयदीप से ही पूछ लो. कितने लोगों को उनका नाम या खेल याद है. ज्यादा बड़ी बात क्यों करना. इस ओलंपिक में भारत को पहला पदक दिलाने वाली मीरबाई चानू की रोल मॉडल कुंजुरानी का ही किस्सा ही सबकुछ बयां करने के लिए काफी है. अब कितने लोगों को याद हैं कि कुंजुरानी ने 2004 ओलंपिक में चौथे स्थान पर फिनिश किया था और वह बेहद मामूली अंतर से मेडल हासिल करने से चूक गई थीं.

याद रखना कि आज भले ही तुम्हारी शान में कसीदें गढ़े जा रहे हो, लेकिन तुम्हें ‘दिल जीतने वाले’ इन संदेशों के सैलाब में बहकर जाना नहीं हैं. तुम्हें अगले तीन साल (पेरिस 2024) इन आंसुओं से ही अपने सपनों को सींचना है. यदि आंसू भूल गई तो तुम्हारा सपना भी मुरझा जाएगा.

 मैं यह नहीं भूला था कि ‘मैं हार गया हूं’
तुम्हें लग रहा होगा कि हार के बाद मैं भी तो बस ‘लफ्जों के जरिए’ लेक्चर दे रहा हूं. तो ऐसा नहीं है. मैं कोई बातें नहीं बना रहा हूं. यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूं. क्योंकि मैं यह नहीं भूला था कि ‘मैं हार गया हूं’.

बात करीब 20 साल पुरानी होगी. दुनिया में नए साल का जश्न मनाया जा रहा था. नया साल नए सपने और नयी उमंग लेकर आया था, लेकिन, एक जनवरी का वह दिन मेरे खेल करियर के लिए ‘Black Day’ था. उस दिन भारतीय खो-खो टीम का ऐलान हुआ था और उस टीम में मेरा नाम नहीं था… मेरा नाम नहीं था. हां, मेरा नाम नहीं था. मुझे इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है. मुझे मेरे साथियों ने बहुत समझाया, लेकिन मैंने दो दिनों के लिए खुद को दुनिया से अलग कर लिया.

मैं बंद कमरे में खूब रोया. मुझे लग रहा था कि दुनिया अब मेरे लिए खत्म हो गई है. मैं हार गया. बरसों की मेहनत एक घोषणा के साथ खत्म हो गईं. लेकिन जब मैंने सब बातों को रिकॉल किया, तो मुझे लगा कि गलती तो मेरी ही थी. मैंने ही अच्छा परफॉर्म नहीं किया. मैं आखिरी मोमेंट पर चूक गया. फिर क्या, मैं अपने आंसुओं को भूला नहीं.

अपने दर्द को दुनिया से छिपाकर रखा, लेकिन अंदर ही अंदर उस ‘आग’ को मैंने बुझने नहीं दिया. दुनिया से लड़ने के बजाए खुद से ही लड़ाई शुरू की. सालभर तक सबकुछ भूलाकर, बस एक फोकस रखा. नतीजा एशियन चैंपियनशिप के लिए टीम इंडिया में सिलेक्शन और फिर गोल्ड मेडल.

मेरी ही बात क्यों. बजरंग पुनिया ने पांच साल पहले #Whatsapp स्टेट्स पर टोक्‍यो ओलंपिक का लक्ष्य रखा था. नीरज चोपड़ा ने 2017 से “जब सफलता की ख्वाहिश आपको सोने न दे, जब मेहनत के अलावा और कुछ अच्छा न लगे, जब लगातार काम करने के बाद थकावट न हो, समझ लेना सफलता का नया इतिहास रचने वाला है.” इस ट्वीट को पिन करके रखा है. इसलिए कुछ हासिल करने के लिए कुछ जख्मों को हमेशा हरा रखना जरूरी होता है.

चक दे इंडिया’ से तुलना
हां, जिस ‘चक दे इंडिया’ से आप सभी की तुलना हो रही है तो याद रखिए ‘मीररंजन नेगी’ पर यह किरदार लिखा गया था, उन्हें भी दुनिया ने तभी सलाम किया है, जब उन्होंने जीत हासिल की थी. नहीं तो उन्हें भी भुला दिया गया था. इसलिए याद रखना की तुम हार गए हो. तुम्हें दुनिया जीतनी है, तो इस दर्द और जख्मों को एक पल के लिए भी खुद से दूर मत करना. क्योंकि, तुम हार गई हो. और यह आंसू अच्छें हैं और जख्म ‘हरा.

प्रसून जोशी के शब्दों के साथ

अरे छोड़ दे बीते कल की बोरी
काट दे रस्सी सुतली डोरी, तुझसे पूछेगी ये मट्टी
करके सांस-सांस को भट्टी, अब तू जाग मिल्खा
बस तू, भाग मिल्खा

तेरा तो बिस्तर है मैदान, ओढ़ना धरती तेरी शान
तेरे सरहाने है चट्टान, पहन ले पूरा आसमान
तू पगड़ी बांध, मिल्खा
अब तू, भाग मिल्खा

उतार के फेंक दे सब जंजाल, बीते कल का हर कंकाल
तेरे तलवे हैं, तेरी नाल, तुझे तो करना है हर हाल

दांत से काट ले बिजली तार, चबाले तांबे की झनकार
फूंक दे खुद को ज्वाला-ज्वाला, बिन खुद जले ना होय उजाला.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है. यह लेख एक खिलाड़ी का अनुभव है. उस खिलाड़ी का जिसने दो बार भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया है और जिसे मध्यप्रदेश के सर्वोच्च खेल सम्मान ‘विक्रम अवॉर्ड’ से नवाजा गया है.)

Tags: Olympics, Olympics 2020, Shooting, Sports news, Tokyo 2020, Tokyo Olympics, Tokyo Olympics 2020

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