राजकुमार केसवानी जो पत्रकार, साहित्यकार, कलाप्रेमी ही नहीं, सोशल एक्टिविस्ट भी थे

लोगों के हित के लिए पत्रकारिता करने वाले राजकुमार केसवानी एक बार पत्रकारों के मुद्दे पर विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी से भिड़ गए थे, जिसमें उनका विधानसभा प्रवेश कार्ड रद्द कर दिया गया था.

लोगों के हित के लिए पत्रकारिता करने वाले राजकुमार केसवानी एक बार पत्रकारों के मुद्दे पर विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी से भिड़ गए थे, जिसमें उनका विधानसभा प्रवेश कार्ड रद्द कर दिया गया था.

RIP Rajkumar Keswani: अपनों के लिए उठ खड़े होने और सियासत, सत्ता और सिस्टम को सीधे ललकारने का माद्दा जो राजकुमार केसवानी में था, वह हर किसी में नहीं होता. ऐसा व्यक्तित्व, जिसका विश्वास कभी भी सत्ता प्रतिष्ठान की जी हुजूरी में नहीं रहा, जब तक, जिसके लिए काम किया, अपनी शर्तों पर किया. न कभी झुके न टूटे. मूल्यों की पत्रकारिता कभी नहीं छोड़ी.

  • Share this:

भोपाल. बेखौफ, बेबाक, जिंदादिल, जांबाज, लड़ाकू, खोजी, सौंदर्यबोध से परिपूर्ण, साहित्यकार, कलाप्रेमी जैसे चाहे जितने विशेषण आप वरिष्ट पत्रकार राजकुमार केसवानी के नाम के साथ बेझिझक जोड़ सकते हैं. भाषा, कला, संस्कृति को सहेजने और अपनी लेखनी के बूते सत्ता और सिस्टम को ललकारने वाला यह व्यक्तित्व शुक्रवार दुनिया को अलविदा कह गया. कभी न हारने वाले राजकुमार केसवानी कोरोना महामारी से लड़ते हुए जिंदगी हार बैठे और हम सबको दुखी कर गए. केसवानी वो शख्सियत थे, जिन्होंने पत्रकारिता ही, नहीं फिल्म और कला सहित कई विधाओं में अपनी प्रतिभा का अद्भुत प्रदर्शन किया.

मैं चश्मदीद हूं गुजरी सदी के अंतिम दशक के उत्तरार्ध के किसी वर्ष की उस घटना का, जब राजकुमार केसवानी पत्रकार बिरादरी के ही एक साथी को आरोपित करने वाली घटना के विरोध में मप्र के तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी से भिड़ गए थे और गुस्से में इतना तीखा संवाद हुआ था कि नाराज होकर विधानसभा अध्यक्ष ने पूरे सत्र के दौरान उनका प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया था. विधानसभा का कार्ड रद्द कर दिया था, लेकिन केसवानी जी नहीं झुके, बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के दखल और वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की मध्यस्थता के बाद श्रीनिवास निवास तिवारी को खेद प्रकट करना पड़ा था. यह घटना बताती है कि अपनों के लिए उठ खड़े होने और सत्ता को सीधे ललकारने का माद्दा जो राजकुमार केसवानी में था, वह हर किसी में नहीं होता.

जनपक्षधरता और मूल्यों की पत्रकारिता कभी नहीं छोड़ी

बेहद गर्मजोशी से रिश्ते निभाने वाले राजकुमार केसवानी अक्खड़ स्वभाव, भाषा में आक्रामकता और तीखेपन के लिए जाने जाते थे, लेकिन यह तेवर जनपक्षधरता और सत्ता व सिस्टम की आलोचना करते वक्त दिखते थे. नेताओं और अफसरों के साथ उनका हमेशा ऐसा ही तल्खी भरा व्यवहार रहा. वह बेहद प्रतिभाशाली और ईमानदार व्यक्तित्व थे, जिसका विश्वास कभी भी सत्ता प्रतिष्ठान की जी हुजूरी में नहीं रहा, जब तक, जिसके लिए काम किया, अपनी शर्तों पर किया. न कभी झुके न टूटे. मूल्यों की पत्रकारिता कभी नहीं छोड़ी. मुद्दों और नीतियों पर अपनी बेबाक राय रखते थे.
सोशल एक्टिविस्ट भी थे केसवानी

राजकुमार केसवानी जी को सबसे पहले मैंने खबरों के माध्यम से ही जाना. जब 2-3 दिसंबर 1984 की काली अंधियारी रात को भोपाल में विश्व की सबसे भीषणतम औद्योगिक त्रासदी हुई थी और यहां के यूनियन कार्वाइड कारखाने से रिसी मिथाइल आइसो साइनाइड गैस ने मौत का तांडव मचाते हुए हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया. पूरे शहर को भुतहा और वीरान कर दिया था. तब पता चला कि वह राजकुमार केसवानी ही थे, जो हादसे के तीन-चार साल पहले से लगातार यूनियन कार्बाइड कारखाने में बन रही गैस के खतरे से सत्ता और लोगों को अपने साप्ताहिक समाचार पत्र के माध्यम से आगाह कर रहे थे, लेकिन तब किसी ने भी उनकी नहीं सुनी. उन वर्षों में “बचाइए हुजूर, इस शहर को बचाइए,” “ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा भोपाल,” “न समझोगे तो आखिर मिट ही जाओगे,” शीर्षक से उनके समाचार बताते हैं कि वह खतरे को लेकर कितनी संजीदा और बेचैन थे. यह बेचैनी इसलिए भी थी, क्योंकि वह जानते थे यह जानलेवा गैस कौनसी है, उससे क्या बनाया जाता है और कितनी खतरनाक है. केसवानी जी की यह रिपोर्ट्स देश-विदेश में काफी सराही गईं. भोपाल गैस त्रासदी को लेकर वह सड़कों पर भी उतरे, गैस त्रासदी के संदर्भ में अदालतों में गवाहियां भी दीं. लेकिन वह इस बात को लेकर अक्सर दुखी रहते थे, कि खबरों के जरिए इतनी चेतावनियों के बाद भी वह त्रासदी होने से नहीं रोक सके.

भोपाल गैस त्रासदी ही नहीं, बल्कि ऐसी कई घटनाएं, कई किस्से हैं, जहां वह एक सोशल एक्टिविस्ट के रूप में दिखे. किसी जमाने में पुराने भोपाल में उनके पड़ोसी रहे पत्रकार, राजनेता शैलेन्द्र शैली बताते हैं कि केसवानी जी पत्रकारिता, साहित्य,संगीत, सिनेमा के क्षेत्र में चेतनापूर्ण, प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से प्रेरित थे. भोपाल गैस त्रासदी पर लिखने या अध्ययन के लिए पूरे देश- दुनिया के पत्रकार उनसे संपर्क करते थे.



एक अच्छे साहित्यकार, कलाप्रेमी

केसवानी जी के पारिवारिक मित्र रहे एक बहुत पुराने फोटोग्राफर रजा मावल अपनी एक पोस्ट में याद करते हुए लिखते हैं कि केसवानी जी की कलम खबरों तक ही सीमित नहीं थी. वे प्रसिद्ध कथाकार ज्ञानरंजन के साथ देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ के सम्पादक भी रहे. नया ज्ञानोदय , कथादेश, कादंबिनी सहित देश भर की साहित्यिक पत्रिकाओ में कविता, कहानियों का प्रकाशन लगातार होता रहा. आप की लिखी प्रमुख किताबे हैं जो चर्चित हैं. साल 2006 में पहला कविता संग्रह “बाक़ी बचें जो”, सन् 2007 में दूसरा संग्रह “सातवां दरवाज़ा “ और सन् 2008 मे 13वीं शताब्दी के महान सूफ़ी संत-कवि मौलाना जलालउद्दीन रूमी की फ़ारसी कविताओ का हिंदोस्तानी अनुवाद “जहान-ए-रूमी”. राजकुमार केसवानी जी की लिखी किताब दास्तान-ए- मुगल-ए-आजम और कशकोल जैसी दस्तावेजी किताबों को आप पढ़ेंगे तो पाएंगे कि वह हिन्दी-उर्दू जुबान के बीच एक पुल की तरह उनका लेखन था.

फिल्मों के इनसाइक्लोपीडिया

रजा ही नहीं, पूरी पत्रकार बिरादरी और तमाम पढ़ने-लिखने वाले लोग उन्हें सिनेमा और संगीत जगत का इनसाइक्लोपीडिया मानते थे. भोपाल के सर्वाधिक प्रसारित एक दैनिक समाचार पत्र में वर्षों से छप रहा उनका कालम “आपस की बात” लोगों को बहुत पसंद था. केसवानी जी को मिले अनेक पुरस्कारों में सन 1985 में श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए भारत का सर्वोच्च पुरुस्कार बीडी गोयनका अवॉर्ड, 2010 मे पर्यावरण पर रिपोर्टिंग के लिए प्रतिष्ठित प्रेम भाटिया जर्नलिज़्म अवॉर्ड शामिल हैं.

लीक से हटकर कुछ नया करने की बेचैनी

उनके एक वरिष्ठ पत्रकार साथी राजेश पांडेय और राकेश दीक्षित बताते हैं कि लीक से हटकर चलना, कुछ नया काम बिल्कुल नए अंदाज में और पूरे आक्रामक तेवरों के साथ करना केसवानी जी के स्वभाव में रहा. इसके लिए हमेशा उनमें एक बेचैनी दिखती थी. उन्होंने न केवल कई हिन्दी, अंग्रेजी, देशी-विदेशी अखबारों में काम किया, बल्कि वह फिल्म, संगीत के कई कार्यक्रम भी तैयार करते और स्क्रिप्ट लिखते थे. शास्त्रीय, फ़िल्मी संगीत सहित दुनिया-जहान के संगीत रिकार्ड का उनके पास अद्भुत संग्रह है. रजा मावल के मुताबिक, लगभग 33 हज़ार रिकार्ड हैं. जिसमे इंडिया का पहला रिकार्ड गौहर जान का गाया 78 rpm, सन 1903 मे रिकार्ड हुआ रिकार्डॅ भी है. बातचीत में भोपाली अंदाज भरी रूमानियत की मौजूदगी और जीने वह सहेजने की कोशिश के लिए केसवानी जी हमेशा याद किए जाएंगे...आखिरी सलाम. (डिस्क्लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं)

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज