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राम-राम पर आराम करने के मूड में क्यों नहीं हैं उद्धव ठाकरे?

Kinshuk Praval | News18Hindi
Updated: October 9, 2019, 3:43 PM IST
राम-राम पर आराम करने के मूड में क्यों नहीं हैं उद्धव ठाकरे?
उद्धव ठाकरे

अयोध्या प्रवास के दौरान उद्धव ने कहा था कि, 'चुनाव में सब राम-राम करते हैं और फिर चुनाव बाद सब आराम करते हैं.'

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  • Last Updated: October 9, 2019, 3:43 PM IST
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विजयादशमी के मौके पर शिवसेना की पारंपरिक रैली में अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने राम मंदिर का मुद्दा उठाकर बीजेपी को चौंकाने का काम किया है. उद्धव ठाकरे ने मोदी सरकार से कहा है कि राम मंदिर बनाने का रास्ता साफ होना चाहिए और राम मंदिर निर्माण के लिए एक विशेष कानून बनाया जाना चाहिए.

खास बात ये है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ऐन पहले उद्धव ठाकरे राम मंदिर के मुद्दे पर आखिर इतना ज़ोर क्यों दे रहे हैं?  खासतौर से तब जब कि ये मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है इसके बावजूद उद्धव ठाकरे मोदी सरकार से विशेष कानून की मांग कर रहे हैं.

शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने ये भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर पर नहीं बोलने की सलाह दी थी क्योंकि मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है. लेकिन उद्धव के तर्क ये हैं कि राम मंदिर का मामला पिछले 35 साल से लंबित है.

उद्धव कहते हैं कि, ‘अदालतें उस दिन बंद रहती हैं जिस दिन राम ने रावण का वध किया और उस दिन भी जब राम अयोध्या लौटे थे, लेकिन वहां मुद्दा यह है कि क्या राम ने अयोध्या में जन्म लिया था?'

अब उद्धव एक तरह से अल्टीमेटम दे रहे हैं कि अगर इस महीने राम मंदिर पर कोर्ट का फैसला नहीं आता है तो अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए विशेष कानून बनाया जाए.

बड़ा सवाल ये है कि साल 1992 में बाबरी विध्वंस के 27 साल बाद अब अचानक से ही शिवसेना राम मंदिर को लेकर इतना आक्रमक क्यों होती जा रही है?

अयोध्या का दो बार दौरा कर चुके हैं उद्धव ठाकरे
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शिवसेना का अध्यक्ष बनने के बाद उद्धव ठाकरे दो बार अयोध्या का दौरा कर चुके हैं. पहली दफे 24 नवंबर 2018 को वो पत्नी रश्मि और बेटे आदित्य ठाकरे के साथ अयोध्या आए थे और दूसरी बार 16 जून 2019 को उन्होंने अपनी पार्टी के 18 सांसदों के साथ राम-लला के दर्शन किए थे.

अयोध्या प्रवास के दौरान उद्धव ने कहा था कि, 'चुनाव में सब राम-राम करते हैं और फिर चुनाव बाद सब आराम करते हैं.' उन्होंने कहा था कि साल 2019 में केंद्र में सरकार बने या न बने लेकिन मंदिर जरूर बनना चाहिए और इसके लिए केंद्र सरकार अध्यादेश लेकर आए. उद्धव ठाकरे का अयोध्या पहुंचकर राम लला का दर्शन करना साबित करता है कि वो बीजेपी को न तो इस मुद्दे का हाईजैक करने देगी और न ही राम मंदिर निर्माण पर ढील लेने देगी.

संसद में शिवसेना के सांसदों ने किया था प्रदर्शन

तभी साल 2018 में संसद के शीतकालीन सत्र में शिवसेना के सांसदों ने राम मंदिर बनाने के लिए कानून बनाने की मांग की थी और धरना प्रदर्शन तक किया था. सांसदों की मांग थी कि पहले मंदिर बाद में सरकार. शिवसेना के सांसद संजय राउत ने कहा जब शिवसेना ने 17 मिनट में बाबरी ढांचा तोड़ दिया था  तो फिर केंद्र सरकार को कानून बनाने में  इतना वक्त क्यों लग रहा है?

बाबरी विध्वंस की जिम्मेदारी बाला साहब ने ली थी

राम मंदिर आंदोलन के दौर में अयोध्या में साल 1992 में विवादास्पद ढांचे का विध्वंस सबसे निर्णायक अध्याय रहा. बाबरी ढांचा ढहाए जाने के बाद सबसे पहले तत्कालीन शिवसेना अध्यक्ष बाला साहब ठाकरे ने जिम्मेदारी लेते हुए कहा था कि उन्हें अपने शिवसैनिकों पर गर्व है जिन्होंने ढांचा गिराया. राम मंदिर आंदोलन और बाबरी विध्वंस के बाद ही महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना सत्ता की दावेदार बनी और साल 1996 में पहली दफे सरकार बनाने में कामयाब हो सकी. उस वक्त गठबंधन की सरकार में शिवसेना का पहला मुख्यमंत्री बना और मनोहर जोशी सीएम की कुर्सी पर बैठे.

राम मंदिर आंदोलन से बदली बीजेपी की किस्मत

लेकिन पिछले 27 साल में राजनीतिक हालात इस कदर बदले  कि न सिर्फ केंद्र बल्कि महाराष्ट्र में भी बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब हुई और अब महाराष्ट्र में बीजेपी की मुख्यमंत्री है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को राम मंदिर की वजह से भी बड़ी जीत मिली. यूपी में बीजेपी की जीत के पीछे भी राम मंदिर आंदोलन की धमक है. इसी तरह महाराष्ट्र की सियासत में बीजेपी के सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने के सफर में भी हिंदुत्व और राम मंदिर आंदोलन की बड़ी भूमिका रही है.

शिवसेना जबतक समझ पाती तब तक हिंदुत्व के रथ पर सवार होने वाली बीजेपी विकास के पथ पर चलते हुए सत्ता के शीर्ष पर पहुंच गई. कल तक छोटा भाई कहलाने वाली बीजेपी अब महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े भाई की भूमिका में है और शिवसेना से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

उग्र हिंदुत्व के बावजूद सियासी नेपथ्य में है शिवसेना

यही वजह है कि उद्धव ठाकरे अपने शिवसैनिकों से माफी भी मांग रहे हैं. वो ये भी कह रहे हैं कि शिवसेना किसी के सामने झुकी नहीं है. बल्कि गठबंधन की वजह से कई शिवसैनिकों की सीटें बीजेपी के पास चली गई हैं. दरअसल, महाराष्ट्र की कुल 288 सीटों में से शिवसेना 124 सीटों जबकि बीजेपी 164 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं.

ऐसे हालात में शिवसेना को लगता है कि राम मंदिर का मुद्दा कहीं न कहीं बीजेपी की कमज़ोर नस भी है. तभी वो राम मंदिर का मुद्दा उठाकर बीजेपी पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. वो बीच-बीच में बीजेपी को ये अहसास करा जाते हैं कि इस मुद्दे में शिवसेना की भूमिका बड़े भाई की रही है और इसे बीजेपी न भूले.

तभी उन्होंने ये भी कहा कि शिवसेना के लिए राम मंदिर का मुद्दा राजनीति से ऊपर है और इसका महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों से कोई लेना देना नही हैं. एक प्रकार से शिवसेना ने विधानसभा चुनाव से पहले राम मंदिर का कार्ड खेलकर बीजेपी को बैकफुट पर लाने की कोशिश की है. ये बताया है कि अगर फैसला राम मंदिर के पक्ष में नहीं आए तो भविष्य की सियासत का ब्लू प्रिंट क्या हो सकता है.

राम मंदिर पर बीजेपी को लगातार घेरा

मोदी सरकार पहले कार्यकाल में राम मंदिर निर्माण पर चुप रही. बीजेपी नेता अपने भाषणों में मंदिर का जिक्र करते रहे तो शिवसेना बीजेपी को घोषणा-पत्र का वादा याद दिलाती रही. बहरहाल, चुनाव में भले ही छोटे भाई की भूमिका में है लेकिन उसके तेवर बड़े भाई वाले ही हैं. यही वजह है कि उसने दशहरा के मौके पर राम मंदिर को लेकर बीजेपी पर निशाना साधने का मौका नहीं चूका. राम मंदिर के अलावा उद्धव ठाकरे ने समान नागरिक आचार संहिता लागू करने की बात भी की. साफ है कि अब राम-राम पर आराम करने के मूड में नहीं हैं उद्धव ठाकरे.

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First published: October 9, 2019, 3:23 PM IST
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