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Opinion: सरकार से ज्यादा समाज पर है कट्टरता का तिलिस्म तोड़ने की जिम्मेदारी

कर्नाटक में हिजाब विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है.  (फाइल फोटो)

कर्नाटक में हिजाब विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. (फाइल फोटो)

 कांग्रेस ने तुष्टिकरण का यह मुहावरा 1920 के बाद से खिलाफत आंदोलन के समर्थन से आरंभ किया. उसका आवरण बदलता रहा पर स्वरूप ...अधिक पढ़ें

र्नाटक के शिवमोगा में बजरंग दल के एक युवा पदाधिकारी हर्ष की निर्मम हत्या तथा उससे जुड़े घटनाक्रम ने भारत में बढ़ते इस्लामी कट्टरवाद को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. किसी हिंदू संगठन के कार्यकर्ता की यह पहली हत्या नहीं है. कई हत्याएं पहले भी हो चुकी हैं. हम जानते हैं कि कर्नाटक के शिक्षा संस्थानों में हिजाब पहनने की अनुमति को लेकर विवाद चल रहा है. यह मामला अब हाईकोर्ट में हैं. हर्ष की हत्या को इसी विवाद से जुड़ा हुआ माना जा रहा है.

इस घटना से जुड़े कुछ खास पहलू हैं जिन पर गौर किया जाना जरूरी है. मीडिया तथा बुद्धिजीवियों का एक वर्ग शुरूआत से ही ये साबित करने का प्रयास कर रहा है कि हर्ष के खिलाफ यह निजी रंजिश का मामला है. इसलिए इसे इस्लामी कट्टरवादियों की हिंसक प्रतिक्रिया न माना जाए. हमें यह दोहरा मापदंड हर ऐसे मामले में दिखाई देता है. हाल ही में तमिलनाडु में एक हिंदू किशोरी लावण्या द्वारा धर्मांतरण के दबाव में की गई आत्महत्या हो या झारखंड में किशोर रूपेश पांडे की भीड़ द्वारा पीट-पीट कर दिनदहाड़े की गई हत्या. इन्हें सामान्य अपराध साबित कर कट्टरवाद को बचाने का प्रयास किया जाता है.

कर्नाटक सहित देश के कई अन्य हिस्सों में हम जिस कट्टरवाद को देख रहे हैं, उसे प्रोत्साहन कहां से मिल रहा है? इसकी जड़ें कहां हैं? इसकी जड़ें हमारी देश के उस राजनीतिक-सामाजिक-शैक्षिक ढांचे में हैं, जिसे आजादी के बाद सात दशक तक पोषित किया गया. भारतीय जनता पार्टी के अलावा सभी प्रमुख राजनीतिक दल इस पालन-पोषण में कहीं न कहीं शामिल रहे. इसका कारण था कि उन्हें मुस्लिम एक वोट बैंक के तौर नजर आ रहे थे. इसलिए एक ऐसे मुस्लिम नेतृत्व को बढ़ावा दिया गया जो अत्यंत कट्टरवादी था और कट्टरवाद को ही बढ़ावा दे रहा था.

हिंदू इस देश में बहुसंख्यक हैं इसका फायदा होने के बजाए उन्हें नुकसान हुआ. पंथनिरपेक्षता के नाम पर छद्म पंथ निरपेक्षता को बढ़ावा दिया गया. दिलचस्प बात ये है कि गैर कट्टरवादी मुस्लिमों को भी इससे खासा नुकसान हुआ. मुस्लिम समाज में एक बड़े वर्ग ने जब देखा कि कट्टरवादियों को हमारे राजनीतिक नुमाईंदे सर-आंखों पर बैठाते हैं तो उनके लिए भी स्वाभाविक विकल्प यही था. उधर कई मुस्लिम देशों ने भारत में कट्टरवादी संगठनों के माध्यम से मध्यकालीन मानिसकता वाले मदरसों को बड़ी संख्या में स्थापित किया, जिनसे कट्टरवादी मुस्लिमों की एक पौध का सतत् प्रवाह जारी है.

1980 के दशक के बाद से हिंदू समाज में इसकी प्रतिक्रिया राम जन्मभूमि आंदोलन के रूप में सामने आ रही थी. भारतीय जनता पार्टी और बाल ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के अतिरिक्त सभी राजनीतिक दल इस आंदोलन के विरोध में थे. 1980 के दशक में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार एक ओर रामजन्मभूमि आंदोलन का विरोध कर रही थी, दूसरी ओर शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को संसद में एक कानून लाकर बदल दिया गया.

कांग्रेस में आरिफ मोहम्मद खान जैसे संवेदनशील और सही मायने में पंथनिरपेक्ष भारतीय मुस्लिम नेता दरकिनार कर दिए गए. खान ने राजीव गांधी की सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए इस्तीफा भी दिया पर दुखद बात ये है कि मुस्लिम समाज में ही उन्हें सीमित समर्थन मिला. यह इस बात का संकेत था कि भारतीय मुस्लिम समाज में कट्टरवाद की पैठ कितनी गहरी हो चुकी है. यही वह दौर भी था जब मुस्लिम मुल्लाओं और मौलवियों की भारतीय राजनीति में तूती बोलती थी.

1980 के दशक का अध्ययन आज के संदर्भों में जरूरी है क्योंकि हमें यह तय करना है कि भारतीय समाज में कट्टरवाद ने कैसे विनाशक की भूमिका निभाई है और समय रहते इससे नहीं निपटा गया तो हम पुन: उसी इतिहास को दोहरा रहे होंगे. 1980 के दशक में पंजाब, कश्मीर, उत्तर पूर्व आदि भारत के अधिकतर हिस्से कांग्रेस पोषित कट्टरवाद की आग में झुलस रहे थे. 1989 के बाद से देश में हिंदुत्व समर्थक भारतीय जनता पार्टी का उभार हुआ. 1999 से 2004 तक भाजपा केंद्र में सरकार में रही. उस समय अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री के तौर पर भाजपा नीत गठबंधन सरकार चला रहे थे.

भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं था, इसलिए कई मामलों में उनकी मजबूरियां थीं. फिर भी, तुष्टिकरण की नीतियों को कम से कम सरकारी प्रश्रय मिलना बंद हो गया. पर 2004 से 2014 के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार में सब उलट गया. आज जो कट्टरवाद हम देख रहे हैं उसकी जड़ें संप्रग के इस शासन काल में हैं. कट्टरवादी मुस्लिमों को ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने की ट्रेनिंग इसी संप्रग यानी यूपीए के राज में दी गई और उसमें सबसे अहम भूमिका निभाई राजेंद्र सच्चर समिति रिपोर्ट ने.

इस समिति ने मुस्लिमों के सामाजिक व आर्थिक पिछड़ेपन की बेचारगी भरी तस्वीर पेश की लेकिन यह नहीं बताया कि इस पिछड़ेपन का  कारण भारतीय मुस्लिमों के व्यापक वर्ग में व्याप्त कटटरवाद, रूढ़िवादिता तथा उनका पोषण करने वाले राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी हैं.

कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण का यह मुहावरा 1920 के बाद से खिलाफत आंदोलन के समर्थन से आरंभ किया. उसका आवरण बदलता रहा पर स्वरूप नहीं. इसकी परिणति 1947 में भारत के विभाजन के रूप में तो हुई ही, इसके बाद दशकों तक भारत में हिंदू—मुस्लिम दंगे भी  समय—समय पर होते है. इनमें से अधिकतर दंगों में हिंदुओं का नुकसान हुआ लेकिन मुस्लिम ‘पीड़ित’ के रूप में खुद को प्रोजेक्ट करने में सफल रहे. इसमें उन्हें मदद मिली उन बुद्धिजीवियों और मीडिया के एक वर्ग से जिन्हें तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले पोषित करते रहे.

2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र तथा कई राज्यों में भाजपा की सरकार आने के बाद ये तिलिस्म टूटने लगा. भाजपा की केंद्र तथा राज्य सरकारों ने मुस्लिम कट्टरवाद के सामने घुटने टेकने से इन्कार कर दिया. यह उस राजनीतिक-सामाजिक-पंथिक-बृद्धिजीवी गठजोड़ के लिए अप्रत्याशित था जो इस देश की बहुसंख्यक हिंदू जनता को दोयम दर्ज का नागरिक बनाकर अपना दबदबा इस देश के हर क्षेत्र में कायम किए हुए था. पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया, सिमी आदि संगठनों का उभार इसी घटनाक्रम की प्रतिक्रिया में है. राजनीति, शिक्षा, सामाजिक, मीडिया आदि क्षेत्रों में उन्हें अपने पुराने साथियों का भी इसमें पूरा सहयोग मिल रहा है. यह तंत्र काफी मजबूत भी है.

भीमा—कोरेगांव हिंसा, दिल्ली दंगे, जेएनयू में लगने वाले नारे, कर्नाटक में हिजाब को लेकर विवाद, हर्ष तथा ऐसे कई हिंदू कार्यकर्ताओं की हत्या तथा विदेशी मीडिया और शिक्षा संस्थानों में हिंदुत्व को लेकर एक नकारात्मक विमर्श- ये सब उस तिलिस्म टूटने की प्रतिक्रिया है, जिनसे कइयों के व्यापक हित जुड़े हैं. इन्हें कम करके मत आंकिए, इस तिलिस्म को सात दशक में रचा गया है. इसे तोड़ना आसान नहीं. शुरुआत हो चुकी है, पर अभी लंबा सफ़र बाकी है. एक बात और, इस तिलिस्म को तोड़ने की जिम्मेदारी सरकार से ज्यादा समाज की है.

लेकिन हिंदू संगठनों से जुड़े सामाजिक कार्यकताओं की हत्या इस बात की ओर इशारा कर रही है कि इस्लामी कट्टरवाद एक ऐसी बिल्ली की तरह है जिसके सामने हिंदू समाज का एक बड़ा वर्ग उन कबतूरों की तरह आंख बंद किए बैठा है जिन्हें लगता है कि बिल्ली हमें देख नहीं पा रही इसलिए हम सुरक्षित हैं.

लेखक परिचय: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा कई पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं. उनकी नवीनतम पुस्तक ‘तालिबान: वॉर एंड रिलीजन इन अफगानिस्तान’ है. 

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

Tags: Bajrang dal, BLOGS, Hijab controversy

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