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सदानीरा से सदा नहीं रहा तक का सफर...

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Updated: January 22, 2020, 7:32 PM IST
सदानीरा से सदा नहीं रहा तक का सफर...
डैम बनने की वजह से पानी में रहने वाली मछलियों की विवधता में पचास फीसद तक कमी देखने को मिली है.

नदियों का प्रवाह ही ऐसी चीज है जिसे बचाए रखना और नदियों को पूरी तरह से प्रवाहित होने देना ही आज पूरी दुनियाभर के पर्यावरण से जुड़ी नीतियों के केंद्र में होना चाहिए.

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शूल फिल्म में विधानसभा का एक सीन है जिसमें भैयाजी नाम का विधायक अपनी गुंडई और दबंगई से विधायक बन गया है, वो विधानसभा में हंगामा मचा रहा है. फिल्म में उसे ऐसे नेता की तरह दिखाया जाता है जो निपट अनपढ़ और साथ में गंवार भी है, उसे किसी तरह की कोई समझ नहीं है. वो चूंकि विधानसभा में मौजूद है तो उसे वहां हंगामा करना है. ऐसे ही हंगामा करते हुए वो कहता है- पानी से बिजली नहीं निकाली जाएगी, वैसे ही किसानों को साबुत पानी नहीं पहुंच पाता है, अगर उसमें से बिजली भी निकाल ली जाएगी तो बचेगा क्या, जय किसान, जय किसान.

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जब भैयाजी ये बात बोलता है तो विधानसभा का स्पीकर कुछ कह नहीं पाता और उसे देखता रह जाता है. ये दृश्य काफी चर्चा में रहा और कई जगह इसे एक मज़ाक की तरह लिया जाता है. भैयाजी विधायक को एक मूढमगज की तरह देखा गया और कई नेताओं को भैयाजी की ही तरह बताया गया. लेकिन अगर हम गौर से पानी के साबुत नहीं बचे रहने और डैम बनने की बात को जोड़ कर देखें तो हम भैयाजी की बात को सही पाएंगे.

नदी का प्रवाह और खलनायक डैम

नदियों का प्रवाह ही ऐसी चीज है जिसे बचाए रखना और नदियों को पूरी तरह से प्रवाहित होने देना ही आज पूरी दुनियाभर के पर्यावरण से जुड़ी नीतियों के केंद्र में होना चाहिए. क्योंकि नदियों को अगर उनकी नैसर्गिक स्थिति में वापस नहीं लाया गया तो जिस वातावरण के लगातार खराब होने पर हम चिंता जाहिर कर रहे हैं, उस पर सिर्फ चिंता जाहिर करते रह जाएंगे.

डैम निर्माण से हम शहरों में चकाचौंध बढ़ाने में लगे हुए हैं और माइनिंग कर रहे है, इसके असर को हम इस तरह से समझ सकते हैं कि दुनिया की 177 बड़ी नदियों में से एक तिहाई ही अविरल होकर बह रही हैं और 1000 किलोमीटर से लंबी दूरी तय करने वाली नदियों में से महज 21 नदियां ही समुद्र में जाकर मिल पाती हैं. जिसका नतीजा ये निकल रहा है कि दुनिया की कई नदियों से वातावरण में जो कार्बन उत्सर्जित हो रहा है वो कहीं कहीं पर तो कोयला जलाकर बिजली पैदा करने वाले प्लांट से ज्यादा है.

बहाव रोक कर बढ़ा रहे हैं कार्बनहमें ये बताया गया है कि हाइड्रोपॉवर यानी बिजली से पानी उत्पादन करने से न तो प्रकृति को कोई नुकसान पहुंचता है और पानी से बिजली निकालने के बाद उसे पूरा छोड़ दिया जाता है लेकिन ऐसा होता नहीं है. क्योंकि हाइड्रोपॉवर बिजली बनाने की वो तकनीक नहीं है जो पर्यावरण हितैषी है. दरअसल नदियां ज़मीन पर सड़ने वाले जैविक पदार्थों को समुद्र तक पहुंचाने में मदद करती हैं. ये पदार्थ समुद्र के तले में बैठ जाते हैं और इस तरह से बढ़ रहे कार्बन चक्र को नियंत्रित करने में मदद मिलती है. एक अनुमान के मुताबिक इस तरह से हर साल 20 करोड़ टन कार्बन हवा से बाहर हो जाता है.

हाइड्रोइलेक्ट्रिक डैम जहां पर भी बनाए जाते हैं वहां पर अक्सर बड़े हरे भरे इलाके बाढ़ से प्रभावित होते हैं. जिसकी वजह से इन इलाकों में जो वनस्पति सड़ती है उससे कार्बन डायऑक्साइड, मीथेन और नाइट्र्स ऑक्साइड उत्सर्जित होती है. इस तरह दुनियाभर के डैम हर साल करोड़ो टन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित कर देते हैं. नदियों पर बांध बनाए जाने से इकोसिस्टम और उस पर निर्भर जीव दोनों पर असर पड़ता है. विकसित देशों के करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनका जीवन नदियों और तालाबों पर निर्भर करता है.

क्या हम नदी को कुछ दे सकते हैं
देश दुनिया के नीति निर्माताओं ने नदियों के साथ भी ऐसा ही किया और जनता को ये भ्रम भी दिया कि हमने नदी से जो लिया वो उसे वापस कर दिया. उन्होंने ये भी भ्रम दिया कि नदियों को कोई नुकसान नहीं किया जा रहा है बल्कि उसके जरिए हम मानव सभ्यता का विकास ही कर रहे हैं. इसकी बानगी हमें गंगा एक्ट में भी नज़र आती है, दरअसल इस बिल का चौथा अध्याय बगैर बाधा के गंगा के बहाव और इसकी गुणवत्ता को बचाए रखने की बात करता है.

इसी अध्याय के सेक्शन 7 में उल्लेखित है कि गंगा में न्यूनतम पानी के बहाव का ध्यान रखा जाए. पहली बात तो न्यूनतम बहाव की बात ही सत्यानाश की जड़ है लेकिन हम उस बात को समझना ही नहां चाहते या जानबूझकर नादान बनने का ढोंग कर रहे हैं. क्योंकि नदीं को कितना बहाव चाहिए ये निर्धारित करने वाले हम हैं ही नहीं. लेकिन हम वो कर रहे है और उसका असर हमें अलग अलग तौर पर नज़र आ रहा है.

इस एक्ट में गंगा और उसकी बड़ी सहायक नदियों के जल प्रबंधन और इकोसिस्टम के संरक्षण का खास ख्याल रखे जाने की बात भी कही गई लेकिन कैसे? उत्तराखंड के पांचो प्रयाग तो बांध की भेंट चढ़ चुके हैं. टेहरी के बाद जहां से भगीरथी और अलकनंदा मिलकर गंगा बनाती हैं, वहीं से गंगा में मौजूद बेक्टीरियोफेज की मात्रा में भारी कमी (90 फीसदी) हो जाती है. तो क्या बिल आ जाने के बाद सरकार वो तमाम बांध जो लगातार बनाए जा रहे हैं उनका निर्माण बंद कर देगी.

ड्राफ्ट को पढ़ कर तो ये नहीं लगता है क्योंकि बिल ने भले ही गंगा की परिभाषा में परिवर्तन करते हुए नई परिभाषा में अब पंच प्रयागों पर मिलने वाली सभी धाराओं को गंगा की परिभाषा में शामिल किया है (पहले गोमुख से गंगासागर तक को शामिल किया जाता था) लेकिन इस मसौदे में एक तरफ तो गंगा पर बांध बनाना स्वीकार किया गया है, वहीं दूसरी तरफ गंगा के प्रवाह को बनाए रखने की शर्त को भी जोड़ा गया है और ये दोनों बातें विरोधाभासी हैं.

आगे अगर अध्याय 13 के सेक्शन 40 पर नज़र डालें तो मालूम चलता है कि गंगा के तट पर जेट्टी या पोर्ट, और स्थायी हाइड्रोलिक संरचना का निर्माण किसी भी तरह के स्टोरेज या जिससे नदी के प्रवाह पर असर पड़ता है, बगैर पूर्व इजाज़त के नहीं किया जा सकता है यानी गंगा या उससे जुड़ी किसी भी सहायक नदी पर आपको किसी भी तरह का कुछ व्यवधान पैदा करना है तो सरकार से पूर्व इजाज़त लेना ज़रूरी होगा.

लुप्त हो रही है ताजे पानी की कई प्रजातियां
एक शोध बताती है कि दुनियाभर में ताजेपानी की जैवविविधता दोगुनी गति से खत्म हो रही है. अकेले उत्तर अमेरिका में ही ताजे पानी में पाई जाने वाली कम से कम 57 प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं और ये गति सामान्य विकासवाद की गति से 877 गुना तेज है. यही नहीं प्राकृतिक संवर्धन अंतर्राष्ट्रीय संगठन के मुताबिक 37 फीसदी ताजेपानी की मछलियां लुप्त होने की कगार पर हैं.

नवविकास की इसमें अहम भूमिका है खासकर डैम, जिसकी वजह से नदियों के आपस में जुड़ने की प्राकृतिक प्रक्रिया में नाटकीय कमी देखने को मिली है. यही नहीं इससे नदी के प्राकृतिक बहाव में नकारात्मक असर तो हो ही रहा है, इसके अलावा नदी के पारिस्थितिकीय तंत्र, उसमें रहने वाली प्रजातियों के निवास, ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन, पानी के जैविक और रसायनिक गुणों में परिवर्तन देखने को मिल रहा है.

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पचास सालों के अंदर ही डैम बनने की वजह से पानी में रहने वाली मछलियों की विवधता में पचास फीसद तक कमी देखने को मिली है, यही नहीं नदी के बेसिन में पाई जाने वाली दूसरी प्रजातियों के लुप्त होने में भी नए बन रहे डैम एक अहं वजह हैं. गंगा नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन यानि सूंस के लुप्त होने की कगार पर पहुंचने की एक वजह गंगा में प्रवाह की कमी होना ही है. जब हम अपने शास्त्र पढ़ते हैं, या इतिहास में झांकते हैं तो अक्सर एक वाक्य पढ़ने को मिलता है, अमुक जगह से सदानीरा नदी बहा करती थी. सदानीरा का मतलब होता है जिसमें हमेशा पानी मौजूद हो.

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First published: January 22, 2020, 7:32 PM IST
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