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गेहूं, गंगा और गुलाब के प्यार की कहानी और उनका एहसास...

News18Hindi
Updated: February 17, 2020, 3:02 PM IST
गेहूं, गंगा और गुलाब के प्यार की कहानी और उनका एहसास...
वैसे तो अब गुलाब में खुशबू भी नहीं रही है लेकिन फिर भी ये दिन गुलाब का होता है.

अब गुलाब में खुशबू भी नहीं रही है लेकिन फिर भी ये दिन गुलाब का होता है. वैसे तो गुलाब सौंदर्य का प्रतीक है, प्रेम में भी सौंदर्य है और हम जिससे प्रेम करते हैं, उसमें भी हम सौदंर्य ही तलाशते हैं.

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  • Last Updated: February 17, 2020, 3:02 PM IST
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नायक, नायिका के कमरे में नौकर के हाथों एक तोहफा भिजवाता है. तोहफा एक तरबूज है. नायिका वो तरबूज ऊपर से नीचे खड़े हुए नायक पर फेंक देती है. तभी नायिका की सहेली नायक को बुलाती है और उससे कहती है कि पहली बार लड़की से मिलने के लिए गए और तोहफे में तरबूज दिया. तो नायक बोलता है कि उसमें गलत क्या है, तरबूज खाने से ताकत आती है. नायिका की सहेली उसे समझाती है कि लड़कियों से जब बात करनी होती है तो ताकत की नहीं नजाकत की ज़रूरत होती है, उसे कुछ फूल भेजो. इसके आगे की कहानी देखने के लिए आप अमिताभ बच्चन की ‘सत्ते पे सत्ता’ देख सकते हैं. मुझे बस यही दृश्य आपसे साझा करना था क्योंकि आगे हमारी बात इसी ताकत और नजाकत के इर्द गिर्द घूमनी है.

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प्रेम दिवस के दिन गुलाब बेहद महंगे हैं
दरअसल यहां इस दृश्य का जिक्र इसलिए क्योंकि प्रेम दिवस के दिन गुलाब बेहद महंगे हैं और बेचारा/बेचारी प्रेमी इसी वजह से अपने प्यार का इज़हार नहीं कर पा रहे हैं. वैसे तो अब गुलाब में खुशबू भी नहीं रही है लेकिन फिर भी ये दिन गुलाब का होता है. वैसे तो गुलाब सौंदर्य का प्रतीक है, प्रेम में भी सौंदर्य है और हम जिससे प्रेम करते हैं, उसमें भी हम सौदंर्य ही तलाशते हैं. गुलाब भी कोमल है और प्रेम भी नाज़ुक होता है. हमें प्रेमिका भी नज़ाकत वाली ही भाती है.

ताकत अनाज देता है
हम इंसान अंदर से सौंदर्य ही चाहते हैं, इसी सौंदर्य को हासिल करने के लिए हम लड़ते हैं, ताकत चाहते हैं और ताकत अनाज देता है लेकिन अनाज में सौंदर्य नहीं है. इसलिए उसे खाया जा सकता है लेकिन उससे प्रेम नहीं किया जा सकता है. चूंकि हम उससे प्रेम नहीं कर पाते हैं सिर्फ खा ही पाते हैं इसलिए हम उसे खत्म कर देना चाहते हैं, हम उसे चट कर देना चाहते हैं. हमारी यही चट करने की प्रवृत्ति हमारे अंदर के लालच को दर्शाती है.

हम गेंहू खाते हैं क्योंकि हम ताकत चाहते हैं अपनी भूख मिटाना चाहते हैं और उसी ताकत के भरोसे हम गुलाब पाना चाहते हैं.
गंगा का गंगत्व खतरे में पड़ जाता है
हमें जिससे भी प्यार होता है, हम सबसे पहले उसके अंदर सुंदरता तलाशते हैं. अगर नहीं होता है तो हम पैदा करते हैं. जब पहाड़ी दर्रों से बहती हुई भागीरथी, अलकनंदा से मिलती है तो मटमैली सी गंगा बनती है. जिसमें कथित तौर पर सौंदर्य शायद नज़र नहीं आए. लेकिन ये वही गंगा है जिसे हम मां, हमारी पूज्यनीय और तमाम तरह की बातों से नवाजते हैं. यें गंगा अपने किनारे के करीब तीस करोड़ लोगों को खिलाती है, पिलाती है, पोसती है लेकिन फिर भी गंगा का गंगत्व खतरे में पड़ जाता है. फिर उसे ठीक करने की कोशिश की जाती है और ठीक होने के लिए हम गंगा का सौंदर्यीकरण करते हैं क्योंकि गंगा से प्यार तो तभी होगा जब वो सुंदर होगी.

फूलों में रंग जहर से आता है
तो सारी सरकारें गंगा को सुंदर बनाने में लग जाती हैं. काफी हद तक वो इसमें सफल भी हुई हैं और गंगा का सौंदर्यीकरण भी हुआ है. लोगों को गंगा से प्यार भी हो गया है. हालांकि इस प्यार का हासिल ये हुआ कि हम गंगा में सिर्फ सौंदर्य ही तलाशने लगे हैं और गंगा जो गेहूं पैदा करती थी उसकी ताकत धीरे धीरे कमज़ोर होने लगी. हालांकि गंगा के घाट पर लगे हुए गुलाब और बड़े हो गए और ताजे भी दिखने लगे. वैसे
उनमें खुशबू नहीं है. दरअसल फूलों में रंग जहर से आता है लेकिन वो प्रकृति का दिया हुआ उपहार होता है. हम सौंदर्य को देखते ही उसे हासिल कर लेना चाहते हैं, इसलिए प्रकृति ने सुंदरता के साथ ज़हर
के तत्व को जोड़ दिया.

अपनी भूख मिटाना चाहते हैं
गुलाब के साथ कांटे भी इसलिए ही रहे ताकि आकर्षण हासिल करने की हद तक पहुंचे तो बचाव हो सके. दरअसल हम गेहूं खाते हैं क्योंकि हम ताकत चाहते हैं अपनी भूख मिटाना चाहते हैं और उसी ताकत के भरोसे हम गुलाब पाना चाहते हैं. हमारे लिए किसी भी गुलाब का महत्व तभी तक ही है जब तक वो हमारे मानस को तृप्त कर रहा है. गेहूं का महत्व भी तभी तक है जब तक वो शरीर को पुष्ट कर रहा है. हम प्रवृत्ति से भूखे हैं, हमारी ये भूख मां के स्तनों से शुरू होकर, नदी के पानी, पेड़ों के फल, पत्तों, छाल से लेकर, कीट-पतंग, पशु-पक्षी से होता हुआ, सौंदर्य के पान तक पहुंचा. हमने सब कुछ खाया, चूसा, सूंघा, निचोड़ा, हमसे कुछ भी नहीं छूटा.

गुलाब बीच में आ गया
पेट के प्यार ने हमें हरित क्रांति दी, हमने गेंहू उगाया, चावल उगाए- खूब उगाए, मैदान जोते, बाग उजाड़े, नदियां समेटी और खूब खाया. हम खाते गए और खाते जा रहे हैं. इस पेट के प्यार में, दिल का प्यार विलासिता समझा जाने लगा और गुलाब को पीछे धकेल दिया. हम खाते जा रहे थे, खाने की इंतेहा इतनी हुई कि हमने पेड़ पौधे, जानवर तो छोड़ो उनके हिस्से की ज़मीन भी खा ली. फिर भी भूख नहीं मिटी तो हमने नदियां पीना शुरू कर दिया. वो तो गुलाब बीच में आ गया और उसने हमारे अंदर के इंसान को जगा कर रखा हुआ है. इसलिए एक हफ्ते हम खाने को भूल जाते हैं और सौंदर्य को चाहने लगते हैं.

गुलाब की खुशबू जाती रही
दरअसल हमारी जिंदगी में जब गेहूंत्व, गंगत्व और सौंदर्य का संतुलन रहा तब तक सब ठीक रहा. पहले
हम अपने हिस्से का खाते और सबको प्यार बांटते रहे. फिर आगे चलकर हम सबके हिस्से का खाने लगे और अपने हिस्से का प्यार भी देना भूलने लगे. इसका नतीजा ये रहा कि गुलाब का सौंदर्य हासिल करने के लिए हमने और ताकत जोड़ी, हमने सबकी ताकत खुद में समेटनी चाही, हमने सबका हक चूसना चाहा और लगातार हम यही करते आ रहे हैं. अब इससे दिक्कत ये हो गई की गुलाब की खुशबू जाती रही और उसके सौंदर्य को हासिल करने का आकर्षण रह गया. हमने ये हालत कर दी है कि गेहूं खेत में आसूं बहा रहा है और गुलाब बगीचों में अफसोस मना रहा है. दोनों ही दुखी हैं.

गुलाब की खुशबू जाती रही और उसके सौंदर्य को हासिल करने का आकर्षण रह गया.


प्रेम के प्रति प्रेम कम होता जाता है
दरअसल हमें ये समझना होगा कि गेंहू में जो गेहूंत्व है या गुलाब का जो सौंदर्य है वो उसके छिद्रान्वेषण में नहीं है उसके समुच्य में है. गेहूं जब गंगा से गंगत्व लेता है, धरती से उसका अंश पाता है और हवा को अपने अंदर समेटता है तब जाकर उसके अंदर वो गेहूंत्व आता है जो हमे वो ताकत दे सके जिसके बलबूते पर हम इसी गंगत्व, धरती के अंश और अपने हिस्से की हवा को हासिल करके (जो गुलाब ने सौंदर्य हासिल किया है) उसकी रक्षा कर सकें क्योंकि भूख से प्रेम बढ़ता है तो प्रेम के प्रति प्रेम कम होता जाता है. फिर जो प्रेम पनपता है वो भूखा प्रेम होता है जो सौंदर्य की तरफ आकर्षित होता है.

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गेहूं से दिल लगाना होगा
ऐसा नहीं है कि सौंदर्य से प्रेम नहीं हो लेकिन सिर्फ सौंदर्य से प्रेम होना, हासिल करने की मनोवृत्ति को बढ़ा देता है और अगर आप चाहते हैं कि प्रेम उपजे तो गेहूं से दिल लगाना होगा और गुलाब को सहेजना होगा जिससे उसकी खुशबू लौट सके. उसके लिए करना कुछ नहीं है बस गुलाब ढूंढने की जगह पौधा ढूंढ लेना क्योंकि उगा हुआ फूल चिरस्थायी सौंदर्य देगा और ताकत को सही जगह लगाने की प्रेरणा भी मिलती रहेगी.

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First published: February 14, 2020, 4:20 PM IST
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