कोविड-19 के लिए जिम्‍मेदार हैं हम, जैव विविधता की अनदेखी है वजह

कोविड-19 के लिए जिम्‍मेदार हैं हम, जैव विविधता की अनदेखी है वजह
5 जून को मनाया जाने वाला ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ इस बार जैव विविधता यानी बायोडायवर्सिटी के नाम किया गया है.

कोविड-19 जैसी महामारियों के पीछे की वजह ही यही है कि जब हमने जैव विविधता को नष्ट करना शुरू किया तभी से हमने उस तंत्र को समाप्त करना शुरू कर दिया, जो स्वास्थ्य तंत्र के लिए मददगार होता है. आज अगर हम देखें तो इसी कोरोना वायरस की भिन्न-भिन्न किस्मों से हर साल करीब 100 करोड़ लोग बीमार पड़ते हैं और लाखों लोगों की मौत हो जाती है.

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'कोई भी प्राणी, बस प्राणी है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह बड़ा है या छोटा.' यह वह पंक्ति है जिस पर ‘हॉर्टन हियर्स अ हू’ की कहानी टिकी हुई है. एक सहृदयी हाथी की कहानी कहती यह फिल्म 2008 में आई थी, जो 1955 में प्रकाशित इसी नाम की एक किताब पर आधारित थी. बच्चों के लिए लिखने वाले ‘थियोडोर सिअस जीएसल’ की यह कहानी आधी सदी से ज्यादा बीत जाने के बावजूद आज भी प्रासंगिक लगती है.

हॉर्टन नाम का हाथी एक दिन पानी में नहा रहा होता है, तभी उसे कुछ आवाजें सुनाई देती हैं. जब वह आस-पास देखता है तो उसे कुछ भी नजर नहीं आता. पहले तो वह बहुत परेशान होता है. फिर काफी खोजबीन के बाद उसे घास पर कपास के फूल से निकले हुए कण, जिसमें बीच में एक बीज होता है और चारों तरफ रेशे होते हैं, वैसी कुछ आकृति दिखाई देती है. वह जब उसके पास पहुंचता है, तो उसे समझ आता है कि आवाज़ उस कण के अंदर से आ रही है. उस कण के अंदर एक पूरी दुनिया बसी हुई है, जिसका नाम है ‘हुविले’. इस दुनिया में रहने वाला सूक्ष्मजीवों का नाम हूज है.

केवल होर्टन ही है, जो उस दुनिया में रहने वालों से बात कर सकता है. हुविले के मेयर से होर्टन वादा करता है कि वह उनकी दुनिया को बचाएगा. वह लगातार सभी जानवरों को समझाता रहता है कि प्राणी बस प्राणी होते हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितने छोटे या बड़े हैं. उसका लगातार मज़ाक बनाया जाता है. होर्टन सोचता है कि मैं उस फूल के टुकड़े को जिसके अंदर हुविले बसी हुई है, उसे किसी सुरक्षित जगह रखना होगा, लेकिन जब तक वह ऐसा सोच रहा होता है, जंगल में आग की तरह उसके बर्ताव की खबर फैल जाती है और कंगारु उसका मज़ाक बनाते हैं. बंदरो का एक झुंड होर्टन से फूल छुड़ा कर एक चील को दे देते हैं, जो उस फूल के कण को कहीं दूर छोड़ आता है. होर्टन बहुत कोशिश के बाद जब उसे ढूंढ़ लेता है, तो सारे जानवर उससे उस फूल के कण को छुड़ाने में और उसे मिटाने में लग जाते हैं. खास बात यह है कि उस फूल के कण से किसी का कुछ बिगड़ नहीं रहा है, बस उन्हें उसे इसलिए मिटाना है, क्योंकि किसी को ऐसा लगता है कि उसके अंदर जिंदगी है. फिल्म का अंत आते-आते जब होर्टन की बात सुनने को कोई तैयार नहीं होता है तो वह मेयर से कहता है कि वे सब मिलकर जोर से चिल्लाएं, जिससे बाहर रहने वाले जानवरों को उनके होने का अहसास हो सके. जब यह तरकीब भी काम नहीं आती है, तो मेयर अपने ग्रह के एक लड़के योयो की मदद लेता है जिसने जोर की आवाज निकालने वाला एक यंत्र बनाया है. उससे चिल्लाने पर कंगारू औऱ दूसरे जानवरों को आवाज आती है और सभी जानवरों को अहसास होता है कि उस फूल के कण के अंदर कोई जिंदगी मौजूद है.



प्रकृति ने कई बार अलग-अलग तरीके से हमें समझाया, लेकिन हमने समझने को तैयार ही नहीं हुए.
प्रकृति ने कई बार अलग-अलग तरीके से हमें समझाया, लेकिन हमने समझने को तैयार ही नहीं हुए.




प्रकृति ने कई बार अलग-अलग तरीके से यही बात समझाई है, लेकिन हमने समझने को तैयार ही नहीं हुए. फिर प्रकृति ने एक शानदार स्क्रिप्ट लिखी, जिसे आज हम कोरोना काल के नाम से जान रहे हैं, जो खाना हम खाते हैं, जो पानी हम पीते हैं, जो सांस हमें मिली हुई है. वह जिस प्रकृति ने हमें दिया है उसने कभी नहीं कहा कि इस पर पहला हक हम इंसानों का है, लेकिन हम यही बात मान कर चलते रहे. इसी का नतीजा है कि आज मानव सभ्यता बेबसी की कगार पर खड़ी नज़र आ रही है.

5 जून को मनाया जाने वाला ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ इस बार हमने उसी जैव विविधता यानी बायोडायवर्सिटी के नाम किया है. ताकि हमारे ज़हन में लगातार यह बात डाली जाती रहे कि धरती पर रहने वाला हर प्राणी बस प्राणी है. कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कितना बड़ा या छोटा है. वह जीव है या पेड़ है. यह संयोग है या प्रकृति का कोई खेल है समझना मुश्किल है. ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया में लगने वाली आग, आसमान में बादल की तरह मंडराती टिड्डियां, समुद्र में आते तूफान और इन सब के ऊपर दुनिया को चपेट में लेने वाला कोरोना जिस साल आया उसी साल हमने पर्यावरण दिवस की थीम जैव विविधता चुनी. ऐसा लग रहा है जैसे प्रकृति ने खुद ही इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की हो.

क्या होता है जैव विविधता से इंसानी रिश्ता
जैव विविधता को हम एक बिल्डिंग ब्लॉक की तरह समझ सकते हैं, जिसमें हर एक ब्लॉक दूसरे को संभाले हुए रहता है. अगर किसी भी एक ब्लॉक को हटाया जाए, तो पूरी इमारत धराशायी हो जाती है. जैव विविधता भी ठीक इसी तरह धरती और पानी के जीवन का आधार होती है. यह धऱती के हर प्राणी, हवा, पानी, भोजन सब पर असर डालती है. इसी की बदौलत दवा से लेकर प्राकृतिक तौर पर रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता, मौसम बदलाव पर नियंत्रण, सब कुछ होता है. जैव विविधता धऱती पर पूरे जीवन तंत्र को रचने वाले एक जाल की तरह है, जिससे एक तत्व भी निकाला गया, तो पूरे तंत्र पर इसका बुरा असर पड़ता है.

जैव विविधता धऱती पर पूरे जीवन तंत्र को रचने वाले एक जाल की तरह है.
जैव विविधता धऱती पर पूरे जीवन तंत्र को रचने वाले एक जाल की तरह है.


इंसानो ने जिस तरह जंगल, ज़मीन, जानवर, जल और दूसरे जीवन को नष्ट किया है. इसी का नतीजा है कि आज हम इस हाल में आकर खड़े हो गए हैं. हमने जो उपभोग की इंतेहा की है उसकी वजह से आज हमें अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए 1.6 धरती की ज़रूरत है औऱ अगर यह ऐसे ही चलता रहा तो विश्वास कीजिए की इसका पूरी मानव सभ्यता (बाकी सभ्यताओं को तो हमने नहीं छोड़ा ), खाद्य श्रंखला औऱ स्वास्थ्य तंत्र धराशायी होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा.

जैवविविधता का खात्मा है कोरोना वायरस के पीछे
कोविड-19 जैसी महामारियों के पीछे की वजह ही यही है कि जब हमने जैव विविधता को नष्ट करना शुरू किया तभी से हमने उस तंत्र को समाप्त करना शुरू कर दिया, जो स्वास्थ्य तंत्र के लिए मददगार होता है. आज अगर हम देखें तो इसी कोरोना वायरस की भिन्न-भिन्न स्ट्रेन (किस्मों) से हर साल करीब 100 करोड़ लोग बीमार पड़ते हैं और लाखों लोगों की मौत हो जाती है. यही नहीं धरती पर इंसानों में होने वाली जितनी भी बीमारियां हैं उनमें से 75 फीसदी ज़ूनोटिक होती है.

क्या होती हैं ज़ूनोटिक बीमारियां
ज़ूनोटिक यानी ऐसी बीमारियां जो जानवरों से इंसानों में आती है. साधारण शब्दों में ऐसी बीमारियां जो जानवरों में पैदा होती है औऱ उनसे हम इंसानों के अंदर आ जाती है. दुनिया भर में फैली ये बीमारियां जो वायरस, बैक्टीरिया, फंगस, परजीवियों से होती है. वह हल्की से बहुत घातक तक हो सकती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इंसानों में होने वाली 60 फीसद से अधिक बीमारियां जानवरों से इंसानों में पहुंचती है. दरअसल, हमने जिस तरह धरती पर से तमाम तरह के जीवों को नष्ट करके उनकी जगह खुद ले ली या उन जीवों को दे दी जिन्‍हें हम चाहते थे. इस वजह से धऱती पर जैव की विविधता खत्म होती गई और जो जानवर इन वायरस, बैक्टीरिया या दूसरे बीमारी पैदा करने वाले जीवों को संभाल सकते थे, वे धरती पर नहीं रहे. इस तरह दूसरे होस्ट के तौर पर सूक्ष्म जीवों को अपना जीवन आगे बढाने के लिए जो जीवन चाहिए था, वह उन्हें हमसे मिलने लगा औऱ उन्होंने हमारे अंदर प्रवेश करना शुरु कर दिया. इस तरह दूसरे जीवों के बीमारियों कों संभालने की प्रक्रिया को ‘डाइल्यूशन इफेक्ट’ कहते हैं. हमने इसी डाइल्यूशन इफेक्ट को खत्म कर दिया.

ऐसी बीमारियां जो जानवरों में पैदा होती है औऱ उनसे हम इंसानों के अंदर आ जाती है.
ऐसी बीमारियां जो जानवरों में पैदा होती है औऱ उनसे हम इंसानों के अंदर आ जाती है.


कुछ सवाल औऱ उनके जैवविविधता से भरे जवाब
दुनिया भर में जिस स्तनपायी की सबसे ज्यादा तस्करी होती है उसका नाम है, पैंगोलिन. 30-100 सेमी लंबा पेंगोलिन एक रात्रिचर होता है, जो एशिया और अफ्रीका जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है. इसके ना तो दांत होते हैं औऱ ना ही यह तेजी से चल फिर सकता है, लेकिन इनके पास खुद को बचाने के लिए बहुत तगड़ा सुरक्षा तंत्र होता है. जैसे ही कोई शिकारी इन पर हमला करता है ये तुरंत खुद को गोलाकार रूप में बदल लेते हैं और इनके ऊपर लगे हुए पैने स्केल इनका बचाव करते हैं. इसका नाम भी एक मलय शब्द पेंगुलिंग से लिया गया है, जिसका मतलब होता है ऐसा कुछ जो गोल हो जाए. लगातार हो रहे जंगल के कटाव और इनके मीट और स्केल के लिए होने वाले शिकार की वजह से इनकी प्रजाति लुप्त होने लगी है. पेंगोलिन को ही कोरोना के फैलने के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है. दरअसल, इसे जिम्मेदार मानने से ज्यादा इसका ना होना इसकी वजह है, क्योंकि पेंगोलिन कई वायरस को अपने अंदर रख सकता था औऱ वे वायरस हम तक नहीं पहुंचते थे, लेकिन हमने पेंगोलिन को खत्म करके औऱ उनके संपर्क में आकर इन वायरस को अपने अंदर प्रवेश करवा दिया.

इंसानों के खाए जाने वाले पौधे जिनका परागण जानवर करते हैं
धरती पर पाई जाने वाली प्रमुख 115 खाने में इस्तेमाल आने वाली फसलों में से करीब 87 फसलों का परागण जानवरों के जरिये होता है. अगर जानवरों के परागण से होने वाली फसलों के योगदान को आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो इसकी कीमत हर साल करीब 20 हज़ार करोड़ डॉलर होगी. पक्षी, कीट-पतंगे तो आम परागण के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं, लेकिन इसके अलावा लेमूर जैसे बड़े जानवर भी परागण में भूमिका निभाते हैं. प्रकृति विविधता से भरे हुए पौधों की प्रजातियों का घर हुआ करती थी, लेकिन हम इंसानो ने यहां पर भी कब्जा जमा कर उन्ही फसलों का उत्पादन शुरू कर दिया, जो हमारे काम की थी या जिन्‍हें बाजार ने हमारे काम का बताया है. इस वजह से कई प्रजातियां समाप्ति की कगार पर पहुंच गईं औऱ इनका परागण करने वाले जीव भी खत्म होते गए, क्योंकि उनके लिए खाने की कमी होती जा रही है.

धरती पर 30 फीसदी जंगल हैं
धरती की एक तिहाई जगह जंगलों से घिरी हुई थी और यह धऱती पर पाए जाने वाले 80 फीसद जानवरों का घर हुआ करती थी. यह धरती की एक चौथाई आबादी के बराबर का पालन करती है औऱ औषधियां प्रदान करती है, दुनिया भर की कार्बन डाय ऑक्साइड को सोख कर धरती को सांस लेने के लायक बनाते हैं. अब हम इंसान हर साल 70 लाख हेक्टेयर जंगल को साफ करते जा रहे हैं. साथ ही इन जंगलों में रहने वाली प्रजातियों को भी नष्ट कर रहे है और नष्ट कर रहे हैं जैवविविधता.

धरती पर 4 फीसद ही हैं जंगली प्रजातियां
एक शोध के मुताबिक धरती पर 70 फीसदी पक्षियों से जुड़ी प्रजातियां वे हैं जिनका उत्पादन पोल्टी फार्मिंग में होता है. वहीं जंगली प्रजातियां महज 30 फीसदी ही रह गई हैं. इसी तरह से स्तनपायी को लेकर ये तस्वीर और भी भयानक हैं. धऱती पर जहां 60 फीसदी मवेशी जिनमें ज्यादातर मवेशी और सुअर है, वहीं 36 फीसदी इंसान हैं औऱ 4 फीसदी जंगली जानवर हैं और ये 36 फीसदी को 70 फीसदी पक्षी और 60 फीसदी मवेशी अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

84 फीसदी पौधों औऱ जानवरों की प्रजातियां लुप्त होने की कगार पर
विलुप्त होने वाली प्रजातियों से जुड़े एक सम्मेलन में 35,800 विलुप्त प्रजातियों की संरक्षण की बात की गई है जिसमें 30 हज़ार पौधे हैं. एक अनुमान के मुताबिक धरती पर 80 लाख पौधों औऱ जानवरों की प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनका खात्मा 1000 गुना तेजी से हो रहा है. खास बात यह है कि हम अभी तक धरती पर महज 10 फीसदी ही पौधों की प्रजातियों के बारे में जानते है.

इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि धरती पर खुद को सर्वोपरी, सर्वश्रेष्ठ, सर्वोच्च मानने वाले हम इंसान धरती के बारे में कितना जानते हैं. हमे लगता है कि इस धऱती पर रहने वाला हर प्राणी हमारी सेवा के लिए ही मौजूद है. इस दौरान हम यह भूल जाते हैं कि प्रकृति ने यहां सभी को एक-दूसरे की पूर्ति के लिए बनाया है. हम एक-दूसरे के बगैर नहीं रह सकते. हमें समझना होगा कि धरती पर रहने वाला हर प्राणी चाहे वह कितना भी छोटा या बड़ा क्यों ना हो उसे खुद की जिंदगी तय करने का अधिकार है. वक्त आ चुका है कि यह सच हम समझ लें या भुगतने के लिए तैयार रहें.

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