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संविधान की विकास गाथा : संविधान सभा ने 'राजद्रोह' शब्द क्यों हटाया?

Sachin kumar Jain | News18Hindi
Updated: February 4, 2020, 4:13 PM IST
संविधान की विकास गाथा : संविधान सभा ने 'राजद्रोह' शब्द क्यों हटाया?
आज 'राजद्रोह' की परिभाषा और क़ानून का सबसे ज्यादा गैर-जवाबदेह इस्तेमाल हो रहा है.

डेढ़ सौ साल पहले इंग्लैण्ड में ही सभा करना या जुलूस निकलना राजद्रोह करना माना जाता था. मुझे याद है कि एक मामले में एक न्यायाधीश की आलोचना पर भी यह लागू की गई थी.

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  • Last Updated: February 4, 2020, 4:13 PM IST
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आज़ाद भारत अभी तक समाज के लिए राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रवाद, राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रहित की जवाबदेह परिभाषाएं तय नहीं कर पाया है. यही कारण है कि अब भी 'राजद्रोह' की परिभाषा और क़ानून का सबसे ज्यादा गैर-जवाबदेह इस्तेमाल हो रहा है. बहुत ही सुनियोजित तरीके से 'राजद्रोह' को राष्ट्रवाद की गलत व्याख्या के जरिये 'राष्‍ट्रद्रोह' के पर्यायवाची के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि इतिहास बताता है कि सरकारों ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए राजद्रोह को राष्ट्रद्रोह के रूप में पेश किया है. सरकारों या राज्य व्यवस्था के विरुद्ध होने वाले आंदोलन राष्ट्र के विरुद्ध नहीं होते हैं. यह तथ्य भारत की संविधान सभा के सदस्य समझ रहे थे. यही कारण है कि संविधान सभा में एक भी सदस्य ने संविधान (Constitution) में 'राष्‍ट्रद्रोह' पर क़ानून बनाने के लिए सरकारों को अनियंत्रित अधिकार देने की वकालत नहीं की और राजद्रोह संबंधी प्रावधान संविधान में स्थान नहीं पा सका.

ऐतिहासिक तथ्य यह साबित करते हैं कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन व्यवस्था ने भारतीय समाज की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दमन के लिए राजद्रोह के वैधानिक प्रावधान को लागू किया था. लार्ड मैकाले ने वर्ष 1837 में दंड संहिता का प्रारूप बनाया था, जिसमें धारा 113 के अंतर्गत राजद्रोह के अपराध और इसके लिए आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया था. उनका मानना था कि सरकार के खिलाफ उत्तेजना या असंतोष फैलाने वाली अभिव्यक्ति को राजद्रोह के रूप में माना जाएगा. उन परिस्थितियों के मुताबिक़ भारत पर उपनिवेशवादी शासन करने वाली ब्रिटिश व्यवस्था का प्रतिरोध करना राजद्रोह था. इस प्रावधान पर स्वतंत्रता-पूर्व के दूसरे विधि आयोग के अध्यक्ष जान रोमिली ने टिप्पणी की थी कि ब्रिटेन में राजद्रोह के लिए तीन वर्ष की सजा का प्रावधान है, इसलिए भारत में 05 वर्ष से ज्यादा सज़ा का प्रावधान नहीं होना चाहिए.

वर्ष 1860 में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की रचना की गई
वर्ष 1860 में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की रचना की गई


वर्ष 1860 में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की रचना की गई, तब इसमें राजद्रोह के अपराध और सजा का उल्लेख नहीं था. इसके बारे में सर बार्नेस पीकाक ने लिखा कि 'आईपीसी में राजद्रोह की धारा का समावेश त्रुटिवश छूट गया है.' इसके बाद जेम्स स्टीफन से इस त्रुटि को सुधारने के लिए विशेष अधिनियम (17:1870) के जरिये आईपीसी में धारा 124-ए का समावेश करवाया. 1898 में भारतीय दंड संहिता (संशोधन) अधिनियम के माध्यम से धारा 124-ए में संशोधन किया गया. इसके माध्यम से राजद्रोह के लिए आजीवन निर्वासन या इससे कम की सज़ा का प्रावधान किया गया. साथ ही सरकार के प्रति घृणा और अवमानना करने की भावना फैलाने को भी इसकी परिभाषा में शामिल कर लिया गया. 1907 में वेस्ट मिनिस्टर पार्लियामेंट ने 'राजद्रोह करने वाली बैठक के प्रतिषेध का अधिनियम' लागू किया. इसका मकसद ऐसी बैठकों को आयोजित होने से रोकना था, जिनसे सरकार के खिलाफ कोई विद्रोह या प्रतिरोध पनप सकता था.

वास्तव में राजद्रोह के क़ानून के पीछे मकसद क्या था? इसका मकसद था राजनीतिक असहमति को क़ानून के जरिये कुचलना. इसके बहुत स्पष्ट उदाहरण उपलब्ध हैं. जोगेंद्र चंद्र बोस ने सहमति की उम्र विधेयक (एज आफ कंसेंट बिल, जिसमें लड़कियों द्वारा शारीरिक संबंध की सहमति देने की उम्र 10 से बढ़ाकर 12 वर्ष की गई) का विरोध किया, तो उन पर राजद्रोह की धारा लगा दी गई. बाल गंगाधर तिलक ने मराठा योद्धा शिवाजी का उदाहरण देकर ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हुए 'केसरी' में लेख लिखा, तो उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया. इसी तरह महात्मा गांधी, राम चंद्र नारायण और अंबा प्रसाद पर भी मुक़दमे चले. इन मामलों में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि जब तक वास्तव में सरकार के खिलाफ कोई विद्रोह या असंतोष भड़काने वाली कार्यवाही न हो, तब तक केवल लिखी या कही गई बात पर राजद्रोह का अपराध साबित नहीं होता है.

देशद्रोह शब्द का आशय संदेहात्मक है और इसका विभिन्न अर्थों में प्रयोग होता है.
देशद्रोह शब्द का आशय संदेहात्मक है और इसका विभिन्न अर्थों में प्रयोग होता है.


भारतीय संविधान सभा में मूलभूत अधिकारों पर 01 दिसंबर, 1948 को बहस जारी थी. इसमें अनुच्छेद 13 पर बहस हो रही थी. जिसमें विषय यह था कि किन परिस्थितियों में मूलभूत अधिकारों के होते हुए भी सरकार क़ानून बनाने के लिए स्वतंत्र होगी. इस प्रावधान में प्रस्ताव था कि 'अनुच्छेद 13 के खंड 1 (उपखंड क) की किसी बात से अपमान-लेख, अपमान-वचन, मानहानि, शील अथवा शिष्टता का खंडन करने के अपराध तथा राजद्रोह अथवा किसी अन्य ऐसे विषय से सम्बद्ध किसी वर्तमान क़ानून पर प्रभाव और किसी नए क़ानून के बनाने के लिए अवरोध न होगा.' यानी सभा में प्रस्तुत संविधान के प्रारूप में 'राजद्रोह' का उल्लेख था. इस अनुच्छेद पर 'राजद्रोह' शब्द निकालने के लिए के. एम. मुंशी ने संशोधन (86) प्रस्तुत किया. उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि 'राजद्रोह के स्थान पर राज्य की सुरक्षा को दुर्बल करने वाली अथवा राज्य के उन्मूलन प्रवृत्ति वाली' शब्दावली रखी जाए, देशद्रोह शब्द का आशय संदेहात्मक है और इसका विभिन्न अर्थों में प्रयोग होता है. यह इस सभा के सदस्यों के लिए ही नहीं, बल्कि संसार से सभी न्यायालयों के लिए संदेह का कारण रहा है. इसकी परिभाषा बहुत साधारण है, यह बहुत पहले वर्ष 1868 ई. में की गई थी. जिसमें कहा गया कि 'राजद्रोह में ऐसा सब व्यवहार शामिल है, चाहे उसका शाब्दिक रूप हो अथवा कार्यरूप हो, अथवा लिखित रूप हो, जिसका उद्देश्य राज्य के अक्षोभ को भंग करना हो अथवा अंजान लोगों को राज्य का उन्मूलन करने के लिए प्रेरित करना हो.'डेढ़ सौ साल पहले इंग्लैण्ड में ही सभा करना या जुलूस निकलना राजद्रोह करना माना जाता था. मुझे याद है कि एक मामले में एक न्यायाधीश की आलोचना पर भी यह लागू की गई थी. तब से लोकमत बहुत कुछ बदला गया है और चूंकि अब हमारा शासन जनतंत्रात्मक है, हमें शासन की आलोचना का स्वागत करना चाहिए और उसमें और इस प्रकार की उत्तेजना फैलाने में हमें विभेद करना चाहिए. वास्तव में जनतंत्र का प्राण ही सरकार की आलोचना है. भारत के मुख्य न्यायाधीश ने लिखा कि 'राजद्रोह इस कारण अपराध नहीं माना गया है कि ऐसा करने से सरकारों और क़ानून के जर्जरित अहंकार की क्षतिपूर्ति होती है. बल्कि इसलिए कि सरकार और क़ानून के प्रति निष्ठा नहीं दिखाई गई है, क्योंकि अगर उनका आदर नहीं किया गया, तो केवल अराजकता ही फ़ैल सकती है. इस तरह लोक दुर्व्यवस्था या इसकी तर्कयुक्त आशा या संभावना ही इस अपराध का सार है. जिन कार्यों या शब्दों के संबंध में आपत्ति की गई हो, उनसे या तो दुर्व्यवस्था के लिए उत्तेजना उत्पन्न होनी चाहिए या तर्कपूर्ण लोगों की दृष्टि में उनका उद्देश्य या इस तरह की प्रवृत्ति होनी चाहिए.'

केवल अभिव्यक्ति से ही राजद्रोह साबित नहीं होगा, बल्कि यह देखना होगा कि उसकी मंशा क्या है
केवल अभिव्यक्ति से ही राजद्रोह साबित नहीं होगा, बल्कि यह देखना होगा कि उसकी मंशा क्या है


इस विषय पर सेठ गोविंद दास ने कहा कि 'सभा को यह ध्यान रहना चाहिए कि इस फौजदारी की धारा 124-ए का इस्तेमाल बहुत गहराई के साथ लोकमान्य गंगाधर तिलक को सज़ा देने के लिए किया गया था. मुझे अपनी व्यक्तिगत बात भी कहनी है. मैं एक ऐसे कुटुंब से आता हूंं जो मध्यप्रांत में राजभक्ति (यानी अंग्रेजी शासन की भक्ति) के लिए प्रसिद्द था. हमारे यहां खिताब पाने की परंपरा थी. मेरे दादा को राजा का खिताब मिला हुआ था. मेरे चाचा और पिता दीवान बहादुर थे. मुझे आज बहुत ख़ुशी है कि अब इस देश में कोई खिताब मिलने वाला नहीं है, लेकिन ऐसे कुटुंब से आने पर भी मुझ पर 124-ए का मुकदमा चलाया गया. अंग्रेज़ सरकार ने 1857 में अंग्रेज़ सरकार की मदद करने के लिए मेरे परदादा को हीरों से जड़ा सोने का कमरपट्टा दिया था. इस पर लिखा था –1857 में ग़दर के दौरान दी गई सेवाओं, सम्मान में प्रदत्त. मैंने 1930 में सत्याग्रह आंदोलन के दौरान अपने भाषण में कहा कि मेरे परदादा ने विदेशी सरकार को मदद देने के लिए यह कमरपट्टा पाया. ऐसी सरकार को मदद देकर उन्होंने पाप किया था और अब मैं उस पट्टे पर यह खुदवाना चाहता हूँ कि जिस सरकार को स्थापित करने के लिए उन्होंने 1857 में सहायता देकर पाप किया था, उस पाप का प्रायश्चित उनके पड़पोते ने उस सरकार को उखाड़ने का प्रयत्न करके किया. इस कारण मुझ पर धारा 124-ए के तहत मुकदमा चला और दो साल की सज़ा हुई.

इसका मतलब स्पष्ट है कि केवल अभिव्यक्ति से ही राजद्रोह साबित नहीं होगा, बल्कि यह देखना होगा कि उसकी मंशा क्या है और ऐसी बात कहने-करने वाले की प्रवृत्ति क्या है? सरदार हुकुम सिंह ने कहा था कि 'इस प्रावधान में राज्य को राजद्रोह, अपमान-वचन, अपमान लेख आदि के संबंध में किसी तरह का क़ानून बनाने की असाधारण शक्ति दे दी गई है. ऐसे में अमेरिका जैसे देशों में सर्वोच्च न्यायालय ही सारी परिस्थितियों और वातावरण को ध्यान में रखकर निर्णय कर सकता है कि वैयक्तिक स्वतंत्रता की पर्याप्त रक्षा हुई है या नहीं. विधान-मंडल ने नागरिक के स्वातंत्र्य के संबंध में हस्तक्षेप किया है या नहीं........13 (1-क) में भाषण की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया और 13 (2) में विधान मंडल को किसी भी अधिनयम को बनाने की शक्ति देकर इसे नियंत्रित कर दिया गया. 13 (3) में लोक व्यवस्था के हित में क़ानून बनाने की व्यवस्था है. फिर 13 (4) से 13 (6) में भी जन-साधारण के हित में इन स्वतंत्रताओं को आमंत्रित करने के लिए क़ानून बनाने के प्रावधान हैं. क़ानून बनाने के संबंध में यह निर्णय कौन करेगा कि यह जनसाधारण के हित में है, या लोक-व्यवस्था के हित में या फिर उसका संबंध ऐसे विषय से है, जो राज्य के प्राधिकार या आधार को जर्जर करता है.'

संविधान सभा यह विचार कर रही थी कि सरकार को राजद्रोह के आवरण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का संवैधानिक अधिकार न मिल जाए.
संविधान सभा यह विचार कर रही थी कि सरकार को राजद्रोह के आवरण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का संवैधानिक अधिकार न मिल जाए.


ऐसे में जब सर्वोच्च न्यायालय ऐसे मामलों में विचार करेगा तो यही माना जाएगा कि विधान मंडल का विश्वास था कि यह क़ानून 'लोक-व्यवस्था के हित में है.' राजद्रोह के संबंध में न्यायाधीश केवल यह देखेंगे कि या 'न्यायिक' है या नहीं, उनका कर्तव्य यह नहीं रह जाएगा कि वह यह देखें कि जो प्रावधान रखे गए हैं, वे कहीं दमनशील या अन्यायपूर्ण तो नहीं हैं. यदि हमने 13 (2) के अंतर्गत रखा प्रावधान उसी रूप में रहने दिया, तो नागरिकों को राजद्रोह के संबंध में किसी भी क़ानून को गैर-कानूनी घोषित करने का अवसर ही नहीं मिलेगा, चाहे वह कितना ही दमनशील क्यों न हो? न्यायालय केवल इस दिशा में विचार करने के लिए बाध्य हो जाएगा कि संविधान के अधीन संसद को राजद्रोह के संबंध में किसी प्रकार के भी क़ानून बनाने का अधिकार दिया गया है और उसने ऐसा ही किया है.'

इसी विषय पर पंडित ठाकुर दास भार्गव ने कहा कि इस प्रावधान में- 'किसी नए क़ानून के बनाने के लिए अवरोध न होगा' - के स्थान पर 'न्यायोचित क़ानून बनाने के लिए अवरोध न होगा' - रखा जाए. संविधान सभा सजगता के साथ यह विचार कर रही थी कि कहीं सरकार को राजद्रोह के आवरण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का संवैधानिक अधिकार न मिल जाए. मसला यह भी था कि क्या ब्रिटिश व्यवस्था द्वारा बनाए गए कानूनों के हटाए बिना, स्वतंत्र भारत की व्यवस्था बनाई जा सकती थी? पंडित ठाकुर दास भार्गव का कहना था कि जब तक ये आपत्तिजनक शब्द न निकाले जाएंगे और जब तक वर्तमान कानूनों को बिना उसकी किसी न्यायालय में जांच कराए हुए जारी रखा जाएगा, तब तक देश की स्थिति बहुत असंतोषजनक रहेगी. मैं वर्तमान क़ानून की और यह बताने के लिए संकेत कर रहा हूँ कि वह आपत्तिजनक हैं और अगर उसका क़ानून के सामान ही प्रभाव रहा तो मूलाधिकारों को प्रदान करने का कोई लाभ नहीं होगा.

इस पर डा. भीम राव अंबेडकर का कहना था कि 'मेरे मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव ने मसौदा-समिति की बहुत बड़ी आलोचना की और उसे इसके लिए दोषी ठहराया कि वह वर्तमान कानूनों की रक्षा करने में बहुत आगे बढ़ गई है. मेरी समझ में नहीं आता कि वह मसौदा समिति से क्या चाहते हैं? क्या वह चाहते हैं कि हम सीधे-सीधे यह कह दें कि जिस दिन से संविधान अस्तित्व में आएगा, सभी वर्तमान क़ानून समाप्त हो जाएंगे? महबूब अली बेग साहब बहादुर ने कहा कि '.....जब राज्य को शक्ति देने के संबंध में प्रावधान हैं, तो न्यायालय का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है, क्योंकि न्यायाधीश यह कहेंगे कि जब संविधान ही में विधान मंडल को नागरिकों के अधिकारों के अपहरण करने, उनको नियंत्रित करने और सीमित करने का अधिकार दिया गया है, तो वह क़ानून के या व्यवस्था के औचित्य पर या अनौचित्य पर विचार नहीं कर सकते.'

सरकार पर हर तरह के आक्रमण को क़ानून के अंतर्गत अपराध नहीं बनाना चाहिए. ह
सरकार पर हर तरह के आक्रमण को क़ानून के अंतर्गत अपराध नहीं बनाना चाहिए.


02 दिसंबर, 1948 को एम. अनन्तशयनम आयंगर ने कहा कि 'राजद्रोह शब्द को हटा दिया गया है. अगर हमको यह विदित हो जाए कि उस समय की सरकार का यह स्वभाव हो गया है कि वह अपनी सत्ता स्थापित बनाए रखे, चाहे उसका प्रशासन कितना ही बुरा हो, तो देश के हर व्यक्ति का यह मौलिक अधिकार होना चाहिए कि वह अहिंसात्मक तरीके से लोगों को प्रेरित करके, प्रशासन में उसके दोष प्रकट करके, उसकी कार्यविधि में दोष प्रकट करके और दूसरे तरीकों से उस सरकार को उखाड़ फेंके. हमने इसलिए राजद्रोह शब्द को हटाया है, ताकि जब समूचे राज्य को उखाड़ फेंकेने के लिए या शक्ति द्वारा या अन्य तरह से नष्ट करने, जिससे दुर्व्यवस्था उत्पन्न हो जाए, तभी यह लागू हो, लेकिन सरकार पर हर तरह के आक्रमण को क़ानून के अंतर्गत अपराध नहीं बनाना चाहिए. हमने यह निश्चित कर दिया है कि कोई भी सरकार अपनी हिफाज़त में कोई दंड-कार्यवाही तब तक न करे, जब तक कि भाषणों द्वारा समूचे राज्य को उखाड़ फेंकने का प्रयास न किया जा रहा हो.'

बहरहाल, बाद में संविधान सभा में इस अनुच्छेद को स्वीकार किया कि जैसे ही स्वतंत्र भारत का संविधान अस्तित्व में आएगा, उस दिन से वे सभी क़ानून शून्य हो जाएंगे, जो मूल अधिकारों से असंगत हैं या उन्हें सीमित करते हैं, लेकिन अब तक राजद्रोह के प्रावधान बने हुए हैं. वास्तव में 'राजद्रोह' के विषय पर हुई बहस और सामने रखी गई शंकाओं से यह साफ़ नज़र आता है कि संविधान में यह प्रावधान होना चाहिए था कि संविधान लागू होने से पहले से जारी सभी कानूनों की संविधान सम्मत समीक्षा की जाएगी. बाद के वर्षों में कुछ ख़ास कानूनों के संबंध में समीक्षा हुई है, लेकिन आईपीसी में शामिल 'राजद्रोह' के प्रावधान हो नहीं हटाया गया, जबकि संविधान सभा ने संवैधानिक प्रावधान में से तार्किक ढंग से हटाने का निर्णय लिया था.

 

संविधान सभा ने 'राजद्रोह' की अवधारणा को बिल्‍कुल अलग रूप में परिभाषित करके संविधान में शामिल न करने का निर्णय लिया था
संविधान सभा ने 'राजद्रोह' की अवधारणा को बिल्‍कुल अलग रूप में परिभाषित करके संविधान में शामिल न करने का निर्णय लिया था.


संविधान सभा ने 'राजद्रोह' की अवधारणा को बिल्‍कुल अलग रूप में परिभाषित करके संविधान में शामिल न करने का निर्णय लिया था. संविधान सभा ने 'राजद्रोह' की अवधारणा को बिल्‍कुल अलग रूप में परिभाषित करके संविधान में शामिल न करने का निर्णय लिया था, मगर कई दशक गुज़र जाने के बाद भी भारतीय दंड संहिता में धारा 124-ए विद्दमान है. यह धारा कहती है कि जो कोई भी भारत सरकार के विरोध में सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी गतिविधि को अंजाम देता है, सरकार विरोधी सामग्री लिखता-बोलता है, ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, राष्ट्रीय चिन्ह का अपमान करता है या संविधान को नीचा दिखाने की कोशिश करता है, तो उस पर धारा 124-ए के तहत मुकदमा किया जा सकता है और 3 साल उम्र कैद तक की सज़ा दी जा सकती है. ऐसी गतिविधि के खतरों को किन मानकों पर मापा जाएगा, यह सरकार की व्यवस्था की इच्छा और मंशा पर ही निर्भर करता है. संविधान सभा ने राजद्रोह शब्द इसलिए हटाया था, क्योंकि उन्हें यह अहसास हो गया था कि इसका उपयोग सरकारें शांतिपूर्ण आंदोलनों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बंदी बनाने में करेंगी. तानाशाही में विश्वास रखने वाली सरकारें इसका उपयोग जनतांत्रिक मूल्यों को कुचलने के लिए करेंगी. बहरहाल भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राजद्रोह के हर मामले को व्यापक नज़रिए से देखा और परिभाषित किया है, इसके उलट कार्यपालिका ने राजनीतिक हितों के संरक्षण के लिए इसका दुरूपयोग किया है.

नोट - यह वक्त भारत को भारत के संविधान से परिचित कराने का है. इस संविधान से परिचित होने के लिए इसकी पटकथा, इसकी पृष्ठभूमि से साक्षात्कार करना एक अनिवार्यता है. भारतीय संविधान की विकास गाथा को समाज के समक्ष लाने के लिए हमने एक श्रृंखला शुरू की है. इसमें संविधान निर्माण के उन अनछुए पहलुओं पर आलेख होंगे, जिन्हें अब तक विस्मृत किया गया है, जिनकी उपेक्षा की गई है. संविधान को आत्मार्पित किए हुए अब 70 वर्ष गुज़र गए हैं, लेकिन समाज ने इसे अपनाया नहीं है. आज भारत और भारतीयता के वजूद को संरक्षित करने के लिए संविधान लोक शिक्षण अभियान की महती आवश्यकता है. आशा है कि "भारतीय संविधान की विकास गाथा" के लेखक सचिन कुमार जैन द्वारा news18 के लिए विशेष रूप से लिखी गई श्रृंखला को उपयोगी पाएंगे.

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First published: February 3, 2020, 2:15 PM IST
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