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त्याग करने वाली ‘बंदिनी’ को भी ‘मिली’ जैसा साथी मिले...

News18Hindi
Updated: February 4, 2020, 1:18 PM IST
त्याग करने वाली ‘बंदिनी’ को भी ‘मिली’ जैसा साथी मिले...
घरेलू कामकाज से लेकर पानी लाने तक हर जगह औरतें दिन भर पानी में डूबी रहती है और इसी वजह से उन पर आर्सेनिक का ज्यादा असर साफ नज़र आता है.

भले ही औरतों की पहचान उनके नाम से ज्यादा फलाने की बीवी या अलाने की मां से हो लेकिन आर्सेनिक की मार सबसे ज्यादा यही महिलाएं झेल रही हैं.

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  • Last Updated: February 4, 2020, 1:18 PM IST
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बिमल दा की अद्भुत क्लासिक फिल्म ‘बंदिनी’ कई रूपकों को एक साथ जीती है. फिल्म की कहानी एक जेल से शुरू होती है जहां एक औरत को तपेदिक हो गया है और कोई उसके पास फटकना नहीं चाहता. तभी जेल में हत्या की सजा भुगत रही कल्याणी उसकी सेवा करने को राज़ी हो जाती है. उसके सेवाभाव को देखकर ही जेल का डॉक्टर उसकी तरफ आकर्षित होता है. वो उससे शादी करना चाहता है. फिल्म में कई उतार चढ़ाव आते हैं जो कल्याणी को अपने अतीत में खींच कर ले जातें हैं.

फिल्म आजादी के पहले के परिदृश्य को दिखाती है जब कल्याणी एक चंचल लड़की है जो अपने पोस्टमास्टर पिता के साथ गांव में रहती है. वहीं विकाश नाम का एक शख्स पहुंचता है जो आजादी की लड़ाई लड़ रहा है. कल्याणी उसकी तरफ आकर्षित हो जाती है लेकिन किसी कारणवश विकाश को गांव छोड़कर जाना पड़ता है. उसके बाद गांववालों के ताने भी कल्याणी को ही सुनने पड़ते हैं जिससे आजिज आकर वो गांव छोड़ देती है और शहर में एक अस्पताल में काम करने लगती है.

यहां कल्याणी को हिस्टीरिया से ग्रसित एक महिला की तीमारदारी का काम मिलता है. कालान्तर में उसे पता चलता है कि ये महिला विकाश की पत्नी है. कल्याणी उसकी तकलीफ को देखते हुए उसे जहर दे देती है और उसे जेल हो जाती है. यहीं पर उसे डॉक्टर मिलता है. बाद में डॉक्टर की मां कल्याणी को अपनी बहु बनाने को राजी हो जाती है. कल्याणी के अच्छे बर्ताव और सेवाभाव को देखते हुए उसे जेल से रिहा कर दिया जाता है. वो जेल वॉर्डन के साथ जब रेल में बैठकर डॉक्टर के घर जा रही होती है तब उसे विकाश मिलता है जो एक छुआछूत की बीमारी से ग्रसित है और मरने की स्थिति में है.

स्टीमर की आवाज होती है और बंदिनी अपने सजे सजाए भविष्य को छोड़ कर विकाश के साथ जाना तय करती है. यहां बंदिनी की कहानी को इतने विस्तार में बताने की मंशा सिर्फ एक ही है. कल्याणी को एक सेवाभाव रखने वाली महिला के तौर पर दिखाया गया है जो दरअसल बंदिनी है. फिल्म में जेल एक रूपक है. यहां तक कि जब कल्याणी अपने जीवन का अंतिम फैसला खुद लेती है तब भी वो सेवा का ही चुनाव करती है. समाज को फिल्म बहुत लुभाती है. क्योंकि औरत ने अपने त्यागधर्म को निभाया. हम औरत को इसी रूप मे देखना चाहते हैं.



अब आपको बलिया के एक गांव में लेकर चलते हैं. गांव का नाम है उदवन छपरा. यहां पर खेत में काम करती हुई रुपवती मिल जाएगी. रूपवती सुबह से लेकर शाम तक कभी किचिन में, कभी बाथरूम में, कभी हैंडपंप पर तो कभी खेत में पानी के बीच नज़र आती है. उसका पानी में रहना मजबूरी है क्योंकि घर का काम उसे ही करना है. इसी काम के चलते उसके शरीर पर छाले से हो गए हैं. क्योंकि गंगा के किनारे बसे इन गांवों में भूजल में आर्सेनिक ने अपना खतरनाक असर दिखाना शुरू कर दिया है.

रूपवती कभी साड़ी के आंचल से, तो कभी कोई दूसरे तरीके अपना कर अपने छालों को छिपाती है. वजह साफ है औरत के शरीर पर दाग अच्छे नहीं लगते हैं. रुपवती धीरे-धीरे कैंसर की तरफ बढ़ रही है. ऐसा नही है कि गांव के लोग ये बात जानते नहीं है. गांव में आर्सेनिक का प्रकोप है ये बात बलिया क्षेत्र में अच्छी तरह फैल चुकी है. इसका ही असर है कि गांव में आर ओ वॉटर के बड़े बड़े प्लांट लग गए हैं. पानी का एक समृद्ध बाजार खड़ा हो गया है लेकिन गांव में पानी में रहने वाली औरत को अपना काम करना ही है. पास के ही दूसरे गांव उदवन छपरा में रहने वाली कलावती अपने बिस्तर से उठ नहीं सकती है.उसने अपने हिस्से का काम कर लिया है और अपने हिस्से का कैंसर भी ले लिया है. लेकिन आज वो अकेली है उसकी तीमारदारी करने वाला कोई नहीं है. वो अब परिवार के लिए किसी काम की नहीं है. वहीं गांव के ही एक शख्स लेखूलाल के शरीर पर भी फफोले फूट गए हैं. लेकिन कलावती और लेखूलाल के कैंसर में एक अंतर है. लेखूलाल की देखरेख उसकी पत्नी कर रही है. बच्चे भी उसकी तीमारदारी में लगे रहते हैं.

औरत हैं ज्यादा पीड़ित
इन गांवों में घूमते हुए अगर किसी छोटे बच्चे, जवान या किसी बुज़ुर्ग से भी किसी महिला का नाम पूछेंगे तो कोई नहीं बता पाएगा कि किस महिला की बात हो रही है. सभी का एक ही सवाल होता है किसकी पत्नी है या किसकी मां है. यहां तक कि कुछ बच्चे तो हंसते हुए यह तक बोलते हैं कि औरत का नाम कौन जानता है.

भले ही औरतों की पहचान उनके नाम से ज्यादा फलाने की बीवी या अलाने की मां से हो लेकिन आर्सेनिक की मार सबसे ज्यादा यही महिलाएं झेल रही हैं. हरिहरपुर हो या उदवन छपरा या गंगा पट्टी पर मौजूद आर्सेनिक से प्रभावित बाकी के गांव, ज्यादातर पीड़ित संख्या महिलाओं की ही है क्योंकि घरेलू कामकाज से लेकर पानी लाने तक हर जगह औरतें दिन भर पानी में डूबी रहती है और इसी वजह से उन पर आर्सेनिक का ज्यादा असर साफ नज़र आता है.

पुरुषों के शहर चले जाने के बाद अब तो खेतों में पानी देने तक का काम औरतों के जिम्मे आ गया है जिस वजह से रूपकली देवी हो या रमावती, आर्सेनिक से उभरे फफोले महिलाएं ही अपने पल्लू के भीतर छिपाने को मजबूर हैं. खास बात यह है कि औरत के सौंदर्य को देखने वाले हमारे समाज को औरत के शरीर पर उभरे फफोले बदसूरत तो लगते हैं लेकिन उसके पीछे की वजह नजर नहीं आती है. इसलिए गांवों में शादियों में भी खासी परशानी है.

बलिया से 200 किलोमीटर की दूरी पर सोनभद्र है. उत्तरप्रदेश का सोनभद्र जिला जिससे भारत के चार राज्यों की सीमा जुड़ती है. सिंगरौली का यह क्षेत्र जहां थर्मल पॉवर प्लांट है, हिंडाल्को जैसे उद्योग हैं और कई तरह की लगातार चलती फैक्ट्रियां हैं जो भारत के विकास की इबारत लिखती नज़र आती है. यहां चारों तरफ फैले घने जंगलों को देखकर पहली बार आने वाले का मन बाग बाग हो जाएगा. इन्हीं जगलों के बीच लगभग 400 से ज्यादा छोटे-बड़े गांव हैं. इन्हीं गांवो में से एक गांव है कुसमाहा. यहां के एक बड़े से घर में एक अलग कमरा है.

कमरे में दिन में भी अंधेरा है, सावित्री देवी इसी अंधेरे कमरे में खाट पर चादर ओढ़ कर लेटी हुई है. चारों तरफ भिनभिनाती हुई मक्खियों की आवाज़ कमरे में फैले सन्नाटे में शोर की तरह सुनाई दे रही है. लेकिन सावित्री देवी के लिए शायद यही शोर है जो संगीत भी है और जीने का सहारा भी. सावित्री देवी की दुनिया पिछले 18 सालों से एक कमरे में बिछी हुई खाट तक सिमट कर रह गई है. सावित्री भी गांव के उन दूसरे लोगों की तरह ही है जो थर्मल पॉवर प्लांट से फैलाए जा रहे प्रदूषण की शिकार है.

पानी में रिसते और हवा में घुलते इस प्रदूषण की वजह से घने जंगलो के बीच बसे इन गांवों की आबादी फ्लोरोसिस से लेकर कैंसर से पीडित है. ज्यादा हालत महिलाओं की ही खराब है क्योंकि झुकी कमर के साथ औरत को कोई देखना नहीं चाहता है. ऐसी औरत न तो किसी काम की है और न ही उसमें सौंदर्य बोध है, और सावित्री जो कैंसर से पीड़ित है उसके लिए स्थिति और बुरी है क्योंकि उसकी देखरेख करने वाला कोई भी नहीं है. वो बस इंतजार कर रही है कि कब जिंदगी उसे अलविदा कहे.

मानसिक तनाव और प्रदूषण कैंसर की एक अहम वजह
अलद अलग शोध में सामने आया है कि दस सबसे ज्यादा होने वाले कैंसर के प्रकार जिसमें प्रोस्टेट कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, लंग कैंसर, किडनी कैंसर, ब्लैडर कैंसर, कोलोरेक्टल कैंसर, मेलेनोमा, एंडोमेट्रियल कैंसर, थायरॉइड और ओरल कैंसर में से 50 फीसदी में किसी न किसी तरह की मानसिक स्थिति में खराबी पाई गई. शोध बताती है कि कैंसर से जुड़ी बीमारियों के साथ अगर मनोवैज्ञानिक तकलीफ हो तो ऐसे मरीजों को ज्यादा सहारा देने की जरूरत होती है.

महिलाओं के मामले में अक्सर देखने को मिलता है कि प्राथमिक तौर पर उनकी खुद के प्रति लापरवाही, परिवार का भी ध्यान नहीं देना और अपने अंदर तकलीफ को दबाए रखना परिस्थितियों को और जटिल बना देता है. दरअसल किसी भी प्रकार के मानसिक तनाव का शरीर की रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता पर विपरीत असर पड़ता है जिसकी वजह से कैंसर से लड़ने की क्षमता कमजोर हो जाती है और बीते दिनों पर्यावरण ने हालात को और बिगाड़ कर रख दिया है.

चूंकि तनाव और प्रदूषण शरीर के हॉर्मोन को असंतुलित करते हैं जिसका सीधा असर हमारी बॉडी के सेल्स पर पड़ता है और वो अनियंत्रित रूप से बढ़कर कैंसर का रूप धारण कर लेती है. एक रिसर्च में आशंका जाहिर की गई है कि 2020 तक हर साल स्तन कैंसर से मरने वाली महिलाओं की संख्या करीब 76,000 तक हो सकती है. खानपान, प्रदूषण और मानसिक तनाव भी महिलाओं में बढ़ते स्तन कैंसर का कारण हैं.



मनोवैज्ञानिक सहारा देने के फायदे
कैंसर के मरीजों को नकारात्मकता से बचाना बेहद जरूरी होता है क्योंकि ऐसी स्थिति दिमागी रोगों से और बढ़ जाती है. ऐसे रोगियों से अगर रोजाना एक घंटा सकारात्मक बात की जाए तो मानसिक तौर पर स्थिति ठीक होने से दवाएं भी 60 फीसदी तक ज्यादा असर करती हैं. लेकिन आमतौर पर देखा गया है कि महिलाओं के तनाव को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं जाता है. वो भी ऐसे हालात में जीने की आदि हो जाती हैं. इसी की वजह से स्थितियां बद से बदतर होती जाती है.

ये भी देखा जाता है कि अगर महिला कभी तनाव से जुड़ी हुई बात कहे भी तो उसे ये सुनने को मिलता है कि तुम्हें किस बात का तनाव है. घरेलू महिलाओं को इस स्थिति से ज्यादा दो चार होना पड़ता है. उन्हें अक्सर ये बात सुननी पड़ती है कि वो तो दिन भर घर में रहती है उन्हें किस बात का तनाव. हमने तनाव को बाहर जाने, पैसा कमाने, नौकरी करने से जोड़ दिया है. ऐसा नहीं है कि वहां तनाव नहीं है लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं है कि घर में रहने वाली महिला तनाव की शिकार नहीं है बल्कि एक जैसी जिंदगी जीने की वजह से कई बार उनकी जिंदगी में ज्यादा तनाव होते हैं.

यही नहीं कई जगह पाया गया है कि कैंसर से जूझ रही कई महिलाओं में कीमोथेरेपी से शरीर पर पड़ रहे असर की वजह से भी तनाव देखने को मिला है. मुझे याद है एक बार मेरी एक दोस्त की मां को पेंक्रियाटिक कैंसर हो गया था. वह अपने अंतिम वक्त में थी. जब मैं उनसे मिलने अस्पताल पहुंचा तो वहां पर उन्हें खून देने के बारे में कुछ चर्चा चल रही थी. बाद में जानकारी मिली की उन्हें खून की ज़रूरत है लेकिन साथ ही डॉक्टर ने ये भी कहा था कि हो सकता है उससे वो कुछ घंटे और जी जाएं. उनके बेटे पहले ही खून दे चुके थे, बेटियां और पापा खून देने की स्थिति में नहीं थे.

बाकि लोग इसलिए आनाकानी कर रहे थे कि अब खून देकर क्या फायदा. मुझे दोस्त के पिताजी दिखे, मुझे बस ये लगा कि शायद ये आखिरी कुछ घंटे अंकल की जिंदगी के लिए सहारा बने रहें, खैर, मैंने खून दिया, आंटी 72 घंटे जिंदा रही, अंकल उनके पास बैठे रहे और फिर आंटी चली गईं. मुझे नहीं मालूम वो मेरे खून देने की वजह से उतना वक्त रहीं या उनकी जिंदगी के उतने पल बाकी थे. लेकिन आज सोचता हूं तो लगता है कि अगर फर्ज करें कि वहां आंटी की जगह अंकल होते तो शायद स्थिति थोड़ी सी अलग होती. तब खून मिल जाता और शायद ये कहकर दे दिया जाता कि बेचारी को कुछ देर और पति का साथ मिल जाएगा. आप सोच सकते हैं कि मैं बहुत काल्पनिक बात कर रहा हूं और शायद ऐसा नहीं होता.

लेकिन समाज के बहुत सारे दृश्य मिलकर एक परिदृश्य तैयार करते हैं. हमारा समाज हमेशा से औरत के रूप में बंदिनी चाहता है, उसे सराहता है, उसके सेवा-भाव की भूरी-भूरी प्रशंसा भी करता है. लेकिन हमें ये सोचना चाहिए कि बंदिनी कभी मिली (‘मिली’ फिल्म की नायिका जो कैंसर से पीड़ित है और नायक ये जानते हुए भी उसके साथ शादी करता है और उसका इलाज करवाता है) भी हो सकती है. और उस वक्त उसे कोई ऐसा साथ चाहिए होता है जो उसे बस प्यार करे. जो बस उसके करीब रहे और उसके माथे पर हाथ रख कर ये कहे कि तुम चिंता मत करो तुम्हे कुछ नहीं होगा.

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First published: February 4, 2020, 1:18 PM IST
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