विश्व तंबाकू निषेध दिवस: क्या फ़िक्र धुएं में उड़ती है या बढ़ती है?

विश्व तंबाकू निषेध दिवस: क्या फ़िक्र धुएं में उड़ती है या बढ़ती है?
धूम्रपान इंसान के इम्यून सिस्टम को तेजी से कमजोर करता है.

विश्व तंबाकू निषेध दिवस (World No Tobacco Day): इस कहानी का लब्बोलुआब यही है कि सिगरेट आपकी जिंदगी ही नहीं आपके परिवार की जिंदगी भी छीन लेती है साथ ही आप कई बार एक जीती जागती लाश बन कर रह जाते हो जिसके पास जान तो है लेकिन आत्मा नहीं है .

  • Share this:
विश्व तंबाकू निषेध दिवस (World No Tobacco Day): हाल ही में आई वेबसीरीज़ पंचायत में, सचिव के पद पर नियुक्त हुए शहर से आए हुए नायक को एक काम सौंपा जाता है. जिसके तहत उसे गांव भर में जनसख्या नियंत्रण को लेकर कुछ पंक्तियां लिखवानी है. ऐसी ही एक पंक्ति है – दो बच्चे होते खीर,उसके बाद बवासीर . इस पंक्ति पर गांव वालों को आपत्ति हो जाती है, जो एक विवाद में बदल जाती है. लेकिन जब सरकारी विभाग इस पंक्ति को हटाने के लिए राजी नहीं होता है तो सचिव परेशान हो जाता है. सचिव को उसके ऊपर के अधिकारी कहते हैं कि ये पंक्ति जानबूझकर लोगों को चिढ़ाने के लिए ही लिखी गई है जिससे वो दो बच्चों से ज्यादा को लेकर बुरा महसूस करें. सचिव औऱ सरपंच जब इस पंक्ति को नहीं हटाने को लेकर राजी होते हैं तो सचिव वार्ड, ब्लॉक प्रमुख को समझाता है कि जिस तरह सिगरेट के डब्बे पर गंदी सी तस्वीर इसलिए बनाई जाती है ताकि लोग उसे देख कर सिगरेट से तौबा करें ठीक उसी तरह इस पंक्ति का इस्तेमाल भी हम चिढ़ाने के लिए कर रहे हैं.


लेकिन क्या ऐसा वाकई होता है, तमाम नारों, विचारों के बाद जिस तरह जनसंख्या बढ़ती गई उसी तरह सिगरेट पर छपी तस्वीर कभी भी किसी सिगरेट पीने वाले के ध्येय को हिला नहीं सकी है. ठीक उसी तरह तंबाकू खाने वालों ने कभी हार नहीं मानी औऱ वो लगातार सड़कों को अपनी पीक का योगदान देते रहे हैं. कोरोना काल में तो थूकने पर भी पाबंदी लग गई है. ऐसे में सवाल ये पैदा होता है कि क्या वाकई में इससे किसी के तंबाकू खाने पर कोई असर पड़ेगा.




आप बनारस जाइए आपको शायद इस सवाल का जवाब मिल जाएगा. वहां आपको सामने वाले की बात डीकोड करना आना चाहिए क्योंकि वो अपने मुंह मे भरा हुए तंबाकू से लबरेज पान की कुर्बानी किसी कीमत पर नहीं कर सकते हैं. यहां तक कि इलाहाबाद, बनारस कहीं भी आप किसी से अगर रास्ता पूछते हैं और उसके मुंह में तंबाकू मौजूद है तो वो अपनी गर्दन को ऊपर-नीचे, दाएं –बांए घुमा कर रास्ता बताता है. इस दौरान वो अपने निचले होंठ को आगे करके, मुंह को हल्का सा खोल कर और गर्दन को टेढ़ा करके मुंह से बोलेगा भी जिसमें आपको सिर्फ गोंगियाने का स्वर सुनाई देगा. कानपुर से लेकर बनारस तक लोगों के मुंह इसी तरह से भरे रहते हैं. यहां हर साल कितने लोगों की मौत तंबाकू खाने से होती है इसका सही आंकड़ा तो नहीं है लेकिन यहां की सड़कों पर घूमते हुए आपको तंबाकू की लत की भयावह तस्वीर देखने को मिल जाती है. पहले लोग पान खाया करते थे फिर उसकी जगह पाउच ने ले ली. जिसने इस तस्वीर को और भयानक रूप दे दिया . इसी भयानक तस्वीर का एक रूप भोपाल में देखने को मिलता है जहां हर दूसरा आदमी, हर गली नुक्कड़ पर, छोटा क्या, बड़ा क्या सभी एक पाउच फाड़ कर गर्दन पीछे करके मुंह में डालते हुए दिख जाते हैं.


दो साल पहले बड़े भाई के दोस्त की कैंसर से मौत हो गई थी. चालीस की सीमा रेखा भी पार ना करने वाले भाई के दोस्त की मौत का सदमा उसकी मां को भी बर्दाश्त नहीं हुआ था और वो अपने बेटे की मौत के चौथे दिन वो भी दुनिया से रुखसत हो गई. अब उसके पीछे दो छोटे बच्चे और पत्नी रह गई हैं. जिन्हे ता-उम्र इसी पछतावे के साथ गुज़ारना है कि काश वो गुटखा खाना छोड़ देते तो ये दिन नहीं देखने को मिलता . सबसे खास बात ये हैं कि मरने वाले के दोस्त उसकी अंत्येष्टि में जब पहुंचे तब भी उनके मुंह में गुटखा था. बात करने पर सब अपने अपने तर्कों से ये समझाने की कोशिश करने नजर आए कि वो ज्यादा खाता था, या गलत ब्रांड खाता था, या तरीका गलत था वगैरह-वगैरह . कुछ तो ये तर्क भी देते हुए मिल जाते हैं कि वो इसलिए बीड़ी-पत्ती को मल कर खाते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि गुटखा कितना नुकसान करता है.



इसी तरह अगर सिगरेट की बात की जाए तो वहां भी लोग इसी तरह के तर्कों को देते हुए नज़र आते हैं, शायद वो खुद को समझा रहे होते हैं. फिल्म शुरू होने से पहले तंबाकू, बीड़ी, खैनी जैसे उत्पादों के इस्तेमाल ना करने वाला विज्ञापन हो या फिर सिगरेट के पैकेट पर छपी हुई भयानक तस्वीर, इसका कोई विशेष फर्क नज़र नहीं आता है.


हमारे घर में डैडी एक वक्त में चैन स्मोकर थे. सिगरेट पीने की लत का ये आलम था कि जब एक सिगरेट बुझने वाली होती थी तो उससे ही दूसरी सिगरेट जल जाती थी. कितनी बार तो ऐसा भी हुआ है कि जलती हुई सिगरेट हाथ में लिए हुए किताब पढ़ने में मशगूल डैडी ने सिगरेट से गद्दे का अंतिम संस्कार किया. फिर जब डैडी टीबी के सबसे अंतिम स्टेज पर जा पहुंचे और डॉक्टर से इलाज शुरू हुआ तो डॉक्टर ने डैडी को सिर्फ यही कहा था कि अगर तुम छिपकर, बाथरूम मैं बैठ कर, किसी को बगैर बताए सिगरेट पीना चाहो तो पी सकते हो, बस ध्यान रखना जो होगा वो तुम्हारे साथ ही होगा. खास बात ये थी की सलाह देने वाले डॉक्टर जो भोपाल के टीबी हॉस्पिटल के प्रमुख थे वो खुद सिगरेट पीने के आदी थे. यहां तक कि जब वो सिगरेट पीते हुए डैडी को ये सलाह दे रहे थे तब भी उन्होंने यही कहा था कि हम अपनी जिंदगी के लिए खुद ज़िम्मेदार है. डैडी ने उसी वक्त सिगरेट से तौबा की और लगभग दो साल की कठिन इलाज के बाद वो ठीक हो पाए थे .



एक बार कहीं पढ़ा था कि सिगरेट के आदी अजय देवगन अपनी सिगरेट के नुकसान को कम करने के लिए उसके फिल्टर में छेद कर देते हैं जिससे कम निकोटिन अंदर जाए. सिगरेट आप एक पिएं या ज्यादा, तंबाकू एक बार खाएं या मुंह में भर कर रखें वो नुकसान करेगा ही. दिल्ली जैसे शहर में जहां बगैर सिगरेट जलाए हर आदमी पांच से छह सिगरेट पीने को मजबूर है वहां अगर किसी को सिगरेट पीने की लत हो तो सोचिए उसके शरीर के साथ क्या हो रहा होगा.


अनुराग कश्यप की स्टीफन किंग की लघुं कथा, क्विटर,इन्क पर आधारित नो स्मोकिंग सिगरेट की लत पर बनी बेहतरीन फिल्मों से एक है. ये निये-नोए (डार्क सिनेमा) फिल्म बुरी तरह से पिटी थी लेकिन उसके बावजूद ये अनुराग कश्यप के बेहतरीन कामों में से एक है. फिल्म की कहानी एक रईस बिजनेसमेन की है जिसे सिगरेट पीने की लत है. उसकी लत इस कदर बढ़ती है कि उस हॉस्पिटल जाना पड़ता है. यहां तक कि उसकी बीवी भी उसे छोड़ देती है. तब वो अपने दोस्त के कहने पर एक बाबा के पास जाता है जो सिगरेट छुडवाने का काम करते हैं. वहां सबसे पहले उस पर कुछ आरोप लगाए जाते हैं जिसमें पहला आरोप अपने प्रिय को सिंगरेट के धुंए से भरे हुए गैस चैंबर में रखकर मारने की कोशिश का है, फिर ये बताया जाता है कि उसने कितने लाख सिगरेट पीने में फूंक दिये.


इस तरह से उसे बताया जाता है कि अगर वो आगे सिगरेट पीता है तो सबसे पहले उसे अपनी उंगली से हाथ धोना पड़ेगा, फिर भी नहीं माना तो उसके सबसे प्रिय की जान ले ली जाएगी और उसके बाद भी अगर वो सिगरेट पीना नहीं छोड़ता है तो उसकी आत्मा को उसके शरीर को निकाल लिया जाएगा .
ट्रांस में ले जाती फिल्म में अंत आते आते आपको सिगरेट से होने वाले नुकसान समझ आने लगते है. रूपक के तौर पर अपनी बात कहने वाली इस कहानी का लब्बोलुआब यही है कि सिगरेट आपकी जिंदगी ही नहीं आपके परिवार की जिंदगी भी छीन लेती है साथ ही आप कई बार एक जीती जागती लाश बन कर रह जाते हो जिसके पास जान तो है लेकिन आत्मा नहीं है .


तो विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर अगर आप घर पर काम करते हुए, साहिर लुधियानवी का लिखा गीत सुन रहे हैं तो एक बार सोचिएगा ज़रूर कि क्या धुएं में वाकई कोई फिक्र उड़ती भी है. या इससे बरबादियों का जश्न ही मनता है औऱ फिक्र बढ़ती है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading