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14 करोड़ लोगों की बढ़ी मुश्किल, जून के अंत तक नहीं बचेंगे खर्च करने के लिए पैसे!

लॉकडाउन का असर शहरी गरीबों पर सबसे ज्यादा पड़ा है.

लॉकडाउन का असर शहरी गरीबों पर सबसे ज्यादा पड़ा है.

देशभर में लॉकडाउन की वजह से शहरों में रहने वाले लोंगों पर सबसे बड़ी मार पड़ी है. एक तरफ उनकी इनकम पर असर पड़ा है जबकि दूसरी तरफ जरूरी वस्तुओं की खरीद के लिए उन्हें ज्यादा खर्च करना पड़ता है.

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    नई दिल्ली. कोरोना वायरस महामारी (Corona virus Pandemic) स्वास्थ्य के मोर्चे पर लगातार बड़ी चुनौती बनती जा रही है. वहीं, दूसरी तरफ देशभर में गरीबी में ​जीवनयापन करने वाले लोगों की समस्या भी अब चिंताजनक स्तर पर पहुंच रही है. खासकर, शहरी गरीबी को इस वैश्विक महामारी से सबसे बड़ा धक्का लगा है. आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि सबसे आशावादी परिदृश्य में भी भारत की 30 फीसदी शहरी आबादी इस महीने के अंत तक अपनी बचत को खर्च चुकी होगी. तुलनात्मक रूप से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले गरीबों पर इतना ज्यादा असर नहीं पड़ेगा.

    हालांकि, उनपर भी इसका असर देखने को मिल रहा है लेकिन कई जनकल्याणाकारी योजनाओं (Welfare Schemes) को उन्हें लाभ भी मिल रहा है. एक सर्वे के मुाताबिक, लॉकडाउन के बाद से अब तक 84 फीसदी घरों की इनकम छिन गया है. इसके बाद लोग अपनी बचत की रकम खर्च करने को मजबूर हुए. शहरी इलाकों में रहने वाले गरीबों के लिये यह बचत रकम भी बेहद कम थी और अब यह भी खत्म होने वाला है.

    बचत भी खर्च करने को मजबूर
    इस सर्वे में कहा गया कि शहरी इलाकों में 62 फीसदी और ग्रामीण इलाकों में 50 फीसदी लोगों का इनकम प्रभावित हुआ है. शहरों में रहने वाले करीब 9.2 करोड़ लोग और गावों में रहने वाले करीब 8.9 करोड़ लोग लॉकडाउन के पहले चरण में प्रभावित हुए हैं. सरकार द्वारा किसानों और ग्रामीण आबादी को दी जाने वाली मदद और यहां आर्थिक गतिविधियां शुरू होने की वजह से जून के अंत तक खपत में सुधार देखने को मिलेगा. लेकिन, शहरों में करीब 13.9 करोड़ लोगों को अभी भी अपने बचत से काम चलाना पड़ रहा है और जून के अंत तक यह भी लगभग खत्म हो जाएगा. ये अनुमान नेशनल सेंपल सर्वे आॅर्गेनाइजेशन क आंकड़ों के आधार पर हैं.

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    क्यों है शहरी गरीबों के सामने चुनौती?
    एक अन्य अनुमान के अनुसार, शहरों में रहने वाले गरीबों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि उन्हें जरूरी वस्तुओं के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ता है और उनके पास कम बचत होता है. शहरों में रहने वाले 20 फीसदी गरीब गावों की तुलना में कम बचत कर पाते हैं. लॉकडाउन से होने वाले नुकसा के बाद अब उनके पास जून के अंत तक अपनी जरूरी खर्चों को कम करने या फिर उधार लेने की नौबत आ सकती है. हालांकि, शहरों में रहने वाले अन्य लोगों के लिए भी स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है.

    ग्रामीण आबादी पर इसका असर इसलिए पड़ा है क्योंकि उन्हें सरकार की तरफ से तुलनात्मक रूप से बेहतर सपोर्ट मिला है. उदाहरा के तौर पर देखें तो गांवों में सरकार ने पब्लिक डिस्ट्रीब्युश सिस्टम और कैश ट्रांसफर के जरिये लोगों की मदद की.

    राज्यों के स्तर पर इस चुनौती में भिन्नता है क्योंकि कुछ राज्यों ने कहीं ज्यादा सख्त लॉकडाउन का सहारा लिया. जबकि, कुछ राज्यों ने केंद्र सरकार द्वारा उठाए कदमों को लागू करने की दिशा में बेहतर किया है.

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