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जानें, कौन हैं अरविंद पनगढ़िया और क्‍यों दिया इस्तीफा

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    योजना आयोग को खत्‍म कर बने सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने इस्तीफा दे दिया है. इससे सरकार के इकोनॉमिक रिफॉर्म प्रोग्राम को धक्‍का लग सकता है. वे एक बार फिर कोलंबिया यूनिवर्सिटी लौट सकते हैं, जहां से उन्‍हें बार-बार आने का आग्रह किया जा रहा है. वैसे, उनके इस्‍तीफे की एक वजह संघ और सरकार के अंदर के कुछ लोगों के विरोध को भी बताया जा रहा है. नीति आयोग में पनगढ़ि‍या का लास्‍ट वर्किंग डे 31 अगस्‍त है.

    आरएसएस से रहा उनका विरोध
    पनगढ़ि‍या को अपने मार्केट फ्रेंडली विचारों के लिए अधिक जाना जाता है. इसलिए आरएसएस ने हमेशा उनका विरोध किया. आरएसएस से जुड़े संगठनों ने हमेशा फ्री मार्केट इकोनॉमिस्‍ट कहकर उनकी आलोचना की. संघ का मानना रहा है कि चूंकि वे पश्चिमी सोच वाले इकोनॉमिस्‍ट हैं, ऐसे में वे भारतीय इकोनॉमिक कंडिशन और जरूरत को नहीं समझ सकते हैं.

    मोदी के करीबी रहे हैं पनगढ़ि‍या
    पनगढ़ि‍या को हमेशा प्रधानमंत्री मोदी का करीबा माना जाता रहा है. पनगढ़ि‍या ने हमेशा कहा कि मोदी ने पीएमओ और ब्‍यूरोक्रेसी में जान फूंकी है. उनके अनुसार मोदी के कारण सरकार के विभिन्‍न मंत्रालयों में तालमेल और सहयोग बढ़ा है, जिससे नीतियों का क्रियान्‍वयन बेहतर और प्रभावी हुआ है और इकोनॉमिक डेवलपमेंट को भी बल मिला है.

    पढ़ाने के कारण लिया यह निर्णय
    अरविंद पनगढ़िया का पहला प्रेम पढ़ाना है. कहा जा रहा है कि वे जल्‍द कोलंबिया यूनिवर्सिटी लौट सकते हैं. अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अध्यापन का कार्य करने वाले अरविंद पनगढ़िया को खुद प्रधानमंत्री ने नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष के तौर पर चुना था. उनकी पहचान दुनिया के सबसे अनुभवी अर्थशास्त्रियों में होती है.

    वर्ल्‍ड बैंक व आईएमएफ में कर चुके हैं काम
    प्रिंस्‍टन यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र में पीएचडी अरविंद पनगढ़िया पहले अमेरिका के कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इंडियन पॉलिटिकल इकोनॉमी पढ़ाते थे. इससे पहले वह एशियन डेवलपमेंट बैंक के चीफ इकनॉमिस्ट भी रह चुके हैं. इसके अलावा वह मेरीलैंड यूनिवर्सिटी के कॉलेज पार्क में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर के तौर पर भी सेवा दे चुके हैं. वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ और यूएनसीटीएडी में भी कई पदों पर काम कर चुके हैं.

    30 सितम्बर 1952 में जन्मे अरविंद ने 2008 में India : The Emerging Giant नामक पुस्तक लिखी, जिसका प्रकाशन ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क ने किया. उन्होंने फाइनेंशियल टाइम्स, वॉल स्ट्रीट जनरल, हिंदू, इंडिया टुडे और आउटलुक में अतिथि कॉलम लिखते रहे. यही नहीं, वे बतौर अर्थशास्त्री देश और विदेश के शीर्ष टीवी चैनलों पर भी नजर आए.

    इंडिया द इमरजिंग जाइंट 2008 में इकोनॉमिस्ट की ओर से सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली पुस्तक में शामिल हो चुकी है. मार्च 2012 में उन्हें देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पदम विभूषण से नवाजा जा चुका है.पनगढ़िया की सलाह पर ही सरकार ने एयर इंडिया को बेचने का निर्णय किया था. इससे पहले तमाम अर्थशास्त्री एयर इंडिया को लेकर इस तरह की इच्छा तो रखते थे लेकिन सरकार के सामने कहने की पहल किसी ने नहीं की.

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